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परस्पर अंतर्निहित हैं, धर्म, समाज, विज्ञान
Allahabad
Updated Thu, 26 Dec 2013 05:42 AM IST
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इलाहाबाद। निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के तीन दिनी अधिवेशन के पहले दिन ‘साहित्य, विज्ञान और धर्म’ तथा ‘कथा साहित्य’ के अनेक पहलुओं पर विमर्श किया गया। इसके तहत बंग साहित्य में आए बदलाव, समाज एवं राष्ट्र में उसकी भूमिका पर मनीषियों ने मंथन किया।
वक्ताओं ने कहा, धर्म, समाज और विज्ञान एक दूसरे में अंतर्निहित हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बोस और प्रफुल्ल चंद्र राय जैसे वैज्ञानिकों को विज्ञान के साथ ही साहित्य के बारे में भी गहरी रुचि और समझ थी। स्वामी विवेकानंद मानते थे कि विज्ञान से इतर भी कोई शक्ति दुनिया को नियंत्रित करती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक आलोक कृष्ण गुप्ता और संचालन हरीशचंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट के भौतिक विज्ञानी विश्वरूप मुखर्जी ने किया। विमर्श में वैज्ञानिक अनिमेष मोइत्रा, देवाशीष मुखर्जी, निताई चंद्र मंडल आदि शामिल थे।
इसी क्रम में ‘कथा साहित्य’ पर विमर्श में हर्ष दत्ता, विनायक बंद्योपाध्याय आदि ने कहा कि लेखकों को बदलती हुई दुनिया के बारे में सोचना होगा। पुराने जमाने में उत्कृष्ट साहित्य लिखा गया लेकिन तब लोगों के पास उसे आमजन तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम नहीं था, आज साधन के बावजूद वैसा साहित्य नहीं रचा जा रहा है। बदले दौर में संचार क्रांति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अध्यक्षता विश्वनाथ राय और संचालन बारेन सरकार ने किया। प्रयाग संगीत समिति में अधिवेशन के दौरान बड़ी संख्या में बांग्ला की अनेक विधाओं के रचनाकार मौजूद थे।
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मीडिया प्रभारी शंकर चटर्जी के मुताबिक अधिवेशन के तहत बृहस्पतिवार को तीन सत्रों में प्रयाग संगीत समिति प्रेक्षागृह में सुबह साढ़े दस बजे से ‘बांग्ला के साथ अन्य भाषाओं के समन्वय’ के बाद बांग्ला साहित्य के अन्य आयामों पर चर्चा की जाएगी।
निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन की शुुरुआत और समापन राष्ट्रगान से हुई। सपन समद्दार, कल्याणी मुखर्जी, चंदना मुखर्जी, रीता समद्दार, महाश्वेता, जयदीप गांगुली, अमल डे,समीर ने राष्ट्रगान औरस्वरबितान की ओर से राका मित्रा केनिर्देशन में वंदे मातरम प्रस्तुत किया गया। तबला पर तपन चक्रवर्ती और सिंथेसाइजर पर मानस हलदार ने संगत किया।
वैसे तो बांग्ला समाज में मुखोपाध्याय और मुखर्जी पर्याय है लेकिन संगीत समिति में सम्मेलन के अधिवेशन के दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को संचालिका सहित सभी वक्ताओं ने मुखोपाध्याय कहकर ही संबोधित किया।
संगीत समिति में कार्यक्रम की समाप्ति के पहले लेकिन राष्ट्रपति के उद्बोधन के तुरंत बाद पीछे की पंक्तियों में बैठे लोग जब भोजन के लिए जाने लगे तो आयोजकों के हाथपांव फूल गए। राष्ट्रपति के स्टॉफ की ओर से इस ओर ध्यान दिलाए जाने के बाद संचालिका ने मंच से उनसे रुकने की अपील की लेकिन लोगों का जाना जारी रहा।
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वक्ताओं ने कहा, धर्म, समाज और विज्ञान एक दूसरे में अंतर्निहित हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बोस और प्रफुल्ल चंद्र राय जैसे वैज्ञानिकों को विज्ञान के साथ ही साहित्य के बारे में भी गहरी रुचि और समझ थी। स्वामी विवेकानंद मानते थे कि विज्ञान से इतर भी कोई शक्ति दुनिया को नियंत्रित करती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक आलोक कृष्ण गुप्ता और संचालन हरीशचंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट के भौतिक विज्ञानी विश्वरूप मुखर्जी ने किया। विमर्श में वैज्ञानिक अनिमेष मोइत्रा, देवाशीष मुखर्जी, निताई चंद्र मंडल आदि शामिल थे।
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इसी क्रम में ‘कथा साहित्य’ पर विमर्श में हर्ष दत्ता, विनायक बंद्योपाध्याय आदि ने कहा कि लेखकों को बदलती हुई दुनिया के बारे में सोचना होगा। पुराने जमाने में उत्कृष्ट साहित्य लिखा गया लेकिन तब लोगों के पास उसे आमजन तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम नहीं था, आज साधन के बावजूद वैसा साहित्य नहीं रचा जा रहा है। बदले दौर में संचार क्रांति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अध्यक्षता विश्वनाथ राय और संचालन बारेन सरकार ने किया। प्रयाग संगीत समिति में अधिवेशन के दौरान बड़ी संख्या में बांग्ला की अनेक विधाओं के रचनाकार मौजूद थे।
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मीडिया प्रभारी शंकर चटर्जी के मुताबिक अधिवेशन के तहत बृहस्पतिवार को तीन सत्रों में प्रयाग संगीत समिति प्रेक्षागृह में सुबह साढ़े दस बजे से ‘बांग्ला के साथ अन्य भाषाओं के समन्वय’ के बाद बांग्ला साहित्य के अन्य आयामों पर चर्चा की जाएगी।
निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन की शुुरुआत और समापन राष्ट्रगान से हुई। सपन समद्दार, कल्याणी मुखर्जी, चंदना मुखर्जी, रीता समद्दार, महाश्वेता, जयदीप गांगुली, अमल डे,समीर ने राष्ट्रगान औरस्वरबितान की ओर से राका मित्रा केनिर्देशन में वंदे मातरम प्रस्तुत किया गया। तबला पर तपन चक्रवर्ती और सिंथेसाइजर पर मानस हलदार ने संगत किया।
वैसे तो बांग्ला समाज में मुखोपाध्याय और मुखर्जी पर्याय है लेकिन संगीत समिति में सम्मेलन के अधिवेशन के दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को संचालिका सहित सभी वक्ताओं ने मुखोपाध्याय कहकर ही संबोधित किया।
संगीत समिति में कार्यक्रम की समाप्ति के पहले लेकिन राष्ट्रपति के उद्बोधन के तुरंत बाद पीछे की पंक्तियों में बैठे लोग जब भोजन के लिए जाने लगे तो आयोजकों के हाथपांव फूल गए। राष्ट्रपति के स्टॉफ की ओर से इस ओर ध्यान दिलाए जाने के बाद संचालिका ने मंच से उनसे रुकने की अपील की लेकिन लोगों का जाना जारी रहा।