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लख्त ए जिगर छोड़ औरों की गोद उजड़ने से बचा रहीं मां..
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बच्चों के साथ सेल्फी लेतीं मां डॉ. अंशू।
- फोटो : CITY OFFICE
आशीष निगम
इस बार का मदर्स डे पूरी दुनिया में चर्चा के केंद्र में है। संकट काल में कोरोना हास्पिटल में तैनात महिला डाक्टर, नर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ पहले एक्टिव क्वारंटीन में रह कर मरीजों का इलाज कर रहे हैं और उसके बाद पैसिव क्वारंटीन में जाकर खुद को सुरक्षित कर रहे हैं। इस तरह से एक बार में ही एक महीने की लंबी ड्यूटी हो रही है। अलीगढ़ में भी ऐसी कई मांएं अपने बच्चों को छोड़ कर एक अनजानी मां के बच्चों की जिंदगी बचाने में जुटी हैं। ऐसी मां के हर जज्बे को सलाम..। इस नेक काम में वो खुद अपनी जान भी जोखिम में डाल रही है। ऐसी मांओं को नमन...।
हमें अपनी मां पर गर्व पर है, वो मरीज भी किसी मां के बेटे हैं...
लखनऊ के आलमबाग में अपनी बुआ से मिलने गए तुषार और तरुण वहां 17 मार्च से फंसे हैं। उनकी मां हेमा पीटर सिंह यहां अतरौली के कोविड-19 हास्पिटल में स्टाफ नर्स हैं। पौने दो महीने से हेमा वीडियो कॉल और फोन से ही बच्चों के साथ जुड़ी हैं। मां अपने दोनों बेटों से तो बेटे मां से मिलने को तरस गए हैं। फोन पर बेटे मां को खुद का बचाव करने की सलाह और मरीजों को भी अच्छे से अच्छा उपचार मुहैया कराने को कहते हैं। हाईस्कूल में पढ़ रहे तुषार और नौंवी के छात्र तरुण को मां की इस भूमिका पर गर्व है। सोशल मीडिया में कोरोना योद्धाओं का सम्मान देख कर दोनों मां पर गर्व करते हैं। यही नहीं पिता पीटर सिंह नगर आयुक्त सत्य प्रकाश पटेल के वाहन चालक हैं, वह भी तमाम संक्रमित इलाकों में घूम रहे हैं। अपने माता-पिता की इस भूमिका को बेटे आंखों से तो नहीं देख पा रहे हैं लेकिन फोन पर उनको सब कुछ पता चल रहा है। हेमा अब 16 मई से पैसिव क्वारंटीन में चली जाएंगी। जहां उनको 14 दिन तक खुद को प्रशासन द्वारा आवंटित होटल के एक कमरे में बंद रखना होगा। पहली जून के बाद ही वह अपने बेटों से मिल पाएंगी। हेमा कहती हैं कि कभी कभी बच्चों की याद में रोना भी आता है। बच्चे भी रो देते हैं लेकिन वह मरीजों की देखभाल में ही अपने बेटों को याद करती हैं कि वह मरीज भी किसी मां के बेटे हैं। जल्द से जल्द ठीक हो जाएं..।
जब उनसे मिलूंगी तब होगा मदर्स डे
अतरौली के कोविड-19 हास्पिटल में स्टाफ नर्स निशा पहली मई से यहां एक्टिव क्वारंटीन ड्यूटी पर हैं। यहां कोरोना के लगभग 12 मरीज हैं, जिसमें तीन महिलाएं हैं। निशा घर पर अपने दो वर्ष के बेटे व्योम और चार वर्ष के बेटे श्रेयांश को छोड़ कर आई हैं। बच्चों की देखभाल के लिए उन्होंने नानी को बुलाया है, पति और उनकी पूरी ससुराल भी इसमें उनका साथ दे रही है। उनका घर अतरौली स्थित कैलाशपति सिनेमा के सामने है। वह कहती हैं कि ड्यूटी के बाद वह दो तीन बार बच्चों से फोन पर बात करती हैं। वीडियो कॉल भी करती हैं। वीडियो में मां को देखने के बाद छोटा बेटा व्योम बहुत रोता है और तोतली आवाज में पूछता है कि तुम कब आओगी..? कई बार वह भी रुआंसी हो जाती हैं। गला रुंध जाता है। वह स्क्रीन पर बच्चों को दुलारती रहती हैं। उन्हें खिलाने और हंसाने में लग जाती है लेकिन बच्चों से दूरी के कारण ‘ममता’ का पेट नहीं भरता है। वह कहतीं हैं कि अस्पताल में तीन मांएं भी कोरोना का इलाज करा रही हैं। वह भी अपने बेटों के लिए फिक्रमंद हैं। उनसे बातचीत भी होती है। वह सभी निशा को दुआएं भी देते हैं कि तुम अपने बच्चों की तरह हमारी देखभाल कर रही हो। मां हो तो ऐसी..। पंद्रह दिन लंबी ड्यूटी के बाद निशा को 14 दिन लंबा पैसिव क्वारंटीन में अकेले ही गुजारना होगा। पहली जून को ही वह अपने बच्चों से मिल पाएंगी। वह उस दिन को यादगार बनाने में जुटी हैं। कहती हैं कि मेरा असली मदर्स डे तब होगा जब वह अपने बच्चों को गोद में लेकर दुलारेंगी और उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाएंगी..।
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मां चाहे बस एक दुआ.. आपके बच्चे सलामत रहे.. तंदुरुस्त रहें..
