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पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कब्रिस्तान में किया गया सुपुर्द-ए-खाक
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
Updated Tue, 30 Oct 2018 02:41 AM IST
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The people of the family giving blankets in Kanye Abdul Sattar's Janaza in AMU graveyard.
- फोटो : Amar Ujala
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उर्दू के प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री प्रोफेसर काजी अब्दुल सत्तार का रविवार रात दिल्ली में इंतकाल हो गया। वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। इलाज के लिए उनको दिल्ली ले जाया गया था। वह 85 वर्ष के थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के कब्रिस्तान मिंटोई में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
एएमयू उर्दू विभाग के पूर्व चेयरमैन प्रो. काजी अब्दुल सत्तार पिछले डेढ़ महीने से दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती थे। चेस्ट इंफेक्शन से पीड़ित होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शनिवार को स्थिति में सुधार होने पर परिजन उन्हें दिल्ली के दरियागंज स्थित आवास पर ले गए थे।
उनके पुत्र काजी शाहजेव ने बताया कि रात में तबियत खराब होने पर उनको सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद उनको सर गंगाराम अस्पताल ले जाया गया। रविवार रात करीब दो बजे अस्पताल से घर लाते समय उनका निधन हो गया। सोमवार को शाम में प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के पार्थिव शरीर को एंबुलेंस से दिल्ली से सर सैयद नगर स्थित उनकी बहन किश्वर सलाहुद्दीन के आवास पर लाया गया।
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वहां से विश्वविद्यालय के कब्रिस्तान मिंटाई में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके जनाजे की नमाज में साहित्यकार, शायर, शागिर्द व एएमयू बिरादरी के लोग शामिल हुए। वह अपने पीछे दो पुत्र एवं एक पुत्री छोड़ गए हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद के गांव मछरेटा में 1933 में प्रो. काजी अब्दुल सत्तार का जन्म हुआ था।
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एएमयू उर्दू विभाग के पूर्व चेयरमैन प्रो. काजी अब्दुल सत्तार पिछले डेढ़ महीने से दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती थे। चेस्ट इंफेक्शन से पीड़ित होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शनिवार को स्थिति में सुधार होने पर परिजन उन्हें दिल्ली के दरियागंज स्थित आवास पर ले गए थे।
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उनके पुत्र काजी शाहजेव ने बताया कि रात में तबियत खराब होने पर उनको सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद उनको सर गंगाराम अस्पताल ले जाया गया। रविवार रात करीब दो बजे अस्पताल से घर लाते समय उनका निधन हो गया। सोमवार को शाम में प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के पार्थिव शरीर को एंबुलेंस से दिल्ली से सर सैयद नगर स्थित उनकी बहन किश्वर सलाहुद्दीन के आवास पर लाया गया।
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वहां से विश्वविद्यालय के कब्रिस्तान मिंटाई में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके जनाजे की नमाज में साहित्यकार, शायर, शागिर्द व एएमयू बिरादरी के लोग शामिल हुए। वह अपने पीछे दो पुत्र एवं एक पुत्री छोड़ गए हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद के गांव मछरेटा में 1933 में प्रो. काजी अब्दुल सत्तार का जन्म हुआ था।
