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योग में जो ओम है, कव्वाली में वही अल्लाह हू
आशीष निगम
Updated Thu, 02 Jun 2016 01:08 AM IST
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योग
- फोटो : अलीगढ़/ब्यूरो
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कव्वाली की कुछ धुनें और कलाम रुहानी सुकून देते हैं। साधना और सुकून का यह मेल कमोबेश वैसा ही है, जैसा योग। ऐसे में जब योग में ओम के उच्चारण पर बहस छिड़ी है, कव्वाली की शानदार प्राचीन विधाओं को याद करने वाले बहुत थोड़े लोग बचे हैं।
करीब आठ सौ साल पहले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के समय में अल्लाह की शान में कव्वाली की कादरी और चिश्ती विधा ने जोर पकड़ा। खासतौर पर खानकाही कव्वाली में ढपली और ताली से छेड़ी जाने वाली धुन और अल्लाह की शान में गाए जाने वाले कलाम रूह को सुकून देते। मशहूर कव्वाल गुलाम हबीब पेंटर कहते हैं कि पहले ढपली और ताली से सुर साधते थे, अब कई दूसरे साज भी शामिल हो गए हैं। अमरोहा के मशहूर कव्वाल डॉ. फहीम वारसी के मुताबिक देशज भाषा में यही चार बैत है।
पाकिस्तान में सर्वाधिक लोकप्रिय इस गायकी में केवल ढपली और ताली से संगीत दिया जाता है। एएमयू के संगीत प्रशिक्षक जॉनी फास्टर के मुताबिक कव्वाली गायन सूफी परंपरा का बेहद असरदार हिस्सा है। बाबा बरछी बहादुर की दरगाह के सचिव नूर मोहम्मद, ईमाम नसीम और पूर्व ईमाम हाफिज हबीब कहते हैं कि गुजरते वक्त के साथ जब ढपली की थाप धीमी हुई और तालियां कमजोर पड़ीं तो कव्वाली में कई आधुनिक वाद्य शामिल हो गए। साज की इस होड़ में रूह को सुकून देने वाली पुरानी विधा जैसे कहीं खो गई है।
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‘जिस तरह योग की शुरुआत ओम से और पूजा की गणेश वंदना से होती है, उसी तरह कादरी परंपरा की खानकाही कव्वाली में ‘हमदे बारी ताला’ गाया जाता है। इसमें अल्लाह हू.. अल्लाह हक.. या किन्हीं और पाक लफ्जों से तान छेड़ी जाती है। ढपली और ताली से पैदा होने वाला अहसास बड़ी आत्मिक शांति देता है।’
- शमीम नईम अजमेरी (दस्तारबंद कव्वाल, दरगाह ख्वाजा मोईनुउद्दीन चिश्ती)
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करीब आठ सौ साल पहले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के समय में अल्लाह की शान में कव्वाली की कादरी और चिश्ती विधा ने जोर पकड़ा। खासतौर पर खानकाही कव्वाली में ढपली और ताली से छेड़ी जाने वाली धुन और अल्लाह की शान में गाए जाने वाले कलाम रूह को सुकून देते। मशहूर कव्वाल गुलाम हबीब पेंटर कहते हैं कि पहले ढपली और ताली से सुर साधते थे, अब कई दूसरे साज भी शामिल हो गए हैं। अमरोहा के मशहूर कव्वाल डॉ. फहीम वारसी के मुताबिक देशज भाषा में यही चार बैत है।
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पाकिस्तान में सर्वाधिक लोकप्रिय इस गायकी में केवल ढपली और ताली से संगीत दिया जाता है। एएमयू के संगीत प्रशिक्षक जॉनी फास्टर के मुताबिक कव्वाली गायन सूफी परंपरा का बेहद असरदार हिस्सा है। बाबा बरछी बहादुर की दरगाह के सचिव नूर मोहम्मद, ईमाम नसीम और पूर्व ईमाम हाफिज हबीब कहते हैं कि गुजरते वक्त के साथ जब ढपली की थाप धीमी हुई और तालियां कमजोर पड़ीं तो कव्वाली में कई आधुनिक वाद्य शामिल हो गए। साज की इस होड़ में रूह को सुकून देने वाली पुरानी विधा जैसे कहीं खो गई है।
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‘जिस तरह योग की शुरुआत ओम से और पूजा की गणेश वंदना से होती है, उसी तरह कादरी परंपरा की खानकाही कव्वाली में ‘हमदे बारी ताला’ गाया जाता है। इसमें अल्लाह हू.. अल्लाह हक.. या किन्हीं और पाक लफ्जों से तान छेड़ी जाती है। ढपली और ताली से पैदा होने वाला अहसास बड़ी आत्मिक शांति देता है।’
- शमीम नईम अजमेरी (दस्तारबंद कव्वाल, दरगाह ख्वाजा मोईनुउद्दीन चिश्ती)