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अलीगढ़ के पोस्टमार्टम केंद्र को भी है ‘पोस्टमार्टम’ की जरूरत
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अभिषेक शर्मा
गाजियाबाद के डीएम ने मोदी नगर हादसे के बाद वहां के पोस्टमार्टम केंद्र की अव्यवस्थाओं पर जो सवाल खड़े किए हैं। कमोबेश वही हालत अपने जिले के एकमात्र पोस्टमार्टम केंद्र की है। यहां भी औसत हर दिन 4 से 5 पोस्टमार्टम होने के बाद भी एक ही टीम काम करती है। कहने को यहां पोस्टमार्टम केंद्र पर दो टेबिल हैं। लेकिन टीम एक होने के कारण दिन भर वही टीम काम करती रहती है। हां, किसी बड़े हादसे पर जरूर अलग से टीम की व्यवस्था कर दी जाती है। मगर, वह टीम उस हादसे से जुड़े पोस्टमार्टम तक सीमित रहती है। अगर यहां की समस्याओं पर गौर करना शुरू करें तो इस पोस्टमार्टम केंद्र को भी तगड़े ‘पोस्टमार्टम’ जरूरत है।
अलीगढ़ के पोस्टमार्टम हाउस की अव्यवस्थाओं की बात की जाए तो यहां पर कहने को दो टेबिल हैं, जिन पर शव लिटाकर पोस्टमार्टम किया जा सकता है। मगर, पोस्टमार्टम करने के लिए एक ही टीम तैनात रहती है, जबकि सामान्यता यहां चार से पांच पोस्टमार्टम प्रतिदिन होते हैं। कहने को यह टीम 24 घंटे तैनात रहती है। मगर शाम तीन-चार बजे यह जितने पोस्टमार्टम संबंधी पुलिस दस्तावेज यहां पहुंच जात हैं। उनके पोस्टमार्टम शाम तक कर दिए जाते हैं। चार बजे के बाद अगर कोई कागज पहुंचते हैं तो पोस्टमार्टम कल के लिए टाल दिया जाता है। अगर किसी को रात में ही पोस्टमार्टम कराना है तो उसके लिए प्रशासनिक अनुमति की जरूरत रहती है। अगर दिन में कोई बड़ी दुर्घटना है तभी दूसरी या तीसरी टीम बुलाई जाएगी। तीसरी टीम स्ट्रेचर पर शव रखकर पोस्टमार्टम करेगी।
पुलिस स्तर से होती है कागजों में देरी
देरी से कागज पहुंचना भी एक बड़ा कारण है। अमूमन होता यह है कि किसी भी दुर्घटना की प्राथमिक सूचना पर मौके से घायल को तत्काल अस्पताल या शव को चिकित्सकीय पुष्टि के लिए अस्पताल भेज दिया जाता है। अस्पताल से उसे मृत घोषित कर उसी एंबुलेंस से तत्काल पोस्टमार्टम केंद्र भेज दिया जाता है। अब पोस्टमार्टम के लिए कागजों का इंतजार है। थाने संबंधित दरोगा पांच लोगों के बयान के बाद पंचायतनामा व पोस्टमार्टम कागज तैयार करता है, जिसमें डेढ़ से दो घंटे का समय लगता है। एक शव के कागज तैयार होने के बाद सिपाही उन्हें लेकर पहले जिला अस्पताल जाएगा। वहां लिखा पढ़ी करने के बाद फिर पुलिस लाइन पहुंचेगा। वहां लिखा पढ़ी होने के बाद फिर पोस्टमार्टम केंद्र कागज पहुंचेंगे। इस प्रक्रिया में भी दो से ढाई घंटे लग जाते हैं। तब कहीं जाकर पोस्टमार्टम शुरू हो पाएगा। अब इसके लिए पुलिस को दोषी ठहराया जा सकता है। मगर पोस्टमार्टम केंद्र वाले बिना कागज मिले शव को हाथ नहीं लगाते और शव पोस्टमार्टम केंद्र के बरामदे में ऐसे ही टिनशेड में रखे रहते हैं। उन्हीं शवों को अक्सर चूहे, कुत्तों से कुतरने की घटनाएं देखने व सुनने को मिल जाती हैं।