हंसते मुस्कराते चला गया कलम का बादशाह
कौशल कुमार ओझा। महज 41 वर्ष की उम्र में पद्मश्री हासिल करने वाले उर्दू के साहित्यकार एवं कलम के बादशाह प्रो. काजी अब्दुल सत्तार अब नहीं रहे। साहित्यकार डॉ. प्रेम कुमार कहते है कि उन्होंने तीन रंगों में लिखा है। प्रेम, इतिहास एवं युद्ध के अतिरिक्त ग्रामीण जीवन पर उनकी गजब की पकड़ थी। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मेें विभिन्न पदों पर रहने के बाद 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे।
काजी अब्दुल सत्तार का जन्म 8 फरवरी 1933 को सीतापुर जनपद के गांव मछरेटा में जमींदार परिवार में हुआ था। उर्दू विभाग के डॉ. फुरकान सांभली कहते हैं कि उनके पिता काजी अब्दुल अली एवं माता आलिमा खातून के साथ-साथ उनके मामू एवं चाचा का भी उनकी परवरिश में योगदान था। 1950 में सीतापुर से इंटर पास करके वह लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंचे। वहां से एमए करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शोध करने पहुंचे। उन्हें प्रो. रशीद अहमद सिद्दीकी जैसे विद्वान के निर्देशन में काम करने का मौका मिला। 1957 में उन्होंने ‘उर्दू शायरी में कुनूतियत’ विषय पर शोध करके पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसी दौरान उर्दू विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हो गए। 1967 में रीडर एवं 1981 में प्रोफेसर बनाए गए। 1987 में विभाग के चेयरमैन बने और 1992 में सेवानिवृत्त हुए।
डॉ. फुरकान कहते हंै कि मात्र 13 वर्ष की आयु में अब्दुल सत्तार ने पहली कहानी ‘अंधा’ लिखी जो कि 1946 में लखनऊ के ‘जवाब’ में प्रकाशित हुई। उनका पहला उपन्यास ‘शिकस्त की आवाज’ (1954) है। इसके अतिरिक्त उन्होंने पीतल का घंटा, शब गंजीदा, मज्जू भैया, सलाहउद्दीन अयूबी, बादल, दारा शिकोह, गालिब, हजरत जान, खालिद बिन वलीद, ताजम सुलतान, आखिरी कहानी कहानी एवं उपन्यासों की रचना की। काजी अब्दुल सत्तार ने सेहबा उपनाम के साथ शायरी भी की और ‘गोमती की आवाज’ उनकी प्रसिद्ध नज्म है। काजी अब्दुल सत्तार पर कई छात्र पीएचडी कर चुके हैं। हिंदी के साहित्यकार एवं प्रो. काजी साहब पर पुस्तक लिख चुके डॉ. प्रेम कुमार कहते हैं कि हंसते, मुस्कुराते एवं लिखते हुए कलम का बादशाह चला गया। वह सचमुच में शब्दों के जादूगर थे।
काजी अब्दुल सत्तार का जन्म 8 फरवरी 1933 को सीतापुर जनपद के गांव मछरेटा में जमींदार परिवार में हुआ था। उर्दू विभाग के डॉ. फुरकान सांभली कहते हैं कि उनके पिता काजी अब्दुल अली एवं माता आलिमा खातून के साथ-साथ उनके मामू एवं चाचा का भी उनकी परवरिश में योगदान था। 1950 में सीतापुर से इंटर पास करके वह लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंचे। वहां से एमए करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शोध करने पहुंचे। उन्हें प्रो. रशीद अहमद सिद्दीकी जैसे विद्वान के निर्देशन में काम करने का मौका मिला। 1957 में उन्होंने ‘उर्दू शायरी में कुनूतियत’ विषय पर शोध करके पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसी दौरान उर्दू विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हो गए। 1967 में रीडर एवं 1981 में प्रोफेसर बनाए गए। 1987 में विभाग के चेयरमैन बने और 1992 में सेवानिवृत्त हुए।
