{"_id":"69f7bb085e6d26e9f009b529","slug":"medical-stores-are-identified-by-numbers-not-names-aligarh-news-c-2-gur1004-965755-2026-05-04","type":"story","status":"publish","title_hn":"Aligarh News: मेडिकल स्टोर की नाम से नहीं नंबर से होती पहचान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Aligarh News: मेडिकल स्टोर की नाम से नहीं नंबर से होती पहचान
विज्ञापन
जेएन मेडिकल कॉलेज के बाहर मेडिकल स्टोर की दुकान पर पडे नंबर।
- फोटो : samvad
ये कोई नियम नहीं, बल्कि कई दशक से चला आ रहा दवा दलालों के सिंडिकेट का अपना सिस्टम है। मेडिकल कॉलेज परिसर में आने वाले मरीजों को मेडिकल के बाहर दुकान तक आसानी से पहुंचाया जा सके। इसके लिए दुकान की पहचान नाम से नहीं बल्कि नंबर से होती है।
यह अपने तरह का अनोखा प्रयोग है। बाजार में एक नंबर से लेकर आगे तक के करीब सौ मेडिकल स्टोर हैं। हर स्टोर पर क्रमवार नंबर अंकित हैं। ताकि अंदर से मरीज को आसानी से सही ठिकाने तक पहुंचाया जा सके। उसे दुकान खोजने में ज्यादा दिक्कत का सामना न करना पड़े।
जेएन मेडिकल कॉलेज के बाहर मेडिकल रोड के जकरिया मार्केट पर पुलिस चौकी के सामने किसी जमाने में चंद दुकानें हुआ करती थीं। मगर धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता गया। दुकानों की संख्या चौकी से काफी आगे तक पहुंच गई। इसी में मरीज आसानी से दुकान तक कैसे पहुंचे। अंदर से उसे कैसे आसानी से इशारा हो और वह उसी दुकान तक पहुंचे। इसके लिए दुकानों का क्रमवार नंबर दिया गया।
विज्ञापन
सबसे पहली दुकान नंबर-1 से शुरू की गई। इसके बाद जैसे-जैसे दुकानें बढ़ती जा रही हैं, नंबर भी बढ़ता जा रहा है। अब जिन दुकानदारों की अंदर सांठगांठ है। अंदर से मरीज या तीमारदार सीधा पर्चा लेकर आता है। उसे ज्यादा समझाना नहीं पड़ता। बस सीधे उसे दुकान नंबर बताया जाता है और ग्राहक उसी दुकान पर बिना पूछताछ के पहुंच जाता है। इसलिए यह दुकानों की नंबरिंग सिंडिकेट के हिस्से से कम नहीं।
विज्ञापन
यह अपने तरह का अनोखा प्रयोग है। बाजार में एक नंबर से लेकर आगे तक के करीब सौ मेडिकल स्टोर हैं। हर स्टोर पर क्रमवार नंबर अंकित हैं। ताकि अंदर से मरीज को आसानी से सही ठिकाने तक पहुंचाया जा सके। उसे दुकान खोजने में ज्यादा दिक्कत का सामना न करना पड़े।
विज्ञापन
जेएन मेडिकल कॉलेज के बाहर मेडिकल रोड के जकरिया मार्केट पर पुलिस चौकी के सामने किसी जमाने में चंद दुकानें हुआ करती थीं। मगर धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता गया। दुकानों की संख्या चौकी से काफी आगे तक पहुंच गई। इसी में मरीज आसानी से दुकान तक कैसे पहुंचे। अंदर से उसे कैसे आसानी से इशारा हो और वह उसी दुकान तक पहुंचे। इसके लिए दुकानों का क्रमवार नंबर दिया गया।
विज्ञापन
सबसे पहली दुकान नंबर-1 से शुरू की गई। इसके बाद जैसे-जैसे दुकानें बढ़ती जा रही हैं, नंबर भी बढ़ता जा रहा है। अब जिन दुकानदारों की अंदर सांठगांठ है। अंदर से मरीज या तीमारदार सीधा पर्चा लेकर आता है। उसे ज्यादा समझाना नहीं पड़ता। बस सीधे उसे दुकान नंबर बताया जाता है और ग्राहक उसी दुकान पर बिना पूछताछ के पहुंच जाता है। इसलिए यह दुकानों की नंबरिंग सिंडिकेट के हिस्से से कम नहीं।