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अब पीएमओ तक पहुंची कुपोषण की आवाज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला अलीगढ़
Updated Mon, 29 Jan 2018 02:14 AM IST
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अमर उजाला का अभियान लगातार रंग ला रहा है। इलाज के लिए पड़ोसी राज्य हरियाणा के आसरे रही बिजौली के गांव सिरसा की लक्ष्मी पुत्री हरिकिशन से लेकर उपचार के अभाव में जान गवां चुकी अकराबाद के सिंहपुर की डॉली पुत्री सूरजपाल तक जिले में कुपोषण अभियान के यह हालात प्रधानमंत्री तक पहुंच गए हैं। पीएमओ में पब्लिक विंग के अवर सचिव अंबुज शर्मा को कार्यवाही की जिम्मेदारी मिली है।
वहीं प्रदेश में विभागीय कबीना मंत्री प्रो. रीता बहुगुणा जोशी से लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा व अनुप्रिया पटेल को भी प्रकरण मेल कर जानकारी दी गई है। अमर उजाला के लगातार खुलासों पर कुपोषण को लेकर स्मार्ट विलेज फाउंडेशन पूरी तरह मैदान में है। फाउंडेशन अध्यक्ष विपिन चौधरी ने पूरा प्रकरण पीएम तक भेजते हुए कुछ सुझाव भी दिए हैं और शीघ्र कार्रवाई की मांग की है।
यह बताईं समस्याएं ः
आरबीएसके टीम जरूरत के समय बच्चों तक नहीं पहुंच रही। टीम पर विजिट पूरी करने का दबाव है, लेकिन उपचार या जांच का कोई दबाव नहीं। उपचार दिलाने में टीम बहुत सुस्त है। टोल फ्री नंबर 18001805145 से प्राप्त शिकायतों पर भी अफसर समय से कार्यवाही नहीं करते। आरबीएसके टीम अनावश्यक दबाव में काम कर रही है। सीएचसी अधीक्षक और वहां का पुराना स्टाफ टीम को मनमाना चलाते हैं। गांवों में एएनएम और आशा कार्यकर्ता भी इस मामले में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, इसलिए ग्राउंड रिपोर्टिंग जीरो है अथवा फर्जी है। जिला अस्पताल तक के डॉक्टर्स कुपोषण की पहचान नहीं कर पा रहे हैं। गंभीर कुपोषण में सिर्फ दवाइयां देकर निपटाया जा रहा है। महत्वपूर्ण योजनाओं को अपडेट करने पर कोई कार्य नहीं दिख रहा। कुपोषणों के हिसाब से उपचार केंद्रों की क्षमता कम है।
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यह भेजे गए सुझाव ः
माइक्रो प्लान ऐसा हो कि जन्म से 2 वर्ष पूरे होने से पहले ही हर बच्चा कुपोषण से बाहर लाया जाए। इसके लिए गांवों में टीम की विजिट से पूर्व 2 बार मुनादी हो और इस तरह 1-1 माह के अंतर से 3 शिविर लगें। जरूरतमंद को 24 घंटे में डीईआईसी या एनआरसी भेजा जाए। कवर हुए क्षेत्र में यदि बगैर उपचार के किसी भी बच्चे की मृत्यु हो तो बिना देर किए आंगनबाड़ी, एएनएम व आशा बहु से लेकर मेडिकल अफसर पर कठोर कार्रवाई हो। आरबीएसके टीम का लक्ष्य 25 दिन में 25 विजिट या 1000 किमी दौड़ने का नहीं, बल्कि विजिट वाले क्षेत्र में हर बच्चे को जन्म से 2 वर्ष होने से पहले उपचारित कराना होना चाहिए। इसमें लापरवाही पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। उपचार न मिलने संबंधी शिकायतों का निस्तारण घंटों में नहीं मिनटों में होना चाहिए। सामान्य मामलों में घंटे लगाए जा सकते हैं, लेकिन कई दिन लगाने वालों पर तुरंत कार्रवाई जरूरी है। साथ ही टोल फ्री नंबर को लिखकर व बोलकर प्रचारित किया जाए। इसे कॉलर ट्यून बनाया जा सकता है। आरबीएसके टीम को सीएचसी अधीक्षकों के दबाव से मुक्त कर स्वतंत्र करना चाहिए। जब सीएचसी के होते हुए ऐसे हालात हैं तो सीएचसी का स्वरूप बदलकर डीईआईसी या एनआरसी कर देना चाहिए। साथ ही इस टीम को डायल 100 जैसी यूनिट भी मिलनी चाहिए। यदि आशा, आंगनबाड़ी व एएनएम ईमानदारी से काम करें तो धरातल पर एक भी बच्चे के साथ अनहोनी नहीं हो सकती। जिन बच्चों का डाटा नहीं उसके लिए यही जिम्मेदार हैं। जिले में एएनएम की कमी पूरी कराकर गांव स्तर के उपकेंद्रों को जल्द शुरू कराना भी जरूरी है। सरकारी से गैर सरकारी सभी डॉक्टर्स को बच्चे को देखते समय अनिवार्य रूप से वजन तौलना चाहिए और ट्रीटमेंट पर्चे पर वजन का उल्लेख रहना चाहिए। वजन तौलने की मशीनें अत्याधुनिक होनी चाहिए, जिसमें वजन सही आये।
