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.. तो रोहिंग्याओं के बीच बांग्लादेशियों ने बना ली घुसपैठ
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
Updated Wed, 01 Aug 2018 02:42 AM IST
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मदरसे में पढ़ाई करते रोहिंग्या मुसलमानों के बच्चे।
- फोटो : Amar Ujala
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असम के साथ-साथ देश भर में रोहिंग्या व बंाग्लादेशी शरणार्थियों व घुसपैठियों पर बहस छिड़ने से अपने शहर पर भी केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की नजर टिक गई है। हालांकि अलीगढ़ में रोहिंग्याओं का मुद्दा गुजरे कई सालों से उठ रहा है, मगर इनकी संख्या को लेकर तस्वीर आज तक साफ नहीं हो सकी है। खुफिया आंकड़ों पर गौर करें तो अलीगढ़ शहर में 250 रोहिंग्या वर्क परमिट या शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। मगर मौके पर इनकी संख्या 500 के आसपास देखी जा सकती है। वहीं देश में मुद्दा सुर्खियों में आने के बाद खुद रोहिंग्याओं के बीच से यह आवाज उठ रही है कि उनके बीच काफी संख्या में बंाग्लादेशी भी रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं। ऐसे में जरूरी हो गया है कि अलीगढ़ में रहने वाले इन शरणार्थियों और घुसपैठियों का नए सिरे से सत्यापन हो। जिस पर मंगलवार दोपहर से ही केंद्रीय व स्थानीय खुफिया एजेेंसियों ने काम शुरू कर दिया है।
मीट इंडस्ट्री है रोजगार का मुख्य साधन
मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की मजबूरी यह है कि पश्चिमी देशों में रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक रहती है। इसलिए मीट इंडस्ट्री में इन कर्मचारियों की मांग भी अधिक रहती है। इसी वजह से इन्हें आसानी से यहां की फैक्ट्रियों में रोजगार मिल जाता है। इसके अलावा जो लोग कटिंग के पेशे से अलग हैं, उन्हें मजदूरी में लगाया जाता है। मकदूम नगर में रह रहे कुछ लोगों ने टिर्री और जुगाड़ वाहन भी बना रखे हैं। उनमें मजदूरी पर माल ढुलाई का काम करते हैं। यही वजह है कि म्यांमार से भागकर भारत पहुंचे हजारों रोहिंग्या परिवारों का एक बड़ा धड़ा अलीगढ़ की मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की धुरी बना हुआ है। बेशक इनका रहन सहन इलाके विशेष में है। फैक्ट्रियों के सिवाय इनकी गतिविधियां अन्य कहीं नहीं पाई जातीं।
स्थानीय सरकार पर जताया पूरा भरोसा
बेशक कई साल से मीट फैक्ट्रियों में काम कर रहे रोहिंग्याओं का शहर के अन्य हिस्से से कोई नाता नहीं रहता। वे लोग मीट फैक्ट्रियों के अंदर या आसपास रहते हैं। उनके हर इंतजाम की जिम्मेदारी फैक्ट्री मालिकान व प्रबंधक की रहती है। जो उनसे अलग बस्तियों में रह रहे हैं, वह समाज में घुल मिलकर रह रहे हैं। यही वजह है कि मकदूम नगर में इलाके के पूर्व पार्षद शहजाद अल्वी ने अपनी खाली पड़ी जमीन रोहिंग्या परिवारों के बच्चों के लिए दे दी है, जिस पर रोहिंग्या मो. हाफिज सैफ (आलिम-मदरसे में पढ़ाने वाले) मदरसा चलाते हैं और इनके मदरसे में 60 के करीब रोहिंग्या बच्चे पढ़ते हैं। वह कहते हैं कि वह जहन्नुम से निकलकर आए हैं और भारत उन्हें जन्नत की तरह लग रहा है। फिर यहां से जाने की क्यों सोचें। उन्हें स्थानीय सरकार पर पूरा भरोसा है।
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पांच साल से लगातार बढ़ रही संख्या
अलीगढ़ में 2010-12 के आसपास रोहिंग्या परिवारों का आना उस समय शुरू हुआ, जब यहां मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की जड़ जमना शुरू हुई। धीरे-धीरे मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के हब कहे जाने वाले मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर दिया। अब तक मकदूम नगर में तकरीबन 300 से 400 लोग बस गए। इसी तरह करीब एक-एक दर्जन परिवार भुजपुरा व शाहजमाल में भी हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। रोहिंग्याओं के अगुवा मो. बिलाल के अनुसार वर्तमान में 80 से 85 परिवारों में 400 से 500 लोग यहां हैं, जिनमें 300 बालिग रोहिंग्या शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट के सहारे हैं। बाकी 100 या उससे अधिक नाबालिग व बच्चे हैं, जिनका कार्ड नहीं होगा।
