Research: एएमयू ने खोजा धान की फसल में लगे जड़ गांठ से निपटने का तरीका, ऐसे पा सकते हैं रोग से निजात
शोध के मुताबिक यह रोग पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी जिलों में यह रोग तेजी से फैल रहा है। वह इलाके जहां पर धान की फसल सिंचाई वाले पानी पर आधारित है, और नर्सरी से लाकर पौधों की रोपाई की जाती है, वहां पर इसकी संभावना बहुत ज्यादा हो जाती है।
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धान की फसल में लगने वाली एक पुरानी बीमारी जड़गांठ का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के कृषि वैज्ञानिक प्रो. मुजीबुर रहमान खान ने नया और प्रभावी तरीका खोजा है। फसल चक्र में बदलाव करके और खेत के रखरखाव में कुछ साधारण उपायों को आजमा कर इस रोग से निजात पाई जा सकती है।
पुराने तरीकों के मुकाबले इस तरीके को आजमाने से प्रति बीघा 1.50 क्विंटल तक की वृद्धि होती है। सामान्य तौर पर प्रति बीघा 10 से 11 क्विंटल तक धान होती है। रोग से निजात मिलने के बाद यह 12 से 13 क्विंटल प्रति बीघा तक पहुंच जाती है।
शोध के मुताबिक यह रोग पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी जिलों में यह रोग तेजी से फैल रहा है। वह इलाके जहां पर धान की फसल सिंचाई वाले पानी पर आधारित है, और नर्सरी से लाकर पौधों की रोपाई की जाती है, वहां पर इसकी संभावना बहुत ज्यादा हो जाती है। 15 साल के शोध में पाया गया है कि अलीगढ़, हाथरस, बरेली, रामपुर, सहारनपुर, मेरठ, गाजियाबाद, मुरादाबाद, शाहजहांपुर, इलाहाबाद, बलरामपुर, गोरखपुर, लखनऊ, वाराणसी सहित अन्य जिलों में 30 से 56 फीसदी धान में यह बीमारी बेहद प्रचलित है।
नर्सरी से ही चला आता है रोग
यह रोग सूत्रकृमि, मेलोइडोगाइन ग्रैमिनिकोला के कारण होता है। जब नर्सरी से ही सूत्रकृमि से प्रभावित पौध खेत में लगाई जाती है, तो धान की पूरी फसल में यह रोग आ जाता है। इसके कारण उपज में 28 से 35 फीसदी तक की हानि होती है।
रोग की रोकथाम व प्रबंधन
शोधकर्ता प्रो. मुजीबुर रहमान ने बताया कि रोग की रोकथाम के लिए फसल चक्र का प्रयोग करना चाहिए। कम से कम एक साल के लिए धान के स्थान पर बाजरा, मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन, मूली, चना आदि फसलें उगाएं। खेत में पानी भरा रखें। धान की फसल को हमेशा पानी में डुबोए रखें, जिससे सूत्रकृमि का प्रकोप कम हो। उन्होंने कहा कि एक किलोग्राम बीज का पांच ग्राम बायोपेस्टीसाइड से उपचार करें। इसी तरह एक किलोग्राम बीज का पांच ग्राम नैमाटीसाइड से उपचार करें।
जड़ों का ऐसे करें उपचार
रोपाई से पहले 10 ग्राम जैविक कीटनाशक को 10 लीटर पानी में डालें, फिर जड़ों को भिगाेएं या फ्लूओपाइराम/फ्लुएनसल्फोन 100 पीपीएम घोल में दो-छह घंटे तक डुबोकर रखें। रोपाई के 15 दिन बाद फ्लूओपाइराम का खेत में प्रयोग करें। ज्यादा प्रकोप होने पर दो बार (15-15 दिन बाद) में फ्लूओपाइराम का इस्तेमाल करें।
रोग को ऐसे पहचानें
- जड़ों में हुक के आकार की गांठें बनती हैं, खासकर जड़ों के सिरों पर।
- पौधे पीले पड़ जाते है। कमजोर हो जाते हैं। अस्वस्थ दिखते हैं।
- खेतों में टुकड़ों में पौधे खराब होते हैं। पोषक तत्व की कमी।
- पौधे की वृद्धि रुक जाती है। पत्तियां मुरझा जाती हैं।
ऐसे फैलता है रोग
- रोगग्रस्त नर्सरी से बीज खेत में रोपाई करने पर बीमारी फैलती है।
- एक मादा सूत्रकृमि 100-500 अंडे देती है, जिससे एक ही मौसम में 3-4 पीढ़ियां बन जाती हैं।
- यह बीमारी पानी, संक्रमित मिट्टी और पौधों के अवशेषों से भी फैलती है।