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जहरीली शराब से तस्कर हर महीने कमा रहे थे तीन करोड़
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अभिषेक शर्मा, अलीगढ़।
जहरीली शराब कांड शराब तस्कर रैकेट के ऐसे-ऐसे राज बेपर्दा कर रहा है, जिन्हें सुनकर किसी के भी पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। सालाना करोड़ों के टर्नओवर वाले इस कारोबार में जहरीली शराब से ये तस्कर ढाई से तीन करोड़ रुपये प्रतिमाह से ज्यादा मुनाफा कमा रहे थे। यह राज इन शराब तस्करों ने खुद पुलिस पूछताछ में उगले हैं।
पिछले करीब डेढ़ दशक से ये इस कारोबार में जमे हुए हैं और सिस्टम व सियासत की मिलीभगत से कारोबार का बेखौफ संचालन कर रहे हैं। सबसे खास बात है कि आबकारी विभाग में इनकी इतनी धाक है कि अपने जिले में वैध ठेकों की आड़ में अवैध कारोबार के बादशाह अनिल-सुधीर और ऋषि-मुनीष ही हैं। किसी को भी इस कारोबार में पैर जमाने हैं तो इनकी मिलीभगत से ही कारोबार करना होता था।
पुलिस ने मुख्य सरगना अनिल चौधरी, उसके सहयोगी ठेकेदार नरेंद्र को पहले से रिमांड पर ले रखा है। इनकी रिमांड अवधि बुधवार सुबह खत्म होगी और दोनों को जेल में दाखिल कर दिया जाएगा। मंगलवार सुबह से ही दूसरा मुख्य सरगना विपिन यादव व उसका साथी फैक्टरी संचालक गंगाराम दो दिन के रिमांड पर लिया गया है। इधर, मुनीष भी सोमवार रात पकड़ में आ गया था, उसको भी इनके सामने लाकर रात भर और मंगलवार दोपहर तक पूछताछ की गई। इससे पूछताछ में बहुत से ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो वाकई चौंकाने वाले हैं।
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ऐसे शुरू किया कारोबार... फिर जमाईं जड़ें
अनिल व मुनीष से पूछताछ में साफ हुआ है कि अनिल के पिता इस कारोबार में थे। उसके बाद अनिल व उसके बड़े भाई सुधीर ने करीब डेढ़ दशक पहले कारोबार का विस्तार किया। चूंकि आबकारी नीतियां इतनी जटिल हैं कि उनसे मुनाफा बहुत नहीं होता और ज्यादा पैसे कमाने की ललक में अवैध शराब के कारोबार की ओर मुंह मोड़ दिया।
उसमें भी कुछ अड़चनेें आईं तो आबकारी सिस्टम में रुपयों से मुंह बंद करना, एसएस यादव जैसे अधिकारी ने अगर बात नहीं मानी तो रिश्वत कांड जैसे आरोपों में फंसाना और सियासत में भी दखल बढ़ाना जैसे हथकंडे अपनाए। इसके बाद उनका कारोबार चल पड़ा।
इसी तरह ऋषि व मुनीष डेढ़ से दो दशक पहले तक बुलंदशहर में डीपी यादव के शराब कारोबार से जुड़े हुए थे। बाद में अलीगढ़ में अपना कारोबार शुरू किया और नकली, मिलावटी व जहरीली शराब बेचना इसलिए मजबूरी थी कि उसके बिना मोटी कमाई नहीं होती।
पहले होती थी गैर प्रांत से तस्करी, अब अपनी बनाई
दोनों ने पूछताछ में स्वीकारा है कि करीब चार-पांच साल पहले तक वे लोग हरियाणा व अरुणाचल प्रदेश की शराब तस्करी करके ट्रकों में भरकर यहां लाया करते थे। शराब कुछ इस तरह आती थी कि वह डिस्टलरी से तो हरियाणा या अरुणाचल के लिए ही निकली, मगर रास्ते में उसका सौदा कर लिया और अपने यहां माल उतरवा लिया।
