Allahabad High Court : पंचशील के सुनहरे सिद्धांत की कसौटी पर हो सकती है परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की परीक्षा
42 बरस पहले जब यह वारदात हुई थी, तब चरखारी थाना क्षेत्र हमीरपुर जिले का हिस्सा था। 11 फरवरी 1995 को महोबा अलग जिला बना तो चरखारी इलाका वहां का हिस्सा हो गया। 1981 में यहीं के कथवन गांव में कालू नाम के व्यक्ति की धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या कर दी गई थी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पंचशील के सुनहरे सिद्धांत की कसौटी पर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का परीक्षण बखूबी किया जा सकता है। इनसे यह स्पष्ट हो सकता है कि मामला संदेह से परे है या नहीं। न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केशरवानी और न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की खंडपीठ ने महोबा के 42 साल पुराने हत्या के मामले में यह टिप्पणी करते हुए उम्रकैद की सजा पाए तीनों अभियुक्तों को बरी कर दिया।
42 बरस पहले जब यह वारदात हुई थी, तब चरखारी थाना क्षेत्र हमीरपुर जिले का हिस्सा था। 11 फरवरी 1995 को महोबा अलग जिला बना तो चरखारी इलाका वहां का हिस्सा हो गया। 1981 में यहीं के कथवन गांव में कालू नाम के व्यक्ति की धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या कर दी गई थी। गांव के ही बैजू की पत्नी ने मृतक के चचेरे भाई मदन को घटना की सूचना दी। फिर मदन ने रमसी उर्फ रमसा लोधी, उसके छोटे भाई हल्के लोधी और दोस्त लाखन सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।
आरोप पत्र के आधार पर जिला सत्र न्यायालय हमीरपुर ने तीनों को दोषी मानते हुए 1983 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके खिलाफ अभियुक्तों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। 40 साल तक हाईकोर्ट में मामला लंबित रहा। यहां याचीगण के अधिवक्ता संजय सिंह सेंगर ने दलील पेश करते हुए कहा कि गांव की पार्टीबंदी के कारण इन्हें झूठा फंसाया गया है। कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं है, जिससे यह सिद्ध होता हो कि हत्या इन्होंने की है।
कोर्ट ने मामले के दस्तावेजों और साक्षीगणों के बयान का अवलोकन करने के बाद पाया कि हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस बरामद नहीं कर सकी है। किसी भी चश्मदीद गवाह ने मृतक की हत्या की सूचना परिजनों या पुलिस को नहीं दी है। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरद वृद्धि चंद्र मामले में प्रतिपादित फैसले का उद्धरण देते हुए कहा कि पंचशील के पांच सिद्धांत वे सुनहरे सिद्धांत हैं, जिसकी कसौटी पर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया जा सकता है।
इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने 40 साल से लंबित अपील में अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए हत्या के आरोप से बरी कर दिया। 42 साल से खुद को निर्दोष साबित करने की लड़ाई लड़ते आए रमसा लोधी 75 बरस के हो चुके हैं। उनके छोटे भाई हल्के लोधी की उम्र 72 बरस हो चुकी है, जबकि दोस्त लाखन सिंह भी 70 पार हैं। अपील के बाद से तीनों लोग जमानत पर चल रहे थे।