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Independence Day : मां बीमार है...देखने जा रहा हूं, कहकर शादीपुर से गए थे शहीद-ए-आजम

Thu, 11 Aug 2022 02:24 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो कुमार अतुल, अलीगढ़
कुमार अतुल, अलीगढ़ Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Thu, 11 Aug 2022 02:24 AM IST
सार

Independence Day :जैसे ही आप यह सुनते हैं कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह नेशनल असेंबली में बम फेंकने से बीस दिन पहले तक इसी गांव में गुप्त रूप से सवा साल तक रहे थे वैसे ही यहां की धूलमाटी चंदन बन जाती है। स्वतंत्रता सेनानियों के बड़े मददगार और गांधीवादी जमींदार टोडर सिंह ने उन्हें अनूठे ढंग से शरण दी थी।

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Independence Day : Mother is ill... I am going to see... Sheed-e-Azam went from Shadipur saying it
अलीगढ़ के गांव शादीपुर में बना शहीद सरदार भगत सिंह पार्क । - फोटो : CITY OFFICE

विस्तार

दिल्ली-नोएडा मार्ग पर जट्टारी कस्बे से अंदर लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित शादीपुर वैसे तो ब्रजमंडल के एक आम गांव की मानिंद ही है। लेकिन जैसे ही आप यह सुनते हैं कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह नेशनल असेंबली में बम फेंकने से बीस दिन पहले तक इसी गांव में गुप्त रूप से सवा साल तक रहे थे वैसे ही यहां की धूलमाटी चंदन बन जाती है। स्वतंत्रता सेनानियों के बड़े मददगार और गांधीवादी जमींदार टोडर सिंह ने उन्हें अनूठे ढंग से शरण दी थी। शहीद-ए-आजम ने गांव से विदाई भी बड़े नाटकीय अंदाज में ली थी। उन्होंने गांव वालों को बताया था कि वह बीमार मां को देखने के लिए पंजाब जा रहे हैं।

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शादीपुर के जमींदार टोडर सिंह से कानपुर में हुई थी दोस्ती
गांव के चौधरी योगेंद्र सिंह और वेदवीर सिंह ने अमर उजाला को बताया कि जमींदार और स्वतंत्रता सेनानी टोडर सिंह से भगत सिंह की मुलाकात कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के घर पर हुई थी। भगत सिंह काकोरी कांड और अंग्रेज पुलिस अफसर जेपी सांडर्स की हत्या के आरोपी थे। उन्हें छिपने के लिए किसी गुप्त ठिकाने की तलाश थी। ऐसे में उनके काम आए टोडर सिंह। पहले तो वह भगत सिंह को अलीगढ़ लाए और उसके बाद अपने गांव शादीपुर में। 1928 में आए भगत सिंह ने इस गांव में अपना हुलिया और नाम भी।
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यहां वह बलवंत सिंह के नाम से लगभग डेढ़ साल तक रहे। इस दौरान उन्होंने गांव के बच्चों को शिक्षक बनकर पढ़ाया। बताते हैं कि वह बच्चों को भी भारत की गुलामी और स्वतंत्रता के महत्व के बारे में बताते रहते। टोडर सिंह के खेत और बाग गांव से बाहर थे। एक घेरनुमा घर था। उसी में भगत सिंह ने बलवंत बनकर गुप्तवास के दिन काटे। सामने एक कुआं था। भगत सिंह खुद अपने हाथ से उस कुएं से पानी खींचते और नहाते। मिट्टी का एक अखाड़ा भी उन्होंने बनवाया था जिसमें गांव के बच्चों को वह कुश्ती के गुर भी सिखाए थे।
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बैलगाड़ी में खुर्जा जंक्शन पर बैलगाड़ी से छोड़ा था टोडर सिंह ने
टोडर सिंह के पड़पोेते हरेंद्र प्रताप बताते हैं कि जब भगत सिंह ने मां के बीमार होने की बात कहकर उन्हें देखने के लिए पंजाब जाने की बात कही तो टोडर सिंह ने उन्हें बैलगाड़ी में बैठाकर खुर्जा जंक्शन पर छोड़ा था। पंजाब जाने वाली ट्रेन के बजाय दिल्ली वाली गाड़ी में सवार हो गए थे। इसके लगभग 20 दिन बाद ही खबर आई कि 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ नेशनल एसेंबली में हानिरहित बम फेंका और भागने के बजाय गिरफ्तार हो गए।


इसके बाद का वाकया तो इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। एक बात और, भगत सिंह ने पुलिस कैद में भी कभी अपने शरणदाताओं के नाम उजागर नहीं किए। इससे उनकी चारित्रिक दृढ़ता भी उजागर होती है।

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