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इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी पुलिस को नसीहत: कहा- आपका काम अपराधों की जांच करना है, जोड़ों का पीछा करना नहीं

Sat, 25 Apr 2026 06:05 AM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 25 Apr 2026 06:05 AM IST
सार

कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो किसी को भी यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा, किससे शादी करेगा या अपना जीवन कैसे बिताएगा।

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Allahabad High Court's advice to UP Police: Said- your job is to investigate crimes, not to chase couples.
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस का काम अपराधों की जांच करना है, न कि बालिग जोड़ों की शादियों की जांच करना और उनका पीछा करना। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो किसी को भी यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा, किससे शादी करेगा या अपना जीवन कैसे बिताएगा।

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इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने अपहरण के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दिया है। सहारनपुर के थाना सदर बाजार में एक पिता ने याची के खिलाफ उनकी बालिग बेटी का अपहरण करने और विवाह के लिए मजबूर करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
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आरोपी ने प्राथमिकी को हाईकोर्ट में चुनौती दी।  कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अपर मुख्य सचिव (गृह) को इस संबंध में तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने एफआईआर को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। परमादेश जारी करते हुए सभी प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे इस विवाहित जोड़े के घर में प्रवेश न करें और न ही उनके जीवन में बाधा उत्पन्न करें। 
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गंभीर धाराओं में केस करने पर उठाए सवाल
कोर्ट ने पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद पाया कि युवती बालिग है। उसने अपने साथी के साथ मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया था व विवाह प्रमाणपत्र व तस्वीरें भी कोर्ट में पेश कीं। हाईकोर्ट ने हैरानी जताई कि इस मामले में केवल एक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की जा सकती थी, लेकिन पुलिस ने न केवल गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया, बल्कि जोड़े को परेशान करना भी शुरू कर दिया।


व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर यह गंभीर हमला
कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर हमला माना व कहा, संविधान किसी भी बालिग को दूसरे बालिग की इच्छा पर शासन करने या उसे नियंत्रित करने की अनुमति नहीं देता है। खंडपीठ ने चिंता व्यक्त की कि पुलिस की इन विवेकहीन कार्रवाई के कारण अदालतों में अनावश्यक मामलों का बोझ बढ़ रहा है।

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