हरदुआगंज सीएचसी में तैनात स्टाफ नर्स रोली एक महीने बाद अपने एक साल के बेटे यश से मिलीं तो उसको दुलारा और फिर दूध पिलाया। बेटा भी एक महीने बाद मां के आंचल से लिपटा तो मचल गया। पूरा घर मां बेटे के इस मिलन का गवाह बना। सभी खुश थे। रोली तीन अप्रैल से कोरोना मरीजों के उपचार में लगी थीं। एक महीने बाद 4 मई को वह हरदुआगंज स्थित रॉयल होम्स से अपने घर पहुंची। रोली कहती हैं बच्चे को छोड़ कर जाने का मन तो नहीं होता है, लेकिन ड्यूटी भी करनी है। मरीजों को ठीक भी करना है। इससे भी बड़ी बात ये है कि हर मरीज किसी मां की औलाद है। हर मां अपने बच्चे को स्वस्थ्य देखना चाहती है। बच्चा बड़ा हो या छोटा। बस यही एक सोच इस खतरनाक ड्यूटी को भी पूरा कराती है। मरीज बेहतर देखभाल होने से खुश रहते हैं और जल्दी ठीक होते हैं। ठीक होने वाले मरीज जी भर के आशीर्वाद भी देते हैं। वह कहते हैं आपके बच्चे सलामत रहे। तंदुरुस्त रहें। बस ये दुआएं सारा गम भूला देती हैं।
जब बेटे ने बनाया डाक्टर मां का पोट्रेट
सीएमओ कार्यालय में तैनात मनोरोग विशेषज्ञ डा. अंशू इन दिनों जिले में कोरोना मरीजों की रिपोर्टिंग, मॉनीटरिंग और सर्विलांस में लगी हैं। उनका परिवार मेरठ के शास्त्री नगर में है। उनके बड़े बेटे 11 वर्षीय कारुण्य ने मां का कोरोना योद्धा के रूप में एक पोट्रेट बना कर उनको भेजा है। जिसको अंशू अक्सर मोबाइल पर देख कर खुश हो जाती हैं। गुजरे तीन महीने से वह अपने बच्चों से नहीं मिली है। बस फोन पर वीडियो कॉल या बातचीत होती है। छोटा बेटा छह वर्षीय अभ्युदय प्रताप सिंह भी अक्सर मां से खाना, चाय नाश्ता कर लेने के बाबत पूछता है। मां भी फोन पर बच्चों को खाने-पीने और पढ़ाई करने की ताकीद करती हैं। मदर्स डे पर बच्चों को याद कर डा. अंशू ने कहा कि उनके बच्चे घर पर सुरक्षित हैं। अपनी मां के डाक्टर होने की भूमिका को वह समझते हैं। मनोरोग विशेषज्ञ होने के नाते वह बच्चों को ये सब कुछ बेहतर ढंग से समझा पाती हैं और उनकी मनोदशा को भी समझ पाती हैं। परिवार का भरपूर सहयोग होने के कारण वह इस विषम परिस्थितियों में तालमेल बैठा पा रही हैं। मदर्स डे का भरपूर आनंद वह बच्चों के साथ उठाना चाहती हैं लेकिन उससे पहले अपनी डाक्टर की भूमिका को भी पूर्ण रूप से सफल करना चाहती हैं।
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इस बार का मदर्स डे पूरी दुनिया में चर्चा के केंद्र में है। संकट काल में कोरोना हास्पिटल में तैनात महिला डाक्टर, नर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ पहले एक्टिव क्वारंटीन में रह कर मरीजों का इलाज कर रहे हैं और उसके बाद पैसिव क्वारंटीन में जाकर खुद को सुरक्षित कर रहे हैं। इस तरह से एक बार में ही एक महीने की लंबी ड्यूटी हो रही है। अलीगढ़ में भी ऐसी कई मांएं अपने बच्चों को छोड़ कर एक अनजानी मां के बच्चों की जिंदगी बचाने में जुटी हैं। ऐसी मां के हर जज्बे को सलाम..। इस नेक काम में वो खुद अपनी जान भी जोखिम में डाल रही है। ऐसी मांओं को नमन...।
हमें अपनी मां पर गर्व पर है, वो मरीज भी किसी मां के बेटे हैं...
