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राष्ट्रीय महिला दिवस: आंखों की आग और रीढ़ की मेहराब में छिपा है असली राज

Sat, 13 Feb 2021 01:26 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, अलीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, अलीगढ़ Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Sat, 13 Feb 2021 01:26 AM IST
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poetry function orgaised on National Women's Day aparajita
अमर उजाला कार्यालय में आयोजित काव्य गोष्ठी उपस्थित कवयित्री। - फोटो : अमर उजाला
दुनिया में अपने वजूद को बचाने के लिए औरत को तमाम मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है। फिर भी वह हालात का मजबूती से सामना करती है और वक्त के साथ निखरती जाती है। प्रेम व ममता की मूर्ति बन समाज को दिशा दिखाती है। लेकिन उसके व्यक्तित्व का असली राज उसकी आंखों की आग और रीढ़ की मेहराब में छिपा होता है।
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राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर तालानगरी स्थित अमर उजाला कार्यालय में शुक्रवार को अमर उजाला अपराजिता-100 मिलियन स्माइल्स के बैनर तले काव्य पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें महिला रचनाकारों ने कविता और अशआर में नारी सशक्तीकरण का रेखांकन किया। भारत कोकिला सरोजनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हुआ था, उन्हीं के जन्मदिन के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।
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मशहूर शायरा रिहाना शाहीन ने टूटे दिल की ख्वाहिशों को यूं अल्फाजों के पंख दिए, मेरी गजलें न गुनगुना तुम, मेरे गीतों से प्यार मत करना, जाने वाले कभी नहीं आते, तुम मेरा इंतजार मत करना...।
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प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. ममता वार्ष्णेय ने अमर उजाला अखबार के प्रति स्नेह को कुछ ऐसे पेश किया, मैं अमर कर दूं उजाला, ऐसा इक अखबार हूं, चंद पन्नों में समेटे पूरा मैं संसार हूं, राष्ट्रहित की बात करना सच बताना काम है, इसलिए ही हर किसी के मैं गले का हार हूं...।

कवयित्री नीता पोरवाल ने माया एंजेलो की कविता असाधारण औरत का अनुवाद सुनाया। इस कविता की निम्नलिखित पंक्तियों को खूब सराहा गया
खूबसूरत औरतें
यह जानने को उत्सुक रहती हैं
कि कहां छिपे हैं मेरे राज
क्योंकि न तो मैं मासूम दिखती हूँ
न ही फैशन मॉडल की तरह मेरी छरहरी काया है
मैं कहती हूँ,
यह राज मेरी आँखों की आग में छिपा है
मेरे व्यक्तित्व का राज तो मेरी रीढ़ की मेहराब में छिपा है।

टीकाराम कन्या महाविद्यालय के हिंदी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर व कवयित्री डॉ. मंजू वनिता ने देशभक्ति से ओतप्रोत कविता सुनाई, जो हुए शहीद राष्ट्रहित पर, उन वीरों को सम्मान दिया, उनकी बेबस विधवाओं का, माताओं का क्या नाम लिया, सच पूछो तो ये आजादी, उनकी कुरबानी का फल है...।

चर्चित कवत्रियी रेणु मिश्रा ने नारी सशक्तीकरण पर यूं सुनाया, वह समझती हैं, सारा घर उनका है और वह अपनी मनमर्जी की मालिक, मगर उन्हें कौन समझाए, कि घर के नेम प्लेट तक पर उनका नाम नहीं होता...।

समाजसेवी व कवयित्री आरती मित्तल ने सुनाया, प्यार बड़ा मनभावन है, आंखों से झलकता सावन है, प्यार वह आस है, हर सांस में जिसका एहसास है प्यार इक ऐसी रीत है, हार कर भी जहां जीत है...।

नवोदित कवयित्री व ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल की छात्रा नव्या शर्मा ने अपनी भावनाएं ऐसे व्यक्त कीं, चिड़िया थी कुछ रूठी रूठी, मां बोली क्या हुआ है बेटी, चिड़िया बोली उड़ना चाहूं, लेकिन फिर भी उड़ ना पाऊं, मां बोली तू है एक लड़की तुझको न अधिकार मिला...।

टीकाराम कन्या महाविद्यालय के हिंदी विभाग की शिक्षिका मिश्कात आबिदी ने गुलाब के फूल की खासियत कुछ ऐसे बताई, वो एक गुलाब जिसने जुल्मो-सितम से बह रहे हर खून को समेट लिया है अपनी रगों में, वो एक गुलाब जो मिट कर भी नहीं मिटता, जो निचोड़ा गया तो, बन गया इत्र की सुगंध और सूखा तो बना दिया गया गुलकंद...।


कवयित्री रेणु मिश्रा के कविता संग्रह का लोकार्पण
राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर चर्चित कवयित्री रेणु मिश्रा के कविता संग्रह ‘जब मैं कोई नहीं हूं’ का लोकार्पण किया गया। कविता संग्रह में 66 कविताएं हैं। सामाजिक सरोकार से यह संग्रह परिपूर्ण है। शायरा रिहाना शाहीन, कवयित्री नीता पोरवाल, डॉ. मंजू शर्मा वनिता, मिश्कात आबिदी प्रेरणा, ममता वार्ष्णेय व नवोदित कवयित्री नव्या शर्मा ने संयुक्त रूप से इस कविता-संग्रह का लोकार्पण किया।
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