डॉ. फुरकान कहते हंै कि मात्र 13 वर्ष की आयु में अब्दुल सत्तार ने पहली कहानी ‘अंधा’ लिखी जो कि 1946 में लखनऊ के ‘जवाब’ में प्रकाशित हुई। उनका पहला उपन्यास ‘शिकस्त की आवाज’ (1954) है। इसके अतिरिक्त उन्होंने पीतल का घंटा, शब गंजीदा, मज्जू भैया, सलाहउद्दीन अयूबी, बादल, दारा शिकोह, गालिब, हजरत जान, खालिद बिन वलीद, ताजम सुलतान, आखिरी कहानी कहानी एवं उपन्यासों की रचना की। काजी अब्दुल सत्तार ने सेहबा उपनाम के साथ शायरी भी की और ‘गोमती की आवाज’ उनकी प्रसिद्ध नज्म है। काजी अब्दुल सत्तार पर कई छात्र पीएचडी कर चुके हैं। हिंदी के साहित्यकार एवं प्रो. काजी साहब पर पुस्तक लिख चुके डॉ. प्रेम कुमार कहते हैं कि हंसते, मुस्कुराते एवं लिखते हुए कलम का बादशाह चला गया। वह सचमुच में शब्दों के जादूगर थे।
डॉक्टरों से छिपाकर आईसीयू में लिखते थे उपन्यास
काजी अब्दुल सत्तार अपने लेखन को कितनी अहमियत देते थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ वर्ष पूर्व एक बार जब वह मेडिकल कॉलेज के आईसीयू में भर्ती थे तो डॉक्टरों से छिपाकर उपन्यास लिखते थ्ाे। यह बात काजी साहब के जीवन पर आधारित ‘काजी अब्दुल सत्तार..बातों मुलाकातों में’ पुस्तक लिखने वाले डॉ. प्रेम कुमार ने बताई।
प्रेम कुमार कहते हैं कि काजी साहब उर्दू के वरेण्य रचनाकार हैं। ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन की दृष्टि से उनका स्थान, स्तर और महत्व अन्य रचनाकारों से कही अधिक बड़ा, अलग और अनूठा है। भाषा के लिहाज से उन्हें शब्दों का जादूगर माना जाता है। प्रेम कुमार कहते हैं कि उस आदमी की चाल, ढाल, अकड़ और तड़क अद्भुत थी। अपने आप को जमींदार मानना कभी नहीं छोड़ा। आखिरी समय तक उसी ठसक से जीते रहे। उनको जिंदगी में हर चीज उम्दा एवं खूबसूरत चाहिए थी। वह स्वयं अपने बारे में कहा करते थे कि मुझे तन्हाई से इश्क है। मुझे मालूम है कि मैं गुस्सैल हूं। मुझे लोग अहंकारी कहते हैं। लेकिन वे लोग नहीं समझते कि मैं किस स्तर पर लिटरेचर को जीता हूं और लिखता हूं।
डॉ. प्रेम कहते है कि सचमुच जिंदगी के प्रति इतना लापरवाह आदमी नहीं दिखा। साहित्य के लिए समर्पित और इश्क के लिए पागल। हृदय रोग से पीड़ित होने पर जेएन मेडिकल कॉलेज के आईसीयू में भर्ती थे। डॉक्टरों से छिपाकर ‘ताजम सुल्तान’ लिखते थे। यह घटना करीब तीन साल पहले की है। यह उनका आखिरी उपन्यास है।
प्रेम कुमार कहते हैं कि काजी साहब उर्दू के वरेण्य रचनाकार हैं। ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन की दृष्टि से उनका स्थान, स्तर और महत्व अन्य रचनाकारों से कही अधिक बड़ा, अलग और अनूठा है। भाषा के लिहाज से उन्हें शब्दों का जादूगर माना जाता है। प्रेम कुमार कहते हैं कि उस आदमी की चाल, ढाल, अकड़ और तड़क अद्भुत थी। अपने आप को जमींदार मानना कभी नहीं छोड़ा। आखिरी समय तक उसी ठसक से जीते रहे। उनको जिंदगी में हर चीज उम्दा एवं खूबसूरत चाहिए थी। वह स्वयं अपने बारे में कहा करते थे कि मुझे तन्हाई से इश्क है। मुझे मालूम है कि मैं गुस्सैल हूं। मुझे लोग अहंकारी कहते हैं। लेकिन वे लोग नहीं समझते कि मैं किस स्तर पर लिटरेचर को जीता हूं और लिखता हूं।
डॉ. प्रेम कहते है कि सचमुच जिंदगी के प्रति इतना लापरवाह आदमी नहीं दिखा। साहित्य के लिए समर्पित और इश्क के लिए पागल। हृदय रोग से पीड़ित होने पर जेएन मेडिकल कॉलेज के आईसीयू में भर्ती थे। डॉक्टरों से छिपाकर ‘ताजम सुल्तान’ लिखते थे। यह घटना करीब तीन साल पहले की है। यह उनका आखिरी उपन्यास है।
कहा था... अब बहुत थक गया हूं।