लखनऊ के आलमबाग में अपनी बुआ से मिलने गए तुषार और तरुण वहां 17 मार्च से फंसे हैं। उनकी मां हेमा पीटर सिंह यहां अतरौली के कोविड-19 हास्पिटल में स्टाफ नर्स हैं। पौने दो महीने से हेमा वीडियो कॉल और फोन से ही बच्चों के साथ जुड़ी हैं। मां अपने दोनों बेटों से तो बेटे मां से मिलने को तरस गए हैं। फोन पर बेटे मां को खुद का बचाव करने की सलाह और मरीजों को भी अच्छे से अच्छा उपचार मुहैया कराने को कहते हैं। हाईस्कूल में पढ़ रहे तुषार और नौंवी के छात्र तरुण को मां की इस भूमिका पर गर्व है। सोशल मीडिया में कोरोना योद्धाओं का सम्मान देख कर दोनों मां पर गर्व करते हैं। यही नहीं पिता पीटर सिंह नगर आयुक्त सत्य प्रकाश पटेल के वाहन चालक हैं, वह भी तमाम संक्रमित इलाकों में घूम रहे हैं। अपने माता-पिता की इस भूमिका को बेटे आंखों से तो नहीं देख पा रहे हैं लेकिन फोन पर उनको सब कुछ पता चल रहा है। हेमा अब 16 मई से पैसिव क्वारंटीन में चली जाएंगी। जहां उनको 14 दिन तक खुद को प्रशासन द्वारा आवंटित होटल के एक कमरे में बंद रखना होगा। पहली जून के बाद ही वह अपने बेटों से मिल पाएंगी। हेमा कहती हैं कि कभी कभी बच्चों की याद में रोना भी आता है। बच्चे भी रो देते हैं लेकिन वह मरीजों की देखभाल में ही अपने बेटों को याद करती हैं कि वह मरीज भी किसी मां के बेटे हैं। जल्द से जल्द ठीक हो जाएं..।
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जब उनसे मिलूंगी तब होगा मदर्स डे
अतरौली के कोविड-19 हास्पिटल में स्टाफ नर्स निशा पहली मई से यहां एक्टिव क्वारंटीन ड्यूटी पर हैं। यहां कोरोना के लगभग 12 मरीज हैं, जिसमें तीन महिलाएं हैं। निशा घर पर अपने दो वर्ष के बेटे व्योम और चार वर्ष के बेटे श्रेयांश को छोड़ कर आई हैं। बच्चों की देखभाल के लिए उन्होंने नानी को बुलाया है, पति और उनकी पूरी ससुराल भी इसमें उनका साथ दे रही है। उनका घर अतरौली स्थित कैलाशपति सिनेमा के सामने है। वह कहती हैं कि ड्यूटी के बाद वह दो तीन बार बच्चों से फोन पर बात करती हैं। वीडियो कॉल भी करती हैं। वीडियो में मां को देखने के बाद छोटा बेटा व्योम बहुत रोता है और तोतली आवाज में पूछता है कि तुम कब आओगी..? कई बार वह भी रुआंसी हो जाती हैं। गला रुंध जाता है। वह स्क्रीन पर बच्चों को दुलारती रहती हैं। उन्हें खिलाने और हंसाने में लग जाती है लेकिन बच्चों से दूरी के कारण ‘ममता’ का पेट नहीं भरता है। वह कहतीं हैं कि अस्पताल में तीन मांएं भी कोरोना का इलाज करा रही हैं। वह भी अपने बेटों के लिए फिक्रमंद हैं। उनसे बातचीत भी होती है। वह सभी निशा को दुआएं भी देते हैं कि तुम अपने बच्चों की तरह हमारी देखभाल कर रही हो। मां हो तो ऐसी..। पंद्रह दिन लंबी ड्यूटी के बाद निशा को 14 दिन लंबा पैसिव क्वारंटीन में अकेले ही गुजारना होगा। पहली जून को ही वह अपने बच्चों से मिल पाएंगी। वह उस दिन को यादगार बनाने में जुटी हैं। कहती हैं कि मेरा असली मदर्स डे तब होगा जब वह अपने बच्चों को गोद में लेकर दुलारेंगी और उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाएंगी..।
