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2007 में बर्खास्त किए गए 22 हजार सिपाहियों को प्रोन्नत वेतनमान, वरिष्ठता, वेतन वृद्धि पर फैसला लेने के निर्देश

Mon, 28 Sep 2020 12:50 PM IST
प्राची प्रियम अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: प्राची प्रियम Updated Mon, 28 Sep 2020 12:50 PM IST
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Allahabad HC orders for promotion and salary increment of 22000 constables appointed in year 2007
इलाहाबाद उच्च न्यायालय - फोटो : PTI
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीजीपी को मायावती राज में बर्खास्त और बाद में कोर्ट के आदेश से बहाल किए गए 22 हजार सिपाहियों को वेतन वृद्धि, प्रोन्नत वेतनमान, प्रशिक्षण अवधि सहित सेवा निरंतरता के साथ वरिष्ठता निर्धारण पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता ने आधे दर्जन जिलों में तैनात पुलिसकर्मियों, संजीव कुमार व कई अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है। 
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याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम ने बहस की। हापुड़, कानपुर नगर, मेरठ, गौतम बुद्ध नगर, इलाहाबाद, वाराणसी, मथुरा, गोरखपुर, गाजियाबाद में तैनात आरक्षियों ने हाईकोर्ट की शरण ली है। आरोप है कि 2007 में बर्खास्त सिपाहियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 26 मई 2009 को नियुक्ति तिथि से बहाल किया गया। 
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बर्खास्तगी अवधि को काम नहीं वेतन नहीं, के सिद्धांत पर अवकाश माना गया। सेवा निरंतरता दी गई है किंतु वरिष्ठता, वेतन वृद्धि, प्रोन्नत वेतनमान, 7वें आयोग की सिफारिशों का लाभ नहीं दिया जा रहा है। 
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जो सुप्रीम कोर्ट के दीपक कुमार केस निर्देशों की अवहेलना है। याचियों को प्रशिक्षण अवधि को सेवा निरंतरता में शामिल कर वेतनमान पाने का अधिकार है। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम का कहना था कि सरकार स्वयं अपने शासनादेश का पालन नहीं कर रही है। 


2005-06 पुलिस, पीएसी भर्ती में चयनित 22 हजार सिपाहियों को भर्ती में धांधली के आधार पर 2007 में बर्खास्त कर दिया गया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। एकलपीठ ने याचिकाएं मंजूर कर लीं और सेवा निरंतरता के साथ नियुक्ति तिथि से बहाल करने का निर्देश दिया। 

कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद सरकार सिपाहियों को उन्हें मिलने वाले सेवा जनित लाभों से वंचित कर रही है। जिस पर यह याचिका दाखिल की गई थी।
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