फिर उस माल पर यूपी के पैकिंग, लेबल, सील आदि लगाकर उसे अपने ठेकों पर व अपने परिचितों के ठेकों पर बिकवाते थे। इसके पीछे वजह थी कि हरियाणा व अरुणाचल की शराब टैक्स की वजह से यूपी से आधी कीमत में मिलती थी। इससे मोटा मुनाफा होता था।
उनका गिरोह इतना बड़ा है कि कई बार वे सीधे ट्रकों माल ही दूसरे ठेकेदारों को बेचते रहे हैं। जब से केंद्र सरकार ने आबकारी नीती में बदलाव कर देश में टैक्स एक समान किया है, तब वे उस शराब में भी ज्यादा मुनाफा नहीं होता। इसलिए करीब 4-5 साल पहले अपनी शराब बनाकर बेचना उचित समझा। इसी क्रम में विपिन की मदद से फैक्टरी शुरू कराई और धंधा फिर चल पड़ा।
एक साल में बदल जाता शराब फैक्टरी का ठिकाना
अनिल-सुधीर व विपिन ने स्वीकारा है कि वे अपनी फैक्टरी का ठिकाना एक साल में बदल देते हैं। वर्तमान में भी अधौन की फैक्टरी एक सवा साल पहले ही शुरू की गई थी। इससे पहले ठिकाना कभी इगलास क्षेत्र, कभी खैर क्षेत्र, कभी टप्पल क्षेत्र में रहा है।
सबके बंटे होते हैं अपने-अपने काम
इन्होंने स्वीकारा कि सभी के अपने-अपने काम बंटे हुए हैं। जैसे विपिन का काम फैक्टरी संचालन कराना, माल हमारे पास पहुंचाना है। अनिल, ऋषि, मुनीष का काम माल ठेकों पर बिकवाना और आबकारी में सांठगांठ रखना है। अब ये माल अपने ठेकों पर बिकवाएं या अन्य के ठेकों पर, यह इनकी जिम्मेदारी है।
आबकारी में बिना सांठगांठ के कारोबार संभव नहीं
हालांकि अभी तक की पूछताछ में इन तस्करों ने आबकारी के किसी अधिकारी का नाम तो नहीं लिया है। मगर हां, इतना जरूर स्वीकारा है कि बिना आबकारी में सांठगांठ के इस कारोबार का गिरोह चलाना संभव नहीं है। इससे साफ है कि आबकारी की मिलीभगत से ये सब चल रहा था। उन्होंने स्वीकारा है कि जिले के सौ के करीब शराब ठेकों के अलावा 100 करीब अवैध ठिकानों पर हमारी इस शराब की सप्लाई होती थी और लोग बेचते थे।
ऐसे भी आता था केमिकल
उन्होंने स्वीकारा है कि नकली या जहरीली शराब बनाने के लिए स्प्रिट, इथाइल केमिकल की जरूरत है। अब तक उनका एक रैकेट ढाबों पर आने वाले स्प्रिट व इथाइल के ट्रकों से माल चोरी करता रहा है। मगर उन्हें तालानगरी से माल मिलने लगा तब से यह चोरी बंद करा दी।
प्रतिमाह टर्नओवर का आंकड़ा
- 100 ठेकों पर जिले में प्रतिमाह होती थी सप्लाई
- 1400 की पेटी 2700 रुपये में जाती थी ठेकों पर
- 3500 रुपये की आती है सरकारी शराब की पेटी
- 3 करोड़ तक की बचत होती थी नकली शराब से
- 100 ऐसे अवैध ठिकाने, वहां भी खपती शराब
- अब तक पकड़े गए मुख्य शराब तस्करों से पूछताछ चल रही है। उन्होंने बहुत सी बातें, बहुत से नाम उजागर किए हैं। हमारी टीमें, लगातार उनको आमने सामने लाकर या अलग-अलग लाकर पूछताछ में जुटी हैं। यह स्वीकारा है कि करीब डेढ़ दशक पुराना यह कारोबार है। पूछताछ के बाद सभी तथ्य उजागर किए जाएंगे।-कलानिधि नैथानी, एसएसपी
