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पूजे गए कुलदेव, घरों में खरना
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 17 Nov 2015 12:09 AM IST
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इलाहाबाद। डाला छठ के दूसरे दिन सोमवार को ‘खरना’ हुआ। व्रती महिलाओं ने सारा दिन निर्जला व्रत करने के बाद गोधूलि बेला में कुल देवता की पूजा-अर्चना की। व्रत के मद्देनजर घर में पवित्रता शुद्धता का पूरा ख्याल रखा गया। पूजा वाले घर की विशेष साफ सफाई की गई। व्रत का सामान जुटाने में भी पवित्रता का ध्यान रखा गया। व्रती के अलावा किसी और को भोजन सामग्री छूने की अनुमति नहीं रही। पूजा की सामग्री को अन्य सामग्री से दूर ही रखा गया।
डाला में पूजा सामग्री को रखने, सजाने की तैयारी पूरे दिन होती रही। दिन भर के व्रत के बाद शाम ढलने पर कुल देवता की पूजा की गई। ‘खरना’ की थाली में सिंदूर और घी मिलाकर सूर्यचक्र बनाया और मिट्टी के दीये पर प्रसाद रखा गया। कलश पर धूप, दीप और मीठी चीज रखी गई, फिर सिंदूर लगाया गया। गुड़ दूध से बनी खीर, पूड़ी का भोग लगा। व्रत करने वाली महिला ने परिवार समेत प्रसाद खाया। पंचमी का चांद दिखने तक ही पानी पिया गया। फिर शुरू हुआ 36 घंटे का निर्जला व्रत जो बुधवार को अर्घ्य देने के साथ पूरा होगा।
संगम सहित गंगा यमुना के विभिन्न घाटों पर वेदी बनाने के लिए सुबह से लोगों का तांता लगा। विधिविधान से वेदी बनाकर पहचान के लिए उस पर नाम भी लिखा गया। संगम तट पर जगह को लेकर लोगों में होड़ सी लगी रही। सभी अपने लिए बेहतर जगह तलाश रहे थे।
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ईख नारियल पत्ते वाली हल्दी मुसम्मी शरीफा सहित कई तरह के फल गाजर नीबू कद्दू मूली अदरक पुआ आदि से सजे डाला को पति और पुत्र ही घर से घाट तक लेकर जाएंगे। व्रती महिलाएं नंगे पांव सूर्य आराधना के गीत गाती हुई घाट पहुंचेंगी।
व्रती महिलाओं ने सूप और डाला को कलात्मक तरीके से सजाया। इसे गोटा, सितारे और रंगीन पन्नी से कवर भी किया गया। डाला में गन्ना, सिंघाड़ा, आंवला, अन्नास, कैथा, चकोतरा, नारियल, मीठा नीबू, नीबू, अनार, संतरा, अमरूद, केला, सेब, हरी हल्दी, हरी अदरक, इमली, अमरा, बेर, सुतनी, मूली, कदम का फूल, शकरकंद, करौंदा, अमरख, छोटी, बड़ी नारंगी, मूली, अरवी, बंडा, मीठी नीम मकोय, आदि 52 प्रकार की सामग्री सजाईं गई। डाला में कच्चे सूत की माला, करधनी आदि भी रखा गया जिसे प्रसाद के तौर पर बांटा जाएगा।
रेलवे कालोनी की अंजू चतुर्वेदी बताती है कि जिनकी मनौती पूरी होती है ऐेसी महिलाएं घर से घाट तक का रास्ता लेट कर पूरा करेंगी। घाट पर विधिविधान से पूजा कर दीप जलाया जाएगा जिसे सूप में रखकर व्रती महिलाएं घर लेकर आएंगी। दीपक को पूजा स्थल पर रखा जाएगा, दीपक पूरी रात जलता रहे इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा।
चढ़ल कतिकवा छठि अइलै हे छठि के आसन अइले हे। 36 घंटे का निर्जला व्रत चांद के अस्त होते ही शुरू हुआ। मंगलवार को व्रती महिलाएं कमर तक पानी में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगी। बुधवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं मीठी चीज खाकर व्रत खोलेंगी।
पंडित विद्याकांत पांडेय के मुताबिक महाभारत के वन पर्व में सूर्यषष्टी व्रत का उल्लेख है। सूर्य देव की आराधना से सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति एवं घर परिवार में सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है। व्रत करने से कई प्रकार की असाध्य बीमारियां दूर होती है।