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पीपीपी मॉडल पर तैयार होना था यह पोस्टमार्टम केंद्र
वर्ष 2010-11 में इस पोस्टमार्टम केंद्र की हालत बेहद दयनीय स्थिति में थी। तत्कालीन एसएसपी असीम अरुण के प्रयास से यहां सांसद व विधायक निधि से नया भवन बना, नुमाइश मद से जेनरेटर व फ्रीजर आदि का इंतजाम हुआ। दो टेबिल बनीं। इसके अलावा संसाधन, पब्लिक सुविधाओं के लिए इसे पीपीपी मॉडल के तहत संचालन पर विचार हुआ और एक टीम ने कई दूसरे शहरों के पोस्टमार्टम केंद्र देखे। वहां से आने के बाद एमओयू साइन हुआ। मगर सब रद्दी की टोकरी में चला गया।
खुद परिवार को खरीदनी पड़ती है किट
पोस्टमार्टम केंद्र प्रभारी रवि दीक्षित के अनुसार शाम पांच बजे के बाद यहां अंधेरा हो जाता है। किट की सुविधा नहीं है। खुद लोगों को किट खरीदकर लानी पड़ती है। उसी किट में पोस्टमार्टम के बाद शव रखकर सौंपा जाता है। उसे लेकर यहां के स्टाफ पर रुपये मांगने के आरोप लग जाते हैं। कई मर्तबा यहां की इन समस्याओं को लेकर सीएमओ व अन्य अधिकारियों को लिखा गया है। रात में अंधेरे के कारण पोस्टमार्टम से जुड़ी कई समस्याएं रहती हैं। गरमी में जेनरेटर खराब होने पर फ्रीजर काम नहीं करता तो दुर्गंध आदि की समस्या भी रहती है।
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गाजियाबाद के डीएम ने मोदी नगर हादसे के बाद वहां के पोस्टमार्टम केंद्र की अव्यवस्थाओं पर जो सवाल खड़े किए हैं। कमोबेश वही हालत अपने जिले के एकमात्र पोस्टमार्टम केंद्र की है। यहां भी औसत हर दिन 4 से 5 पोस्टमार्टम होने के बाद भी एक ही टीम काम करती है। कहने को यहां पोस्टमार्टम केंद्र पर दो टेबिल हैं। लेकिन टीम एक होने के कारण दिन भर वही टीम काम करती रहती है। हां, किसी बड़े हादसे पर जरूर अलग से टीम की व्यवस्था कर दी जाती है। मगर, वह टीम उस हादसे से जुड़े पोस्टमार्टम तक सीमित रहती है। अगर यहां की समस्याओं पर गौर करना शुरू करें तो इस पोस्टमार्टम केंद्र को भी तगड़े ‘पोस्टमार्टम’ जरूरत है।
अलीगढ़ के पोस्टमार्टम हाउस की अव्यवस्थाओं की बात की जाए तो यहां पर कहने को दो टेबिल हैं, जिन पर शव लिटाकर पोस्टमार्टम किया जा सकता है। मगर, पोस्टमार्टम करने के लिए एक ही टीम तैनात रहती है, जबकि सामान्यता यहां चार से पांच पोस्टमार्टम प्रतिदिन होते हैं। कहने को यह टीम 24 घंटे तैनात रहती है। मगर शाम तीन-चार बजे यह जितने पोस्टमार्टम संबंधी पुलिस दस्तावेज यहां पहुंच जात हैं। उनके पोस्टमार्टम शाम तक कर दिए जाते हैं। चार बजे के बाद अगर कोई कागज पहुंचते हैं तो पोस्टमार्टम कल के लिए टाल दिया जाता है। अगर किसी को रात में ही पोस्टमार्टम कराना है तो उसके लिए प्रशासनिक अनुमति की जरूरत रहती है। अगर दिन में कोई बड़ी दुर्घटना है तभी दूसरी या तीसरी टीम बुलाई जाएगी। तीसरी टीम स्ट्रेचर पर शव रखकर पोस्टमार्टम करेगी।