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जहरीली शराब कांड शराब तस्कर रैकेट के ऐसे-ऐसे राज बेपर्दा कर रहा है, जिन्हें सुनकर किसी के भी पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। सालाना करोड़ों के टर्नओवर वाले इस कारोबार में जहरीली शराब से ये तस्कर ढाई से तीन करोड़ रुपये प्रतिमाह से ज्यादा मुनाफा कमा रहे थे। यह राज इन शराब तस्करों ने खुद पुलिस पूछताछ में उगले हैं।
पिछले करीब डेढ़ दशक से ये इस कारोबार में जमे हुए हैं और सिस्टम व सियासत की मिलीभगत से कारोबार का बेखौफ संचालन कर रहे हैं। सबसे खास बात है कि आबकारी विभाग में इनकी इतनी धाक है कि अपने जिले में वैध ठेकों की आड़ में अवैध कारोबार के बादशाह अनिल-सुधीर और ऋषि-मुनीष ही हैं। किसी को भी इस कारोबार में पैर जमाने हैं तो इनकी मिलीभगत से ही कारोबार करना होता था।
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पुलिस ने मुख्य सरगना अनिल चौधरी, उसके सहयोगी ठेकेदार नरेंद्र को पहले से रिमांड पर ले रखा है। इनकी रिमांड अवधि बुधवार सुबह खत्म होगी और दोनों को जेल में दाखिल कर दिया जाएगा। मंगलवार सुबह से ही दूसरा मुख्य सरगना विपिन यादव व उसका साथी फैक्टरी संचालक गंगाराम दो दिन के रिमांड पर लिया गया है। इधर, मुनीष भी सोमवार रात पकड़ में आ गया था, उसको भी इनके सामने लाकर रात भर और मंगलवार दोपहर तक पूछताछ की गई। इससे पूछताछ में बहुत से ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो वाकई चौंकाने वाले हैं।
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ऐसे शुरू किया कारोबार... फिर जमाईं जड़ें
अनिल व मुनीष से पूछताछ में साफ हुआ है कि अनिल के पिता इस कारोबार में थे। उसके बाद अनिल व उसके बड़े भाई सुधीर ने करीब डेढ़ दशक पहले कारोबार का विस्तार किया। चूंकि आबकारी नीतियां इतनी जटिल हैं कि उनसे मुनाफा बहुत नहीं होता और ज्यादा पैसे कमाने की ललक में अवैध शराब के कारोबार की ओर मुंह मोड़ दिया।
उसमें भी कुछ अड़चनेें आईं तो आबकारी सिस्टम में रुपयों से मुंह बंद करना, एसएस यादव जैसे अधिकारी ने अगर बात नहीं मानी तो रिश्वत कांड जैसे आरोपों में फंसाना और सियासत में भी दखल बढ़ाना जैसे हथकंडे अपनाए। इसके बाद उनका कारोबार चल पड़ा।
इसी तरह ऋषि व मुनीष डेढ़ से दो दशक पहले तक बुलंदशहर में डीपी यादव के शराब कारोबार से जुड़े हुए थे। बाद में अलीगढ़ में अपना कारोबार शुरू किया और नकली, मिलावटी व जहरीली शराब बेचना इसलिए मजबूरी थी कि उसके बिना मोटी कमाई नहीं होती।
पहले होती थी गैर प्रांत से तस्करी, अब अपनी बनाई
दोनों ने पूछताछ में स्वीकारा है कि करीब चार-पांच साल पहले तक वे लोग हरियाणा व अरुणाचल प्रदेश की शराब तस्करी करके ट्रकों में भरकर यहां लाया करते थे। शराब कुछ इस तरह आती थी कि वह डिस्टलरी से तो हरियाणा या अरुणाचल के लिए ही निकली, मगर रास्ते में उसका सौदा कर लिया और अपने यहां माल उतरवा लिया।
