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हत्याभियुक्त की उम्रकैद बरकरार
Updated Wed, 28 Nov 2018 08:35 PM IST
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हत्याभियुक्त की उम्रकैद बरकरार
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने छपरौली बागपत के अली मोहम्मद को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को सही करार देते हुए सजा बरकरार रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि हत्या के अपराध में उम्रकैद न्यूनतम सजा है। अभियुक्त पर उसका अपराध साबित है। अली मोहम्मद ने आपराधिक अपील दाखिल कर सजा के आदेश को चुनौती दी थी। अपील पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति ओमप्रकाश की खंडपीठ ने सुनवाई की।
घटना 29 मई 2005 की है। नसीम अहमद ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी कि अली मोहम्मद ने अपने ट्यूबवेल पर सोए अली हसन की रात दो बजे गोली मारकर हत्या कर दी थी। टार्च की रोशनी में उसे हत्या कर भागते दो लोगों ने देखा था। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर सत्र न्यायालय बागपत ने अभियुक्त को उम्रकैद की सजा सुनाई। सजा के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद कहा कि अधीनस्थ न्यायालय के फैसले में कोई कमी नहीं है। अभियुक्त पर खेत में सोए व्यक्ति मार डालने का आरोप संदेह से परे साबित हुआ है। हत्या के अपराध में उम्रकैद से कम की सजा का प्रावधान नहीं है। ऐसे में सत्र न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं है। कोर्ट ने फैसले की एक प्रति जेल अधीक्षक को भेजने का निर्देश दिया है।
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प्रयागराज। हाईकोर्ट ने छपरौली बागपत के अली मोहम्मद को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को सही करार देते हुए सजा बरकरार रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि हत्या के अपराध में उम्रकैद न्यूनतम सजा है। अभियुक्त पर उसका अपराध साबित है। अली मोहम्मद ने आपराधिक अपील दाखिल कर सजा के आदेश को चुनौती दी थी। अपील पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति ओमप्रकाश की खंडपीठ ने सुनवाई की।
घटना 29 मई 2005 की है। नसीम अहमद ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी कि अली मोहम्मद ने अपने ट्यूबवेल पर सोए अली हसन की रात दो बजे गोली मारकर हत्या कर दी थी। टार्च की रोशनी में उसे हत्या कर भागते दो लोगों ने देखा था। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर सत्र न्यायालय बागपत ने अभियुक्त को उम्रकैद की सजा सुनाई। सजा के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद कहा कि अधीनस्थ न्यायालय के फैसले में कोई कमी नहीं है। अभियुक्त पर खेत में सोए व्यक्ति मार डालने का आरोप संदेह से परे साबित हुआ है। हत्या के अपराध में उम्रकैद से कम की सजा का प्रावधान नहीं है। ऐसे में सत्र न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं है। कोर्ट ने फैसले की एक प्रति जेल अधीक्षक को भेजने का निर्देश दिया है।
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