इकराम वारिस। पद्मभूषण कवि गोपालदास नीरज के निधन से काजी अब्दुल सत्तार को गहरा धक्का लगा था। उन्हें अपनी रवानगी का भी अहसास भी होने लगा था। तभी उन्होंने कहा था ‘अब मैं बहुत थक गया हूं..।’
गुजरी 19 जुलाई गुरुवार 2018 को नीरज जी के निधन के दूसरे दिन शुक्रवार 20 जुलाई को उनसे मुलाकात करने सर सैयद नगर स्थित उनके आशियाने पर पहुंचा। घर के आसपास सन्नाटा था। लोहे का गेट खोल कर मैं अंदर घुसा और सीधे लॉबी में आ गया। दरवाजा खटखटाया..। दो सेकेंड में ही खरखराती आवाज आई..। आया.. ठहरो..। कुर्र की आवाज के साथ दरवाजा खुला और सामने जाने पहचाने सत्तार साहब नुमाया थे। मैं बोला, अस्सलाम अलैय कुम..। उन्होंने जवाब दिया कि वा अलैय कुम अस्सलाम..। अंदर आओ..। मैं अंदर पहुं
च गया। कुर्ता और तहमद पहने सत्तार साहब अपने कमरे के किनारे पर पड़े लेटने वाले तख्त पर बैठ गए। नौकर से बोले पानी ले आओ..। तख्त के सामने पड़े सोफे में बैठते हुए गहरी सांस लेकर मैंने उनसे नीरज जी का जिक्र किया। कहा कि हिंदी की मेजबानी करने वाले आपके अजीज दोस्त नीरज जी अब नहीं रहे। आप उनके पुराने दोस्त और उर्दू की रहनुमा हैं। उनके बारे में कुछ कहें..। उन्होंने मेरी बात सुन कर एक आह सी भरी.. और छत की ओर देखने लगे। कुछ लम्हे गुजरने के बाद मैंने दोबारा इल्तिजा की कि वह अपने दोस्त के बारे में कुछ फरमाएं। लेकिन कुछ बोलने से पहले उनके तजुर्बेकार चेहरे पर गम की लकीरें उभर आईं। उनकी जुबान सूख चुकी थी।
नम खामोश आंखों में कई सवाल थे। मानो वो खुद खुदा से कुछ बात कर रहे हों। मैं भी ये देख कर कुछ देर के लिए सिहर गया। खामोशी टूटी तो उन्होंने अपनी नजरें मेरे चेहरे पर गड़ा दीं। गहरी सांस भरते हुए थर्रथर्राती जुबान से बोले.. जिसको जाना था वो चला गया.. अब मैं क्या कहूं..? (शायद वे कहना चाह रहे थे कि जिंदगी के सफर से, अपनों के बिछड़ने, दिन रात बड़ी होती तनहाइयों से थक गए हैं..) एक बार फिर से खामोशी..। मैं एकटक उनकी तरफ देखता रहा। कुछ देर बाद बोले.. जिंदगी के बहुत इंटरव्यू हो गए.. अब और नहीं..। बहुत थक गया हूं, अब मैं लंबा आराम चाहता हूं।
कहते हैं साफ दिल लोगों को कुदरत की करिश्माई ताकत का अहसास हो जाता है। 20 जुलाई शुक्रवार को जुमे की नमाज भी थी। दोपहर 12 बजे के करीब हुई इस मुलाकात में उनके लफ्ज तो बहुत कम थे लेकिन उनका मतलब बहुत गहरा था। वो जान गए थे कि अब उनका सफर आखिरी मुकाम की ओर है। मंजिल आसपास है। ऊपर वाले ने उनको अपनी पनाह में बुला लिया है। बस पहुंचने की देर है..। इसलिए वे कह रहे थे कि बहुत थक गया हूं..। और यही हुआ भी। उस दिन के ठीक 101 दिन बाद ही उनके इंतकाल की बेहद दुखद खबर मिली। सुनकर ऐसा लगा कि एक बुजुर्ग की सरपरस्ती छिन गई। 29 अक्तूबर की सुबह मैं फिर उसी घर के सामने खड़ा था। दरो-दीवार जानी पहचानी थी लेकिन वह शख्स नहीं था, जिसे हम सब बहुत अदब से अपने शहर की शान कहा करते थे..।
एएमयू में शोक की लहर
प्रख्यात साहित्यकार काजी अब्दुल सत्तार के निधन पर एएमयू में शोक की लहर है। उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किए गए प्रो. काजी अब्दुल सत्तार को उनके प्रख्यात उपन्यासों दाराशिकोह, गालिब, खालिद बिन वलीद तथा सलाहउद्दीन अय्यूबी के लिए उनको विश्व स्तर पर उर्दू साहित्य में अभूतपूर्व ख्याति प्राप्त हुई।
