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पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई 91 की नियमावली के तहत

Sun, 04 Dec 2016 01:47 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 04 Dec 2016 01:47 AM IST
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91 policemen of departmental action under the Rules
औचक निरीक्षण का हवाला देकर फर्जी सीआईडी इंस्पेक्टर दुकानदारों से दो हजार रुपये तक ऐंठ रहा था। - फोटो : Demo Pic
पुलिस विभाग में कार्यरत चतुर्थश्रेणी कर्मियों (ग्रुप डी) के खिलाफ विभागीय कार्रवाई उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी अधीनस्थ संवर्ग  (दंड एवं अपील) नियमावली 1991 के तहत ही की जाएगी। हाईकोर्ट के तीन जजों की पूर्णपीठ ने इस विधिक प्रश्न का समाधान करते हुए ग्रुप डी के कर्मियों पर विभागीय कार्रवाई किए जाने की स्थिति को साफ कर दिया है। प्रकरण दो खंडपीठों द्वारा अलग-अलग मत दिए जाने के कारण पूर्णपीठ के समक्ष संदर्भित किया गया था।
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मुख्य न्यायमूर्ति दिलीप बी भोसले, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा और न्यायमूर्ति प्रत्यूश कुमार की पूर्णपीठ ने इस प्रश्न का समाधान करते हुए मामला वापस खंडपीठ के समक्ष निस्तारण हेतु भेज दिया है। ग्रुप डी कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई को लेकर हाईकोर्ट की दो खंडपीठों ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनिल कुमार भारती और कृष्ण मुरारी केस में अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। कृष्ण मुरारी केस में खंडपीठ का मत था कि ग्रुप डी वर्ग के कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई 1991 की नियमावली के तहत नहीं की जा सकती है क्योंकि ग्रुप डी को 1991 की नियमावली में शामिल नहीं किया गया है। इस स्थिति में 1999 की नियमावली के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। जबकि अनिल कुमार भारती केस में दूसरी खंडपीठ ने मत व्यक्त किया कि कार्रवाई 1991 की नियमावली के तहत चलाई जानी चाहिए।
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फुलबेंच ने दोनों खंडपीठों के आदेशों की विस्तृत विवेचना के बाद निष्कर्ष दिया कि 1991 की नियमावली के तहत ही विभागीय कार्रवाई की जाएगी। प्रकरण के अनुसार याची अशोक कुमार चौधरी पुलिस विभाग में वाशर मैन के पद पर कार्यरत है। 18 अप्रैल 2013 को उसके विरुद्ध विभाग कार्रवाई की गई, जिसमें दंड स्वरूप उसकी 12 दिन की सेलरी काट ली गई। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कहा गया कि उसके विरुद्ध 1991 की नियमावली के तहत कार्रवाई की गई है, जो अनुचित है। एकलपीठ ने याची की दलील स्वीकार करते हुए कार्रवाई आदेश रद्द कर दिया। प्रदेश सरकार ने इस आदेश को अपील दाखिल कर चुनौती दी। खंडपीठ के समक्ष पूर्व की दोनों खंडपीठों के निर्णय प्रस्तुत किए गए, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। इसका निष्कर्ष निकालने के लिए प्रकरण पूर्णपीठ को संदर्भित किया गया। 
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