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पुलिस स्तर से होती है कागजों में देरी
देरी से कागज पहुंचना भी एक बड़ा कारण है। अमूमन होता यह है कि किसी भी दुर्घटना की प्राथमिक सूचना पर मौके से घायल को तत्काल अस्पताल या शव को चिकित्सकीय पुष्टि के लिए अस्पताल भेज दिया जाता है। अस्पताल से उसे मृत घोषित कर उसी एंबुलेंस से तत्काल पोस्टमार्टम केंद्र भेज दिया जाता है। अब पोस्टमार्टम के लिए कागजों का इंतजार है। थाने संबंधित दरोगा पांच लोगों के बयान के बाद पंचायतनामा व पोस्टमार्टम कागज तैयार करता है, जिसमें डेढ़ से दो घंटे का समय लगता है। एक शव के कागज तैयार होने के बाद सिपाही उन्हें लेकर पहले जिला अस्पताल जाएगा। वहां लिखा पढ़ी करने के बाद फिर पुलिस लाइन पहुंचेगा। वहां लिखा पढ़ी होने के बाद फिर पोस्टमार्टम केंद्र कागज पहुंचेंगे। इस प्रक्रिया में भी दो से ढाई घंटे लग जाते हैं। तब कहीं जाकर पोस्टमार्टम शुरू हो पाएगा। अब इसके लिए पुलिस को दोषी ठहराया जा सकता है। मगर पोस्टमार्टम केंद्र वाले बिना कागज मिले शव को हाथ नहीं लगाते और शव पोस्टमार्टम केंद्र के बरामदे में ऐसे ही टिनशेड में रखे रहते हैं। उन्हीं शवों को अक्सर चूहे, कुत्तों से कुतरने की घटनाएं देखने व सुनने को मिल जाती हैं।
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पीपीपी मॉडल पर तैयार होना था यह पोस्टमार्टम केंद्र
वर्ष 2010-11 में इस पोस्टमार्टम केंद्र की हालत बेहद दयनीय स्थिति में थी। तत्कालीन एसएसपी असीम अरुण के प्रयास से यहां सांसद व विधायक निधि से नया भवन बना, नुमाइश मद से जेनरेटर व फ्रीजर आदि का इंतजाम हुआ। दो टेबिल बनीं। इसके अलावा संसाधन, पब्लिक सुविधाओं के लिए इसे पीपीपी मॉडल के तहत संचालन पर विचार हुआ और एक टीम ने कई दूसरे शहरों के पोस्टमार्टम केंद्र देखे। वहां से आने के बाद एमओयू साइन हुआ। मगर सब रद्दी की टोकरी में चला गया।
खुद परिवार को खरीदनी पड़ती है किट
पोस्टमार्टम केंद्र प्रभारी रवि दीक्षित के अनुसार शाम पांच बजे के बाद यहां अंधेरा हो जाता है। किट की सुविधा नहीं है। खुद लोगों को किट खरीदकर लानी पड़ती है। उसी किट में पोस्टमार्टम के बाद शव रखकर सौंपा जाता है। उसे लेकर यहां के स्टाफ पर रुपये मांगने के आरोप लग जाते हैं। कई मर्तबा यहां की इन समस्याओं को लेकर सीएमओ व अन्य अधिकारियों को लिखा गया है। रात में अंधेरे के कारण पोस्टमार्टम से जुड़ी कई समस्याएं रहती हैं। गरमी में जेनरेटर खराब होने पर फ्रीजर काम नहीं करता तो दुर्गंध आदि की समस्या भी रहती है।