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अलीगढ़ : शरणदाता गांव शादीपुर में ही बदहाल हैं शहीद-ए-आजम की निशानियां

Thu, 11 Aug 2022 01:21 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 11 Aug 2022 01:21 AM IST
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Signs of Shaheed-e-Azam are in disrepair in the refugee village of Shadipur
इसी कुएं से पानी खींचकर नहाते थे शहीद-ए-आजम भगत सिंह। - फोटो : CITY OFFICE
पूरे सवा साल काटे थे गांव शादीपुर में शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने। गांव के जर्रे-जर्रे पर उनके कदम पड़े थे। लेकिन देखकर अफसोस होता है कि भगत सिंह से जुड़े स्मृति चिह्न बदहाल हैं। गांव में भगत सिंह के नाम पर एक द्वार और उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है लेकिन उस स्थान से काफी दूर जहां उन्होंने गुप्तवास किया था।
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घेर की एक ईंट भी न छोड़ी लोगों ने
गांव से बाहर स्वतंत्रता सेनानी टोडर सिंह के जिस पक्के घेर में भगत सिंह रहे वहां जाने वाला रास्ता आजादी के 75 साल बाद भी कच्चा है। राह में कीचड़ इतनी है कि वाहन नहीं जा सकते। घेर के स्थान पर अब झाड़ियां ही बची हैं। एक ईंट भी नहीं दिखती। बताते हैं कि कुछ लोग वहां से ईंटें लेकर अपने इस्तेमाल के लिए ले गए।
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खंड्हर हो रहा है वह कुआं जिससे पानी खींचकर खुद नहाते थे भगत सिंह
घेर के सामने ही एक पक्का कुआं है। खंडहर में तब्दील होता यह कुआं अब भी इस बात की गवाही देता है कि कभी वह भव्य रहा होगा। उसके आसपास इतने झाड़-झंखाड़ हैं कि एक बार में तो वह नजर भी नहीं आता।
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नील की फैक्टरी भी थी वहां पर
ग्राम प्रधान के विजेंद्र सिंह के भाई वेदवीर सिंह बताते हैं कि अंग्रेजी शासन काल में यहां नील की फैक्टरी भी लगाई गई थी। नील को प्रसंस्करित करने के लिए बनाए गए हौज अभी भी हैं। उसकी मोटी-मोटी दीवारें उसकी मजबूती की गवाह हैं। संभवत: नील की खेती और उसका उत्पादन बहुत गांधी जी के आंदोलन के बाद पहले ही बंद हो चुका था। लेकिन यह अपने आपमें इतिहास का विशिष्ट पन्ना समेटे हुए है। इस पर किसी का ध्यान नहीं है।
प्रतिमा स्थापित...लेकिन भैंसें चर रही थीं पार्क में
गांव में उस पार्क की दशा दयनीय है जिसमें शहीद भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई है। आजादी के अमृतोत्सव के चार दिन पहले जब अमर उजाला की टीम वहां गई तो भैंसें चर रहीं थीं। चहारदीवारी टूटी थी। पार्क में घास की जगह बेतरतीब झाड़ियां उगी थीं। प्रतिमा की नींव के नीचे लकड़ी के लट्ठे-बल्लियां पड़ी हुई थीं। पूरे देश में अमृतोत्सव मनाया जा रहा है। लेकिन शहीद-ए-आजम की स्मृतियों से जुड़े इस पार्क की बदहाली रुलाने वाली है। कुछ लोग पार्क में यूं ही समय काट रहे थे।
भगत सिंह के बारे में नहीं जानते युवा
भगत सिंह की प्रतिमा के पास मौजूद इंटर के छात्र गौरव तोमर से जब पूछा गया कि भगत सिंह के बारे में क्या जानते हो तो वह बगले झांकने लगा। सिर्फ इतना बता पाया कि वह बड़े आदमी थे। यही हाल गांव के मुकेश का था। अलबत्ता, गांव के बुजुर्ग नारायण सिंह ने बताया कि भगत सिंह गांव के दादा टोडर सिंह के साथी थे और वह गांव में गुप्त रूप से रह रहे थे।

राष्ट्रीय स्मारक बने शादीपुर में
ग्रामीण कहते हैं कि भगत सिंह जहां रहे उस स्थल पर राष्ट्रीय स्मारक बनना चाहिए। उस ऐतिहासिक कुएं को संरक्षित किया जाना चाहिए जिसके पानी का उपयोग वह करते थे। नील की फैक्टरी के निशां को भी संरक्षण की दरकार है। शहीद भगत सिंह ने बलवंत सिंह के नाम से गांव में रहकर बच्चों को पढ़ाया था इसलिए उनके नाम पर एक स्कूल भी बनना चाहिए। भगत सिंह युवाओं के आज भी आदर्श हैं। गांव वाले कहते हैं कि उनके नाम पर स्कूल, स्टेडियम, अस्पताल कुछ तो बने। फिलहाल उनकी स्मृतियां संरक्षण के इंतजार में हैं।

अलीगढ़ के शादीपुर स्थित बदहाल नील की फैक्टरी के निशां ।

अलीगढ़ के शादीपुर स्थित बदहाल नील की फैक्टरी के निशां ।- फोटो : CITY OFFICE

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