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राष्ट्रहित में हो भारतीय भाषाओं का संगम

Thu, 26 Dec 2013 05:42 AM IST
Allahabad
Allahabad Updated Thu, 26 Dec 2013 05:42 AM IST
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इलाहाबाद। निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में बुधवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रहित और राष्ट्र्ीय एकता, अखंडता को सुदृढ़ करने में सभी भारतीय भाषाओं के संगम का आह्वान किया। उन्होंने कहा, जिस तरह संगमनगरी में तीन नदियों का संगम है, उसी तरह इलाहाबाद के अधिवेशन से बंग साहित्य सम्मेलन का अन्य भारतीय साहित्य से संगम, जुड़ाव का संदेश भी जाय तभी सम्मेलन का विस्तार होगा और साहित्य भी समृद्ध हो सकेगा। अनेकता में एकता हमारी संस्कृति का मूलाधार है, गुरुदेव भी इसी सांस्कृतिक स्वरूप के आधार पर देश को देखते थे।
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उन्होंने कहा, साहित्य की मूल भावना प्रेम है और इसकी मानव तथा समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका है। चाहे वह किसी भी भाषा का साहित्य हो, सभी का मूल एक है। अधिवेशन को यूनेस्को से भी स्वीकृति मिली है। वर्ष 1923 में वाराणसी के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। अधिवेशन को प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद और चौथे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद सहित प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, पहले भारतीय गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी, केएम करियप्पा आदि ने सम्मेलन को समृद्ध किया। ऐसे में मैं भी यहां आकर अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं।
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राष्ट्रपति ने कहा कि ‘बचपन से ही अधिवेशन के क्रियाकलापों के प्रति उत्सुक रहा हूं। वर्ष 1980 में जमशेदपुर के अधिवेशन में उद्बोधन के बाद तो इससे सीधे तौर पर जुड़ गया। तब मैंने कहा था कि राष्ट्रीय एकता का नेतृत्व करने में सम्मेलन को अपनी भूमिका का निर्वाह करना होगा। अब तक बारह बार बतौर सभापति मुझे बुलाया गया। वर्ष 1996 के इलाहाबाद अधिवेशन केबाद दोबारा उसी भूमिका में आया हूं।‘
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प्रणब दा ने राजनीति से अपने जुड़ाव और साहित्य से प्रेम को अलग तरह से परिभाषित किया। कहा कि, ‘मैं साहित्यकार नहीं लेकिन साहित्य का पाठक होने के कारण इसके रूप, रस और गंध का रसास्वादन और उसे आत्मसात करता हूं। अनेक व्यस्तताओं के बावजूद विभिन्न देशों और भाषाओं का साहित्य पढ़ता हूं। इसी से मुझे ऊर्जा मिलती और थकान दूर होती है। मनुष्य हमेशा अमृत की खोज करता रहा है और इसे साहित्य के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। साहित्य, व्यक्ति के विकास का द्वार भी खोलता है। हमारी कोशिश हो कि साहित्य का यह रूप खंडित न होने पाए।’

इससे पहले राज्यपाल बीएल जोशी ने बांग्ला साहित्य का अधिक से अधिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद का आह्वान किया। प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होमगार्ड मंत्री ब्रह्मदत्त त्रिपाठी ने बांग्ला साहित्य के सकारात्मक पहलुओं का बखान किया। सम्मेलन के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने सभी प्रतिनिधियों के शतायु होने की कामना की। सचिव जयंत घोष ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। शुरुआत में राष्ट्रपति ने दीप जलाकर अधिवेशन का उद्घाटन किया। प्रयाग संगीत समिति में आयोजित समारोह में महापौर अभिलाषा गुप्ता ने राष्ट्रपति का स्वागत किया। कार्यक्रम में मूल सभापति शीर्षेंदु मुखर्जी, संयोजक डॉ.मिलन मुखर्जी, सचिव अरुण चट्टोपाध्याय, उज्जवल रमण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह आदि मौजूद थे। संचालन मंदिरा गांगुली ने किया।
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