बाबा समाज सेवी संस्थान के कार्यकर्ताओं की ओर से सोमवार को घाट की साफ-सफाई की गई। संस्थान के अध्यक्ष सतीश केसरवानी के मुताबिक बच्चों को उनके अभिभावकों तक पहुंचाने और गोताखोरों का इंतजाम भी किया गया हैै संस्था के स्वयंसेवक श्रद्धालुओं की मदद में मुस्तैद रहेंगे। संस्थान की ओर से डाला छठ पर मंगलवार को भजन संध्या होगी। पूरी रात घाट पर भजन कीर्तन के बाद बुधवार को भंडारा होगा।
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डाला में पूजा सामग्री को रखने, सजाने की तैयारी पूरे दिन होती रही। दिन भर के व्रत के बाद शाम ढलने पर कुल देवता की पूजा की गई। ‘खरना’ की थाली में सिंदूर और घी मिलाकर सूर्यचक्र बनाया और मिट्टी के दीये पर प्रसाद रखा गया। कलश पर धूप, दीप और मीठी चीज रखी गई, फिर सिंदूर लगाया गया। गुड़ दूध से बनी खीर, पूड़ी का भोग लगा। व्रत करने वाली महिला ने परिवार समेत प्रसाद खाया। पंचमी का चांद दिखने तक ही पानी पिया गया। फिर शुरू हुआ 36 घंटे का निर्जला व्रत जो बुधवार को अर्घ्य देने के साथ पूरा होगा।
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संगम सहित गंगा यमुना के विभिन्न घाटों पर वेदी बनाने के लिए सुबह से लोगों का तांता लगा। विधिविधान से वेदी बनाकर पहचान के लिए उस पर नाम भी लिखा गया। संगम तट पर जगह को लेकर लोगों में होड़ सी लगी रही। सभी अपने लिए बेहतर जगह तलाश रहे थे।
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ईख नारियल पत्ते वाली हल्दी मुसम्मी शरीफा सहित कई तरह के फल गाजर नीबू कद्दू मूली अदरक पुआ आदि से सजे डाला को पति और पुत्र ही घर से घाट तक लेकर जाएंगे। व्रती महिलाएं नंगे पांव सूर्य आराधना के गीत गाती हुई घाट पहुंचेंगी।
व्रती महिलाओं ने सूप और डाला को कलात्मक तरीके से सजाया। इसे गोटा, सितारे और रंगीन पन्नी से कवर भी किया गया। डाला में गन्ना, सिंघाड़ा, आंवला, अन्नास, कैथा, चकोतरा, नारियल, मीठा नीबू, नीबू, अनार, संतरा, अमरूद, केला, सेब, हरी हल्दी, हरी अदरक, इमली, अमरा, बेर, सुतनी, मूली, कदम का फूल, शकरकंद, करौंदा, अमरख, छोटी, बड़ी नारंगी, मूली, अरवी, बंडा, मीठी नीम मकोय, आदि 52 प्रकार की सामग्री सजाईं गई। डाला में कच्चे सूत की माला, करधनी आदि भी रखा गया जिसे प्रसाद के तौर पर बांटा जाएगा।
रेलवे कालोनी की अंजू चतुर्वेदी बताती है कि जिनकी मनौती पूरी होती है ऐेसी महिलाएं घर से घाट तक का रास्ता लेट कर पूरा करेंगी। घाट पर विधिविधान से पूजा कर दीप जलाया जाएगा जिसे सूप में रखकर व्रती महिलाएं घर लेकर आएंगी। दीपक को पूजा स्थल पर रखा जाएगा, दीपक पूरी रात जलता रहे इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा।
चढ़ल कतिकवा छठि अइलै हे छठि के आसन अइले हे। 36 घंटे का निर्जला व्रत चांद के अस्त होते ही शुरू हुआ। मंगलवार को व्रती महिलाएं कमर तक पानी में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगी। बुधवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं मीठी चीज खाकर व्रत खोलेंगी।
पंडित विद्याकांत पांडेय के मुताबिक महाभारत के वन पर्व में सूर्यषष्टी व्रत का उल्लेख है। सूर्य देव की आराधना से सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति एवं घर परिवार में सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है। व्रत करने से कई प्रकार की असाध्य बीमारियां दूर होती है।
बाबा समाज सेवी संस्थान के कार्यकर्ताओं की ओर से सोमवार को घाट की साफ-सफाई की गई। संस्थान के अध्यक्ष सतीश केसरवानी के मुताबिक बच्चों को उनके अभिभावकों तक पहुंचाने और गोताखोरों का इंतजाम भी किया गया हैै संस्था के स्वयंसेवक श्रद्धालुओं की मदद में मुस्तैद रहेंगे। संस्थान की ओर से डाला छठ पर मंगलवार को भजन संध्या होगी। पूरी रात घाट पर भजन कीर्तन के बाद बुधवार को भंडारा होगा।