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पराया होने के बाद भी निभाया बेटी की फर्ज
सुरभि गुप्ता/अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 27 Sep 2015 01:50 AM IST
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इलाहाबाद। बुढ़ापे का सहारा मानकर बेटों को तरहीज देने और बेटियों का पराया धन मानने का ट्रेंड तेजी से बदला है तो यह अकारण नहीं है। ऐसे तमाम माता-पिता अपनी बेटियों के भरोसे ही बुढ़ापे का सफर सफलता से काट रहे हैं, जिनके लिए बेटियां ही बेटे जैसी हैं। कई बेटियों ने बहू बनने के बाद भी सास-ससुर के साथ ही माता-पिता की सेवा में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। अपने माता-पिता के लिए वह बेटी जैसी हैं तो सास-ससुर के लिए भी बहू नहीं बेटी ही हैं। बेटियां बहू बनने के बाद भी दोनों परिवारों की जिम्मेदारियां बखूबी संभाल रही हैं। कई ऐेसी ही बेटियों से बात हुई जो बेटों से हर लिहाज से लाख गुना बेहतर साबित हुई हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ फैशन डिजाइनिंग एंड टेकभनोलाजी की सेंटर हेड मिताली सिन्हा अपनी सास और मां दोनों की देखभाल बखूबी करती हैं। तकरीबन 25 बरस पहले मिताली जब बहू बनकर आईं तो मम्मी-पापा उनके साथ नहीं रहते थे लेकिन पापा नहीं रहे तो उन्होंने मम्मी को अकेले छोड़ना बेहतर नहीं समझा और उन्हें अपने साथ ले आई। नीचे वाले फ्लैट में मम्मी रहती हैं और ऊपर उनका परिवार। मिताली कहती हैं कि बेटा हो या बेटी, संतान तो संतान ही होती है। अगर किसी के सिर्फ बेटी है तो इसका मतलब यह नहीं है उसकी शादी के बाद अपने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं।
कर्नलगंज निवासी और शिक्षिका बरनौली राय कपूर शादी के छह माह बाद ही अपने माता-पिता को साथ ले आई थीं। तीन बहनों में सबसे बड़ी बरनौली की शादी को आठ साल हो चुके हैं। बकौल बरनौली, शादी के कुछ दिनों बाद ही मम्मी गिर गई थी सो उनकी देखभाल के लिए कोई नहीं था और उन्हें ऐसी हालत में छोड़ना संभव नहीं था। ऐसे में उनकी देखभाल के लिए उन्हे साथ लाना जरूरी था। उनके सास-ससुर ने भी बरनौली के इस फैसले को पूरा समर्थन दिया। अब बरनौली दोनों ही जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं और इसमें उन्हें सुख-संतोष मिलता है।
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दरभंगा कॉलोनी निवासी दिव्या गोस्वामी बहू होने के साथ ही बेटी के दायित्व को भी बखूबी निभा रही हैं। दिव्या के माता-पिता उनके परिवार के साथ रहते हैं। तीन बहनों में सबसे बड़ी दिव्या के माता-पिता पहले नैनी एडीए कॉलोनी में रहते थे, तकरीबन पांच वर्षों से उनके माता-माता साथ रह रहे हैं। दोनों छोटी बहनों की शादी के बाद माता-पिता एकदम अकेले हो गए। दीपावली को मम्मी-पापा का हालचाल लेने दिव्या ने फोेन किया तो वे रोने लगे। इसके बाद ही दिव्या ने उन्हें साथ रखने का निर्णय लिया। उनकी सास ने भी दिव्या की भावनाओं को समझते हुए उनके फैसले का मान रखा। आज दिव्या अपने ससुर और माता-पिता की जिम्मेदारियों को पति के साथ बखूबी निभा रहीं हैं।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ फैशन डिजाइनिंग एंड टेकभनोलाजी की सेंटर हेड मिताली सिन्हा अपनी सास और मां दोनों की देखभाल बखूबी करती हैं। तकरीबन 25 बरस पहले मिताली जब बहू बनकर आईं तो मम्मी-पापा उनके साथ नहीं रहते थे लेकिन पापा नहीं रहे तो उन्होंने मम्मी को अकेले छोड़ना बेहतर नहीं समझा और उन्हें अपने साथ ले आई। नीचे वाले फ्लैट में मम्मी रहती हैं और ऊपर उनका परिवार। मिताली कहती हैं कि बेटा हो या बेटी, संतान तो संतान ही होती है। अगर किसी के सिर्फ बेटी है तो इसका मतलब यह नहीं है उसकी शादी के बाद अपने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं।
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कर्नलगंज निवासी और शिक्षिका बरनौली राय कपूर शादी के छह माह बाद ही अपने माता-पिता को साथ ले आई थीं। तीन बहनों में सबसे बड़ी बरनौली की शादी को आठ साल हो चुके हैं। बकौल बरनौली, शादी के कुछ दिनों बाद ही मम्मी गिर गई थी सो उनकी देखभाल के लिए कोई नहीं था और उन्हें ऐसी हालत में छोड़ना संभव नहीं था। ऐसे में उनकी देखभाल के लिए उन्हे साथ लाना जरूरी था। उनके सास-ससुर ने भी बरनौली के इस फैसले को पूरा समर्थन दिया। अब बरनौली दोनों ही जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं और इसमें उन्हें सुख-संतोष मिलता है।
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दरभंगा कॉलोनी निवासी दिव्या गोस्वामी बहू होने के साथ ही बेटी के दायित्व को भी बखूबी निभा रही हैं। दिव्या के माता-पिता उनके परिवार के साथ रहते हैं। तीन बहनों में सबसे बड़ी दिव्या के माता-पिता पहले नैनी एडीए कॉलोनी में रहते थे, तकरीबन पांच वर्षों से उनके माता-माता साथ रह रहे हैं। दोनों छोटी बहनों की शादी के बाद माता-पिता एकदम अकेले हो गए। दीपावली को मम्मी-पापा का हालचाल लेने दिव्या ने फोेन किया तो वे रोने लगे। इसके बाद ही दिव्या ने उन्हें साथ रखने का निर्णय लिया। उनकी सास ने भी दिव्या की भावनाओं को समझते हुए उनके फैसले का मान रखा। आज दिव्या अपने ससुर और माता-पिता की जिम्मेदारियों को पति के साथ बखूबी निभा रहीं हैं।