प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के निधन पर एएमयू बिरादरी गहरे शोक में है। एएमयू कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने उनके निधन को एएमयू तथा उर्दू साहित्य के लिए बड़ी क्षति बताते हुए उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है। वह अपने पीछे तीन बेटे व एक बेटी छोड़ गये हैं। उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो. तारिक छतारी ने भी प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया गया। उन्होंने बताया कि प्रो. काजी के सम्मान में शोक सभा उर्दू विभाग में मंगलवार को 12.30 बजे होगी।
प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के निधन पर एएमयू बिरादरी गहरे शोक में है। एएमयू कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने उनके निधन को एएमयू तथा उर्दू साहित्य के लिए बड़ी क्षति बताते हुए उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है। वह अपने पीछे तीन बेटे व एक बेटी छोड़ गये हैं। उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो. तारिक छतारी ने भी प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया गया। उन्होंने बताया कि प्रो. काजी के सम्मान में शोक सभा उर्दू विभाग में मंगलवार को 12.30 बजे होगी।
बड़े अदीबों से खाली हो गया शहर
ज्ञानपीठ विजेता शहरयार, पद्मभूषण गोपाल दास नीरज और पद्मश्री प्रो. काजी अब्दुल सत्तार। अलीगढ़ के लोग इनका नाम फख्र से लेते हैं। अपनी रचनाओं की वजह से तीनों ने वैश्विक पहचान बनाई थी। ये सभी अलीगढ़ के गौरव थे। परंतु काजी अब्दुल सत्तार के जाने के बाद अलीगढ़ बड़े आदमियों से खाली हो गया।
यह कहना है कि एएमयू उर्दू विभाग के प्रो. मेहताब हैदर नकवी का। वह प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के शागिर्द भी रह चुके हैं। उनका कहना है कि 1976 में वह छात्र थे और काजी साहब लेक्चरर थे। उन्होंने अदबी एकेडमी नाम की एक संस्था बनायी थी। मुझे उसका सेक्रेटरी बनाया था। उस संस्था के जलसे उनके घर पर होते थे। उस समय काजी साहब सुलेमान हॉल के सामने पैराडाइज रेस्तरा के ऊपर रहते थे। जलसे में हिंदुस्तान के हिंदी एवं उर्दू के साहित्यकारों को बुलाया जाता था।
वह कहते है कि काजी साहब हिंदी एवं उर्दू साहित्य के बीच पुल का काम करते थे। इसलिए उनके जाने से हिंदी-उर्दू साहित्य ही नहीं बल्कि जनवादी लेखक संघ को भी बड़ी क्षति हुई है। उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं किया। पूरा जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उनका ओढ़ना-बिछौना साहित्य था। प्रो. नकवी कहते है कि एएमयू के उर्दू विभाग में उनके कई शागिर्द आज भी मौजूद है।
यह कहना है कि एएमयू उर्दू विभाग के प्रो. मेहताब हैदर नकवी का। वह प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के शागिर्द भी रह चुके हैं। उनका कहना है कि 1976 में वह छात्र थे और काजी साहब लेक्चरर थे। उन्होंने अदबी एकेडमी नाम की एक संस्था बनायी थी। मुझे उसका सेक्रेटरी बनाया था। उस संस्था के जलसे उनके घर पर होते थे। उस समय काजी साहब सुलेमान हॉल के सामने पैराडाइज रेस्तरा के ऊपर रहते थे। जलसे में हिंदुस्तान के हिंदी एवं उर्दू के साहित्यकारों को बुलाया जाता था।
वह कहते है कि काजी साहब हिंदी एवं उर्दू साहित्य के बीच पुल का काम करते थे। इसलिए उनके जाने से हिंदी-उर्दू साहित्य ही नहीं बल्कि जनवादी लेखक संघ को भी बड़ी क्षति हुई है। उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं किया। पूरा जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उनका ओढ़ना-बिछौना साहित्य था। प्रो. नकवी कहते है कि एएमयू के उर्दू विभाग में उनके कई शागिर्द आज भी मौजूद है।