मां तुझे प्रणाम: खुद तो वतन की आन पे हम मिट गए मगर, सिंदूर उसकी मांग का मिटने नहीं दिया
प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने सुनाया-बस्तियां उजड़ी हुई आबाद हो सकती तो हैं, आ न जाए फिर कोई वहशी जलाने के लिए, भूलकर नफरत अगर आपस में मिल जाएं गले, इससे बेहतर कुछ नहीं दोनों घराने के लिए, गांव से सहरा जमीं से आसमां तक का सफर, क्या नहीं करता परिंदा एक दाने के लिए।
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अमर उजाला मां तुझे प्रणाम के तहत शनिवार को तालानगरी स्थित अमर उजाला कार्यालय में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। अध्यक्षता एएमयू के हिंदी विभाग के शिक्षक प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने की, जबकि संचालन शायर जॉनी फॉस्टर ने किया।
प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने सुनाया-बस्तियां उजड़ी हुई आबाद हो सकती तो हैं, आ न जाए फिर कोई वहशी जलाने के लिए, भूलकर नफरत अगर आपस में मिल जाएं गले, इससे बेहतर कुछ नहीं दोनों घराने के लिए, गांव से सहरा जमीं से आसमां तक का सफर, क्या नहीं करता परिंदा एक दाने के लिए।
शायर जॉनी फॉस्टर ने सुनाया- खुदा ने दी है जो हमको वही पहचान रहने दो, हम इंसा हैं, फकत इंसा हमें इंसान रहने दो।शायरा रिहाना शाहीन ने देशभक्ति से प्रेरित शेर सुनाया- इस तरह मां के दूध की कीमत चुकाई है, हमने कभी तिरंगे को झुकने नहीं दिया, खुद तो वतन की आन पे हम मिट गए मगर, सिंदूर उसकी मांग का मिटने नहीं दिया।
कवयित्री डॉ. मंजू शर्मा वनिता ने सुनाया-क्या भारत देश वही है, हम जिस पर कुर्बान हुए थे, हंसते-हंसते फांसी चढ़कर हम जिस पर बलिदान हुए थे। माटी पूछ रही जन-जन से नेताओं से प्रशासन से क्या भीगी आंखों का सपना सपना हो जाएगा। टीकाराम कन्या महाविद्यालय की हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. मिश्कात आबिदी ने सुनाया- वायु वेग से नभ में लहराते झंडे का मान करो, कितने बलिदानों से पाया यह गौरव तुम ध्यान करो, एक शक्ति बन झुका दिया था देश प्रेमियों ने गोरों को, हिला दिया संकल्प शक्ति से कायर और लुटेरों को।
कवयित्री नीता पोरवाल ने सुनाया-बहुत हुई दुनिया की रस्म और रंजो-गम की बातें आज हो सके तो कहो इससे अलाहिदा कुछ कहो, धुंध में लिपटे ये सुबहो-शाम ये जमीं ये दरख्त ऐसे में जीने की वजह ढूंढते फड़फड़ाते परिंदों के बारे में कुछ कहो। कवयित्री आरती मित्तल ने सुनाया- भारत मां को जब हम फूलों से सजाते हैं, तिरंगा आसमानों पर लहर-लहर लहराते हैं, देश के वीरों की गाथा, फख्र से हम सुनाते हैं, बड़े-बड़े आयोजन कर आजादी का जश्न मनाते है, क्या यह है वो आजादी जिस पर हम इतराते हैं।
कवयित्री नीरा माहेश्वरी ने सुनाया- सरहद पर तैनात प्रहरी वीर जवान से ही हम चैन की नींद सोते रहे, धरती मां का आंचल मैला न हो लाडले खून की होली खेलते रहे, मां भारती का यश गौरव ऊंचा रहे लाल जान की बाजी लगाते रहे, शान से कुर्बान जब तिरंगे में लिपटकर जाबांज लाए जाते रहे। कवयित्री वर्षा अग्रवाल ने पढ़ा-करूं नमन में मैं करूं नमन उस लहू को जो दौड़ता है रगो में जनक बन, फड़कता है भुजाओं में आक्रोश बन, देश की आन के लिए प्रतिबद्ध शत्रु से लेने प्रतिशोध हो जाता है न्यौछावर, मन-वचन कर्म से।
एएमयू के हिंदी विभाग के शोधार्थी आशीष कुमार तिवारी ने पढ़ा- बच्चो, जब जमीन पर इमारतें उतर आएं, तो उन इमारतों के सिर पर, एक गमला मिट्टी भरकर रख देना, ताकि उन्हें एहसास रहे, मिट्टी ही सत्य है, मिट्टी ही शाश्वत है। एएमयू के हिंदी विभाग के शोधार्थी अरुण रंजन कवि ने पढ़ा-अगर बारिश की धार को काट सकते तो, हंसुआ से उन्हें चीर डालता, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था, अब क्या होगा? अब तो गेंहू, चना, मटर, सरसों सब बर्बाद हो जाएगा, और हम भी।