कद-काठी और बोली में है समानता
मंगलवार सुबह राज्यसभा में रोहिंग्या शरणार्थियों व घुसपैठियों को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का बयान आने के बाद जब अमर उजाला ने इन इलाकों में जाकर जांच पड़ताल की तो तमाम लोगों ने अपने शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट दिखाए। जब इनकी संख्या को लेकर बातचीत शुरू हुई तो कुछ लोगों ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि चूंकि म्यामार और बंाग्लादेशी लोगों की कद-काठी और बोली भाषा मिलती जुलती है, इसलिए काफी संख्या में बांग्लादेशी यहां रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं। ऐसे में इनकी आड़ में देश विरोधी ताकतों के आकर छिपने और इनके द्वारा किसी भी समय वोटर कार्ड से लेकर भारतीय नागरिकता संबंधी अन्य दस्तावेज बनवाए जाने का अंदेशा बना रहता है। हालांकि इसे लेकर खुफिया तंत्र सक्रिय रहता है और समय-समय पर निगरानी भी रहती है। एसएसपी अजय कुमार साहनी कहते हैं कि खुफिया टीम को सख्त हिदायत है और वह प्रत्येक सप्ताह इलाके में अपडेट लेती है।
एक-एक का होगा सत्यापन, रिकार्ड तलब
मुद्दा सुर्खियों में आने के बाद सुबह से ही केंद्रीय व स्थानीय खुफिया एजेंसियों ने स्थानीय अपडेट लेना शुरू कर दिया है। नए सिरे से शरणार्थियों के रिकॉर्ड और उनके कार्ड का सत्यापन शुरू किया जा रहा है। मंगलवार को भी टीमों ने इनसे संबंधित इलाकों में घूमकर अपडेट लिया कि कौन नया आया है और कौन यहां से गया है। अगर गया है तो क्यों गया है। एसएसपी एक-दो दिन में ही सत्यापन का काम मैनुअली कराने की बात कहते हैं। वहीं सीओ एलआईयू सतीश चंद्र पांडेय के स्तर से भी डाटा अपडेट किया गया। उनके अनुसार रिकॉर्ड में 245 शरणार्थी दर्ज हैं। बाकी नए सिरे से सत्यापन का काम कराया जा रहा है।
अलीगढ़ शहर में करीब 250 रोहिंग्या शरणार्थी हैं। उनका पूरा रिकॉर्ड हमारे पास है। अब उनके शरणार्थी कार्ड नए सिरे से सत्यापित कराए जाएंगे। उनकी समयावधि, गतिविधि और आने-जाने की तारीखों आदि का रिकॉर्ड नए सिरे से अपडेट किया जाएगा। उनके बीच अगर बांग्लादेशी रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं, तो इसकी जांच की जाएगी। जो भी अवैध रूप से रहते हुए पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
-अजय कुमार साहनी, एसएसपी
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मीट इंडस्ट्री है रोजगार का मुख्य साधन
मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की मजबूरी यह है कि पश्चिमी देशों में रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक रहती है। इसलिए मीट इंडस्ट्री में इन कर्मचारियों की मांग भी अधिक रहती है। इसी वजह से इन्हें आसानी से यहां की फैक्ट्रियों में रोजगार मिल जाता है। इसके अलावा जो लोग कटिंग के पेशे से अलग हैं, उन्हें मजदूरी में लगाया जाता है। मकदूम नगर में रह रहे कुछ लोगों ने टिर्री और जुगाड़ वाहन भी बना रखे हैं। उनमें मजदूरी पर माल ढुलाई का काम करते हैं। यही वजह है कि म्यांमार से भागकर भारत पहुंचे हजारों रोहिंग्या परिवारों का एक बड़ा धड़ा अलीगढ़ की मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की धुरी बना हुआ है। बेशक इनका रहन सहन इलाके विशेष में है। फैक्ट्रियों के सिवाय इनकी गतिविधियां अन्य कहीं नहीं पाई जातीं।
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स्थानीय सरकार पर जताया पूरा भरोसा
