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हिंदी हैं हम : आखिरी बार खत कब लिखा? अब याद नहीं है
सार
व्हाट्स एप, फेसबुक और ट्विटर के जमाने में चिट्ठी (खत) लिखना लगभग सा बंद ही हो गया है।अंतर्देशीय पत्र में उड़ेल कर रख देते थे भावनाएंरेलवे स्टेशन अधीक्षक डीके गौतम बताते हैं कि चिट्ठियों का दौर मैंने नजदीक से देखा है।
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विस्तार
व्हाट्स एप, फेसबुक और ट्विटर के जमाने में चिट्ठी (खत) लिखना लगभग सा बंद ही हो गया है। ऐसे में प्रख्यात कवि गोपालदास नीरज के लिखे गीत... लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में, आज की रात तुझे आखिरी खत और लिख दूं, कौन जाने यह दीया सुबह तक जले न जले? जैसे गीत आज के बदलते दौर में सटीक साबित हो रहे हैं। लोगों को अब यह भी याद नहीं है कि उन्होंने आखिरी बार खत कब लिखा था?
एक वो जमाना था...
एक जमाना था, जब गली में डाकिया घर का दरवाजा खटखटाकर चिट्ठी देता था तो आसपड़ोस के लोग भी पूछते थे, भैया क्या हमारी चिट्ठी भी आई है... क्योंकि अपनों का हाल-चाल जानने का एक मात्र माध्यम पत्र ही था। लोग बेसब्री से चिट्ठी का इंतजार करते थे, मगर समय के साथ ही संदेशों का आदान-प्रदान का तरीका भी बदला। मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया ने पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्र को गुजरे जमाने की बात बना दिया है। नई पीढ़ी पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्र से अंजान है। हालांकि, मुख्य डाकघर से पिछले एक साल में 1.15 लाख पोस्ट कार्ड एवं पांच हजार अंतर्देशीय पत्रों की बिक्री हुई है, लेकिन इन पोस्ट कार्डों व अंतर्देशीय पत्रों का इस्तेमाल लोगों ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए किया है।
संचार-क्रांति के दौर में पीछे रह गए पत्र
संचार क्रांति के दौर में पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्र काफी पीछे छूट चुके हैं। इसका प्रमुख कारण इनका दो दिन से लेकर सप्ताह भर में तय पते पर पहुंचना है। मोबाइल और सोशल मीडिया के युग में हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों से तत्काल बात की जा सकती है। ऐसे में गिने-चुने ही लोग रह गए हैं, जो पत्र लिखते हैं। महंगाई के दौर में भी पोस्टकार्ड की कीमत 50 पैसे है।
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अंतर्देशीय पत्र में उड़ेल कर रख देते थे भावनाएं
रेलवे स्टेशन अधीक्षक डीके गौतम बताते हैं कि चिट्ठियों का दौर मैंने नजदीक से देखा है। उस समय अंतर्देशीय पत्र आता था, जो दो पेज का होता था। अंतर्देशीय पत्र लिखते समय लोग अपनी भावनाएं मानों उड़ेल कर रख देते थे। पत्र लिखने के बाद लोग अक्सर एक बात लिखा करते थे, थोड़े लिखे को बहुत समझना, आगे आप खुद समझदार हैं।
चला गया इंतजार का वो लम्हा
आरपीएफ पोस्ट के कमांडर राजीव वर्मा कहते हैं कि आज की पीढ़ी शायद ही डाक विभाग की अहमियत समझे। फोन और इंटरनेट ने संदेशों का आदान-प्रदान तो आसान कर दिया है, मगर खत का इंतजार और रोमांच का वो लम्हा छीन लिया है। हमारे दौर में चिट्ठियों का लोग इंतजार किया करते थे, कब हमारे नाम की चिट्ठी आएगी।
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एक वो जमाना था...
एक जमाना था, जब गली में डाकिया घर का दरवाजा खटखटाकर चिट्ठी देता था तो आसपड़ोस के लोग भी पूछते थे, भैया क्या हमारी चिट्ठी भी आई है... क्योंकि अपनों का हाल-चाल जानने का एक मात्र माध्यम पत्र ही था। लोग बेसब्री से चिट्ठी का इंतजार करते थे, मगर समय के साथ ही संदेशों का आदान-प्रदान का तरीका भी बदला। मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया ने पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्र को गुजरे जमाने की बात बना दिया है। नई पीढ़ी पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्र से अंजान है। हालांकि, मुख्य डाकघर से पिछले एक साल में 1.15 लाख पोस्ट कार्ड एवं पांच हजार अंतर्देशीय पत्रों की बिक्री हुई है, लेकिन इन पोस्ट कार्डों व अंतर्देशीय पत्रों का इस्तेमाल लोगों ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए किया है।
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संचार-क्रांति के दौर में पीछे रह गए पत्र
संचार क्रांति के दौर में पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय पत्र काफी पीछे छूट चुके हैं। इसका प्रमुख कारण इनका दो दिन से लेकर सप्ताह भर में तय पते पर पहुंचना है। मोबाइल और सोशल मीडिया के युग में हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों से तत्काल बात की जा सकती है। ऐसे में गिने-चुने ही लोग रह गए हैं, जो पत्र लिखते हैं। महंगाई के दौर में भी पोस्टकार्ड की कीमत 50 पैसे है।
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अंतर्देशीय पत्र में उड़ेल कर रख देते थे भावनाएं
रेलवे स्टेशन अधीक्षक डीके गौतम बताते हैं कि चिट्ठियों का दौर मैंने नजदीक से देखा है। उस समय अंतर्देशीय पत्र आता था, जो दो पेज का होता था। अंतर्देशीय पत्र लिखते समय लोग अपनी भावनाएं मानों उड़ेल कर रख देते थे। पत्र लिखने के बाद लोग अक्सर एक बात लिखा करते थे, थोड़े लिखे को बहुत समझना, आगे आप खुद समझदार हैं।
चला गया इंतजार का वो लम्हा
आरपीएफ पोस्ट के कमांडर राजीव वर्मा कहते हैं कि आज की पीढ़ी शायद ही डाक विभाग की अहमियत समझे। फोन और इंटरनेट ने संदेशों का आदान-प्रदान तो आसान कर दिया है, मगर खत का इंतजार और रोमांच का वो लम्हा छीन लिया है। हमारे दौर में चिट्ठियों का लोग इंतजार किया करते थे, कब हमारे नाम की चिट्ठी आएगी।