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Allahabad High Court : 24 साल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद कर्मचारी की पत्नी को बड़ी राहत

Fri, 23 May 2025 11:38 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 23 May 2025 11:38 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 साल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद कर्मचारी की पत्नी को पारिवारिक पेंशन में बड़ी राहत दी है। बागपत, मेरठ की याची पत्नी को एकमुश्त सात लाख 50 हजार रुपये का विभाग की ओर से भुगतान करने का निर्देश दिया है।

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Allahabad High Court: Big relief to employee wife after fighting a legal battle for 24 years
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 साल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद कर्मचारी की पत्नी को पारिवारिक पेंशन में बड़ी राहत दी है। बागपत, मेरठ की याची पत्नी को एकमुश्त सात लाख 50 हजार रुपये का विभाग की ओर से भुगतान करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने माया की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पेंशन पाने के हक के बावजूद याची के कर्मचारी पति को गलत शासनादेश के आधार पर पेंशन देने से इन्कार कर दिया गया। वह चार दिसंबर 1982 के शासनादेश से पेंशन का हकदार था, इसकी उपेक्षा की गई। 1973 के शासनादेश के आधार पर पेंशन पाने का अपात्र घोषित कर दिया गया, जबकि यह शासनादेश उसके मामले में लागू नहीं था।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पेंशन के लिए न्यूनतम योग्यता न होने के आधार पर पेंशन का हकदार न मानने के पांच मार्च 08 के विभाग के आदेश को रद्द कर दिया। कहा, पेंशन या नोशनल पेंशन दी जा सकती है लेकिन, अब मामला पारिवारिक पेंशन का है। इतने अंतराल के बाद जिसकी गणना करना कठिन है। इसलिए याची को विशेष स्थिति के कारण सात लाख 50 हजार एकमुश्त राशि का भुगतान किया जाए।

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विभाग ने 30 मई 73के शासनादेश के आधार पर 15 साल की सेवा होनी चाहिए, लेकिन नौ साल आठ माह छह दिन की सेवा मान पेंशन पाने से वंचित कर दिया, जबकि 1982 के शासनादेश से उसको 10 साल की सेवा पर पेंशन पाने का हक था। उसने साढ़े 14 साल की सेवा पूरी कर ली थी। गलत शासनादेश के आधार पर अधिकार से वंचित किया गया। याची के पति की नियुक्ति करमालीपुर गढ़ी, बागपत, मेरठ के प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में बिना पद के की गई। 19 नवंबर 63 को अप्रशिक्षित अध्यापक के रूप में नियुक्ति की गई। 30 जून 91 में सेवानिवृत्त हो गया। कुल 34 साल की सेवा की, लेकिन पेंशन का हकदार नहीं माना गया।

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हाईकोर्ट ने बीएसए को प्रकरण तय करने का आदेश दिया था। कहा, याची को प्रशिक्षण से छूट नहीं थी। 1973के शासनादेश के आधार पर पेंशन के लिए 15 साल की सेवा जरूरी है। याची की सेवा नौ साल आठ माह छह दिन ही है। कोर्ट ने चार दिसंबर 82 के शासनादेश के आधार पर मेरठ के बीएसए को आदेश पारित करने का निर्देश दिया। इस पर पांच मार्च 8 को पुनः पेंशन का हकदार नहीं माना। 85साल की याची ने पति को पेंशन व उसे पारिवारिक पेंशन का भुगतान करने की मांग में याचिका दायर की। 1982 के शासनादेश से पेशन के लिए 10 साल की सेवा पर्याप्त मानी गई है। बीएसए ने गलत शासनादेश के आधार पर पेंशन देने से इन्कार किया है, आदेश रद्द हो। कोर्ट ने आदेश तो रद्द कर दिया, लेकिन पारिवारिक पेंशन के तौर पर एकमुश्त रकम देने का निर्देश दिया है।

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