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वहीं प्रदेश में विभागीय कबीना मंत्री प्रो. रीता बहुगुणा जोशी से लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा व अनुप्रिया पटेल को भी प्रकरण मेल कर जानकारी दी गई है। अमर उजाला के लगातार खुलासों पर कुपोषण को लेकर स्मार्ट विलेज फाउंडेशन पूरी तरह मैदान में है। फाउंडेशन अध्यक्ष विपिन चौधरी ने पूरा प्रकरण पीएम तक भेजते हुए कुछ सुझाव भी दिए हैं और शीघ्र कार्रवाई की मांग की है।
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यह बताईं समस्याएं ः
आरबीएसके टीम जरूरत के समय बच्चों तक नहीं पहुंच रही। टीम पर विजिट पूरी करने का दबाव है, लेकिन उपचार या जांच का कोई दबाव नहीं। उपचार दिलाने में टीम बहुत सुस्त है। टोल फ्री नंबर 18001805145 से प्राप्त शिकायतों पर भी अफसर समय से कार्यवाही नहीं करते। आरबीएसके टीम अनावश्यक दबाव में काम कर रही है। सीएचसी अधीक्षक और वहां का पुराना स्टाफ टीम को मनमाना चलाते हैं। गांवों में एएनएम और आशा कार्यकर्ता भी इस मामले में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, इसलिए ग्राउंड रिपोर्टिंग जीरो है अथवा फर्जी है। जिला अस्पताल तक के डॉक्टर्स कुपोषण की पहचान नहीं कर पा रहे हैं। गंभीर कुपोषण में सिर्फ दवाइयां देकर निपटाया जा रहा है। महत्वपूर्ण योजनाओं को अपडेट करने पर कोई कार्य नहीं दिख रहा। कुपोषणों के हिसाब से उपचार केंद्रों की क्षमता कम है।
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यह भेजे गए सुझाव ः
माइक्रो प्लान ऐसा हो कि जन्म से 2 वर्ष पूरे होने से पहले ही हर बच्चा कुपोषण से बाहर लाया जाए। इसके लिए गांवों में टीम की विजिट से पूर्व 2 बार मुनादी हो और इस तरह 1-1 माह के अंतर से 3 शिविर लगें। जरूरतमंद को 24 घंटे में डीईआईसी या एनआरसी भेजा जाए। कवर हुए क्षेत्र में यदि बगैर उपचार के किसी भी बच्चे की मृत्यु हो तो बिना देर किए आंगनबाड़ी, एएनएम व आशा बहु से लेकर मेडिकल अफसर पर कठोर कार्रवाई हो। आरबीएसके टीम का लक्ष्य 25 दिन में 25 विजिट या 1000 किमी दौड़ने का नहीं, बल्कि विजिट वाले क्षेत्र में हर बच्चे को जन्म से 2 वर्ष होने से पहले उपचारित कराना होना चाहिए। इसमें लापरवाही पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। उपचार न मिलने संबंधी शिकायतों का निस्तारण घंटों में नहीं मिनटों में होना चाहिए। सामान्य मामलों में घंटे लगाए जा सकते हैं, लेकिन कई दिन लगाने वालों पर तुरंत कार्रवाई जरूरी है। साथ ही टोल फ्री नंबर को लिखकर व बोलकर प्रचारित किया जाए। इसे कॉलर ट्यून बनाया जा सकता है। आरबीएसके टीम को सीएचसी अधीक्षकों के दबाव से मुक्त कर स्वतंत्र करना चाहिए। जब सीएचसी के होते हुए ऐसे हालात हैं तो सीएचसी का स्वरूप बदलकर डीईआईसी या एनआरसी कर देना चाहिए। साथ ही इस टीम को डायल 100 जैसी यूनिट भी मिलनी चाहिए। यदि आशा, आंगनबाड़ी व एएनएम ईमानदारी से काम करें तो धरातल पर एक भी बच्चे के साथ अनहोनी नहीं हो सकती। जिन बच्चों का डाटा नहीं उसके लिए यही जिम्मेदार हैं। जिले में एएनएम की कमी पूरी कराकर गांव स्तर के उपकेंद्रों को जल्द शुरू कराना भी जरूरी है। सरकारी से गैर सरकारी सभी डॉक्टर्स को बच्चे को देखते समय अनिवार्य रूप से वजन तौलना चाहिए और ट्रीटमेंट पर्चे पर वजन का उल्लेख रहना चाहिए। वजन तौलने की मशीनें अत्याधुनिक होनी चाहिए, जिसमें वजन सही आये।