बेशक कई साल से मीट फैक्ट्रियों में काम कर रहे रोहिंग्याओं का शहर के अन्य हिस्से से कोई नाता नहीं रहता। वे लोग मीट फैक्ट्रियों के अंदर या आसपास रहते हैं। उनके हर इंतजाम की जिम्मेदारी फैक्ट्री मालिकान व प्रबंधक की रहती है। जो उनसे अलग बस्तियों में रह रहे हैं, वह समाज में घुल मिलकर रह रहे हैं। यही वजह है कि मकदूम नगर में इलाके के पूर्व पार्षद शहजाद अल्वी ने अपनी खाली पड़ी जमीन रोहिंग्या परिवारों के बच्चों के लिए दे दी है, जिस पर रोहिंग्या मो. हाफिज सैफ (आलिम-मदरसे में पढ़ाने वाले) मदरसा चलाते हैं और इनके मदरसे में 60 के करीब रोहिंग्या बच्चे पढ़ते हैं। वह कहते हैं कि वह जहन्नुम से निकलकर आए हैं और भारत उन्हें जन्नत की तरह लग रहा है। फिर यहां से जाने की क्यों सोचें। उन्हें स्थानीय सरकार पर पूरा भरोसा है।
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पांच साल से लगातार बढ़ रही संख्या
अलीगढ़ में 2010-12 के आसपास रोहिंग्या परिवारों का आना उस समय शुरू हुआ, जब यहां मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की जड़ जमना शुरू हुई। धीरे-धीरे मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के हब कहे जाने वाले मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर दिया। अब तक मकदूम नगर में तकरीबन 300 से 400 लोग बस गए। इसी तरह करीब एक-एक दर्जन परिवार भुजपुरा व शाहजमाल में भी हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। रोहिंग्याओं के अगुवा मो. बिलाल के अनुसार वर्तमान में 80 से 85 परिवारों में 400 से 500 लोग यहां हैं, जिनमें 300 बालिग रोहिंग्या शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट के सहारे हैं। बाकी 100 या उससे अधिक नाबालिग व बच्चे हैं, जिनका कार्ड नहीं होगा।
कद-काठी और बोली में है समानता
मंगलवार सुबह राज्यसभा में रोहिंग्या शरणार्थियों व घुसपैठियों को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का बयान आने के बाद जब अमर उजाला ने इन इलाकों में जाकर जांच पड़ताल की तो तमाम लोगों ने अपने शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट दिखाए। जब इनकी संख्या को लेकर बातचीत शुरू हुई तो कुछ लोगों ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि चूंकि म्यामार और बंाग्लादेशी लोगों की कद-काठी और बोली भाषा मिलती जुलती है, इसलिए काफी संख्या में बांग्लादेशी यहां रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं। ऐसे में इनकी आड़ में देश विरोधी ताकतों के आकर छिपने और इनके द्वारा किसी भी समय वोटर कार्ड से लेकर भारतीय नागरिकता संबंधी अन्य दस्तावेज बनवाए जाने का अंदेशा बना रहता है। हालांकि इसे लेकर खुफिया तंत्र सक्रिय रहता है और समय-समय पर निगरानी भी रहती है। एसएसपी अजय कुमार साहनी कहते हैं कि खुफिया टीम को सख्त हिदायत है और वह प्रत्येक सप्ताह इलाके में अपडेट लेती है।
एक-एक का होगा सत्यापन, रिकार्ड तलब
मुद्दा सुर्खियों में आने के बाद सुबह से ही केंद्रीय व स्थानीय खुफिया एजेंसियों ने स्थानीय अपडेट लेना शुरू कर दिया है। नए सिरे से शरणार्थियों के रिकॉर्ड और उनके कार्ड का सत्यापन शुरू किया जा रहा है। मंगलवार को भी टीमों ने इनसे संबंधित इलाकों में घूमकर अपडेट लिया कि कौन नया आया है और कौन यहां से गया है। अगर गया है तो क्यों गया है। एसएसपी एक-दो दिन में ही सत्यापन का काम मैनुअली कराने की बात कहते हैं। वहीं सीओ एलआईयू सतीश चंद्र पांडेय के स्तर से भी डाटा अपडेट किया गया। उनके अनुसार रिकॉर्ड में 245 शरणार्थी दर्ज हैं। बाकी नए सिरे से सत्यापन का काम कराया जा रहा है।
अलीगढ़ शहर में करीब 250 रोहिंग्या शरणार्थी हैं। उनका पूरा रिकॉर्ड हमारे पास है। अब उनके शरणार्थी कार्ड नए सिरे से सत्यापित कराए जाएंगे। उनकी समयावधि, गतिविधि और आने-जाने की तारीखों आदि का रिकॉर्ड नए सिरे से अपडेट किया जाएगा। उनके बीच अगर बांग्लादेशी रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं, तो इसकी जांच की जाएगी। जो भी अवैध रूप से रहते हुए पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
-अजय कुमार साहनी, एसएसपी