फिर उस माल पर यूपी के पैकिंग, लेबल, सील आदि लगाकर उसे अपने ठेकों पर व अपने परिचितों के ठेकों पर बिकवाते थे। इसके पीछे वजह थी कि हरियाणा व अरुणाचल की शराब टैक्स की वजह से यूपी से आधी कीमत में मिलती थी। इससे मोटा मुनाफा होता था।
उनका गिरोह इतना बड़ा है कि कई बार वे सीधे ट्रकों माल ही दूसरे ठेकेदारों को बेचते रहे हैं। जब से केंद्र सरकार ने आबकारी नीती में बदलाव कर देश में टैक्स एक समान किया है, तब वे उस शराब में भी ज्यादा मुनाफा नहीं होता। इसलिए करीब 4-5 साल पहले अपनी शराब बनाकर बेचना उचित समझा। इसी क्रम में विपिन की मदद से फैक्टरी शुरू कराई और धंधा फिर चल पड़ा।
एक साल में बदल जाता शराब फैक्टरी का ठिकाना
अनिल-सुधीर व विपिन ने स्वीकारा है कि वे अपनी फैक्टरी का ठिकाना एक साल में बदल देते हैं। वर्तमान में भी अधौन की फैक्टरी एक सवा साल पहले ही शुरू की गई थी। इससे पहले ठिकाना कभी इगलास क्षेत्र, कभी खैर क्षेत्र, कभी टप्पल क्षेत्र में रहा है।
सबके बंटे होते हैं अपने-अपने काम
इन्होंने स्वीकारा कि सभी के अपने-अपने काम बंटे हुए हैं। जैसे विपिन का काम फैक्टरी संचालन कराना, माल हमारे पास पहुंचाना है। अनिल, ऋषि, मुनीष का काम माल ठेकों पर बिकवाना और आबकारी में सांठगांठ रखना है। अब ये माल अपने ठेकों पर बिकवाएं या अन्य के ठेकों पर, यह इनकी जिम्मेदारी है।
आबकारी में बिना सांठगांठ के कारोबार संभव नहीं
हालांकि अभी तक की पूछताछ में इन तस्करों ने आबकारी के किसी अधिकारी का नाम तो नहीं लिया है। मगर हां, इतना जरूर स्वीकारा है कि बिना आबकारी में सांठगांठ के इस कारोबार का गिरोह चलाना संभव नहीं है। इससे साफ है कि आबकारी की मिलीभगत से ये सब चल रहा था। उन्होंने स्वीकारा है कि जिले के सौ के करीब शराब ठेकों के अलावा 100 करीब अवैध ठिकानों पर हमारी इस शराब की सप्लाई होती थी और लोग बेचते थे।
ऐसे भी आता था केमिकल
उन्होंने स्वीकारा है कि नकली या जहरीली शराब बनाने के लिए स्प्रिट, इथाइल केमिकल की जरूरत है। अब तक उनका एक रैकेट ढाबों पर आने वाले स्प्रिट व इथाइल के ट्रकों से माल चोरी करता रहा है। मगर उन्हें तालानगरी से माल मिलने लगा तब से यह चोरी बंद करा दी।
प्रतिमाह टर्नओवर का आंकड़ा
- 100 ठेकों पर जिले में प्रतिमाह होती थी सप्लाई
- 1400 की पेटी 2700 रुपये में जाती थी ठेकों पर
- 3500 रुपये की आती है सरकारी शराब की पेटी
- 3 करोड़ तक की बचत होती थी नकली शराब से
- 100 ऐसे अवैध ठिकाने, वहां भी खपती शराब
- अब तक पकड़े गए मुख्य शराब तस्करों से पूछताछ चल रही है। उन्होंने बहुत सी बातें, बहुत से नाम उजागर किए हैं। हमारी टीमें, लगातार उनको आमने सामने लाकर या अलग-अलग लाकर पूछताछ में जुटी हैं। यह स्वीकारा है कि करीब डेढ़ दशक पुराना यह कारोबार है। पूछताछ के बाद सभी तथ्य उजागर किए जाएंगे।-कलानिधि नैथानी, एसएसपी