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Aligarh News: कम रसायन का कमाल... अजवाइन करेगी धमाल
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एएमयू।
- फोटो : Archive
रसोई से लेकर दवा बनाने तक इस्तेमाल होने वाली अजवाइन अब किसानों के लिए ज्यादा मुनाफे की फसल बन सकती है। कम मात्रा में रासायनिक उपचार कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के वैज्ञानिकों ने ऐसे पौधों की पहचान की है, जिनमें सामान्य पौधों की तुलना में अधिक बीज और ज्यादा पैदावार मिली। वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे के परीक्षण सफल रहे तो इन्हीं से अधिक उत्पादन देने वाली नई किस्में विकसित होंगी, जिससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ भारत के मसाला उत्पादन को भी नई मजबूती मिलेगी।
स्प्रिंगर नेचर के डिस्कवर प्लांट जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में एएमयू के वनस्पति विज्ञान विभाग की म्यूटेशन ब्रीडिंग प्रयोगशाला के शोधकर्ता डॉ. साइमा मलिक, डॉ. मोहम्मद अनस और डॉ. समीउल्लाह खान ने रासायनिक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) तकनीक की मदद से अजवाइन में आनुवंशिक बदलाव किए। शोध का उद्देश्य ऐसी पौध लाइनों की पहचान करना था, जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन दे सकें।
कम डोज, ज्यादा पैदावार
अध्ययन में एथाइल मीथेन सल्फोनेट (ईएमएस) और हाइड्राजीन हाइड्रेट की अलग-अलग मात्रा का प्रयोग किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि 0.2 प्रतिशत ईएमएस और 0.01 प्रतिशत हाइड्राजीन हाइड्रेट से उपचारित पौधों में शाखाओं की संख्या, प्रति पौधा छत्र (अम्बल), प्रति छत्र बीज और कुल बीज उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। सबसे अधिक औसत बीज उत्पादन 0.2 प्रतिशत ईएमएस उपचार में 3.80 ग्राम और 0.01 प्रतिशत हाइड्राजीन हाइड्रेट उपचार में 3.50 ग्राम रहा, जबकि सामान्य पौधों में यह 3.45 ग्राम था।
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दो नई पौध लाइनें चयनित
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि रसायनों की अधिक मात्रा लाभ की बजाय नुकसान पहुंचाती है। इससे बीज अंकुरण, पौधों की वृद्धि और परागण क्षमता प्रभावित होती है। इसलिए कम मात्रा वाले उपचार को आगे की किस्म विकसित करने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। इतना ही नहीं सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर दो संभावित पौध लाइनों का चयन भी किया है। इनका अब अगली पीढ़ियों और अलग-अलग क्षेत्रों में परीक्षण किया जाएगा। सफल परिणाम मिलने पर इन्हें नई अजवाइन किस्म के रूप में विकसित किया जाएगा।
फैक्ट फाइल
. भारत के कुल अजवाइन उत्पादन का करीब 73 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान से आता है।
. अजवाइन के बीजों में 2 से 4.4 प्रतिशत तक आवश्यक तेल पाया जाता है।
. इसके प्रमुख तत्व थाइमोल का उपयोग पेट संबंधी रोग, अस्थमा, सूजन और श्वसन संबंधी बीमारियों की दवाओं में किया जाता है।
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स्प्रिंगर नेचर के डिस्कवर प्लांट जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में एएमयू के वनस्पति विज्ञान विभाग की म्यूटेशन ब्रीडिंग प्रयोगशाला के शोधकर्ता डॉ. साइमा मलिक, डॉ. मोहम्मद अनस और डॉ. समीउल्लाह खान ने रासायनिक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) तकनीक की मदद से अजवाइन में आनुवंशिक बदलाव किए। शोध का उद्देश्य ऐसी पौध लाइनों की पहचान करना था, जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन दे सकें।
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कम डोज, ज्यादा पैदावार
अध्ययन में एथाइल मीथेन सल्फोनेट (ईएमएस) और हाइड्राजीन हाइड्रेट की अलग-अलग मात्रा का प्रयोग किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि 0.2 प्रतिशत ईएमएस और 0.01 प्रतिशत हाइड्राजीन हाइड्रेट से उपचारित पौधों में शाखाओं की संख्या, प्रति पौधा छत्र (अम्बल), प्रति छत्र बीज और कुल बीज उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। सबसे अधिक औसत बीज उत्पादन 0.2 प्रतिशत ईएमएस उपचार में 3.80 ग्राम और 0.01 प्रतिशत हाइड्राजीन हाइड्रेट उपचार में 3.50 ग्राम रहा, जबकि सामान्य पौधों में यह 3.45 ग्राम था।
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दो नई पौध लाइनें चयनित
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि रसायनों की अधिक मात्रा लाभ की बजाय नुकसान पहुंचाती है। इससे बीज अंकुरण, पौधों की वृद्धि और परागण क्षमता प्रभावित होती है। इसलिए कम मात्रा वाले उपचार को आगे की किस्म विकसित करने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। इतना ही नहीं सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर दो संभावित पौध लाइनों का चयन भी किया है। इनका अब अगली पीढ़ियों और अलग-अलग क्षेत्रों में परीक्षण किया जाएगा। सफल परिणाम मिलने पर इन्हें नई अजवाइन किस्म के रूप में विकसित किया जाएगा।
फैक्ट फाइल
. भारत के कुल अजवाइन उत्पादन का करीब 73 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान से आता है।
. अजवाइन के बीजों में 2 से 4.4 प्रतिशत तक आवश्यक तेल पाया जाता है।
. इसके प्रमुख तत्व थाइमोल का उपयोग पेट संबंधी रोग, अस्थमा, सूजन और श्वसन संबंधी बीमारियों की दवाओं में किया जाता है।