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हरदुआगंज सीएचसी में तैनात स्टाफ नर्स रोली एक महीने बाद अपने एक साल के बेटे यश से मिलीं तो उसको दुलारा और फिर दूध पिलाया। बेटा भी एक महीने बाद मां के आंचल से लिपटा तो मचल गया। पूरा घर मां बेटे के इस मिलन का गवाह बना। सभी खुश थे। रोली तीन अप्रैल से कोरोना मरीजों के उपचार में लगी थीं। एक महीने बाद 4 मई को वह हरदुआगंज स्थित रॉयल होम्स से अपने घर पहुंची। रोली कहती हैं बच्चे को छोड़ कर जाने का मन तो नहीं होता है, लेकिन ड्यूटी भी करनी है। मरीजों को ठीक भी करना है। इससे भी बड़ी बात ये है कि हर मरीज किसी मां की औलाद है। हर मां अपने बच्चे को स्वस्थ्य देखना चाहती है। बच्चा बड़ा हो या छोटा। बस यही एक सोच इस खतरनाक ड्यूटी को भी पूरा कराती है। मरीज बेहतर देखभाल होने से खुश रहते हैं और जल्दी ठीक होते हैं। ठीक होने वाले मरीज जी भर के आशीर्वाद भी देते हैं। वह कहते हैं आपके बच्चे सलामत रहे। तंदुरुस्त रहें। बस ये दुआएं सारा गम भूला देती हैं।
जब बेटे ने बनाया डाक्टर मां का पोट्रेट
सीएमओ कार्यालय में तैनात मनोरोग विशेषज्ञ डा. अंशू इन दिनों जिले में कोरोना मरीजों की रिपोर्टिंग, मॉनीटरिंग और सर्विलांस में लगी हैं। उनका परिवार मेरठ के शास्त्री नगर में है। उनके बड़े बेटे 11 वर्षीय कारुण्य ने मां का कोरोना योद्धा के रूप में एक पोट्रेट बना कर उनको भेजा है। जिसको अंशू अक्सर मोबाइल पर देख कर खुश हो जाती हैं। गुजरे तीन महीने से वह अपने बच्चों से नहीं मिली है। बस फोन पर वीडियो कॉल या बातचीत होती है। छोटा बेटा छह वर्षीय अभ्युदय प्रताप सिंह भी अक्सर मां से खाना, चाय नाश्ता कर लेने के बाबत पूछता है। मां भी फोन पर बच्चों को खाने-पीने और पढ़ाई करने की ताकीद करती हैं। मदर्स डे पर बच्चों को याद कर डा. अंशू ने कहा कि उनके बच्चे घर पर सुरक्षित हैं। अपनी मां के डाक्टर होने की भूमिका को वह समझते हैं। मनोरोग विशेषज्ञ होने के नाते वह बच्चों को ये सब कुछ बेहतर ढंग से समझा पाती हैं और उनकी मनोदशा को भी समझ पाती हैं। परिवार का भरपूर सहयोग होने के कारण वह इस विषम परिस्थितियों में तालमेल बैठा पा रही हैं। मदर्स डे का भरपूर आनंद वह बच्चों के साथ उठाना चाहती हैं लेकिन उससे पहले अपनी डाक्टर की भूमिका को भी पूर्ण रूप से सफल करना चाहती हैं।

बेटे तुषार और तरूण के साथ मां हेमा ।- फोटो : CITY OFFICE

बेटे व्योम और श्रेयांश के साथ निशा ।- फोटो : CITY OFFICE

बेटे यश के साथ मां रोली ।- फोटो : CITY OFFICE