Kalyan Singh: ‘बाबूजी’ को श्रद्धासुमन अर्पित करने को उमड़ेगा सैलाब, कल्याण सिंह की द्वितीय पुण्यतिथि आज
मरणोपरांत पद्म विभूषण पुरस्कार से नवाजे गए पूर्व राज्यपाल व पूर्व सीएम कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को अतरौली के गांव मढ़ौली में हुआ। वे 1967 में पहली बार विधायक बने। इसके बाद उनके सियासी कदम पीछे नहीं हटे और पिछड़े वर्ग में हिंदुत्व-हिंदी पट्टी में भगवा राजनीति की पटकथा लिखने वाले नायक के रूप में उभरे।
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हिंदू हृदय सम्राट के रूप में राजनीतिक कद हासिल करने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ‘बाबूजी’ कल्याण सिंह के देहावसान को दो बरस बीत गए। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 21 अगस्त व पंचांग के अनुसार बाबूजी का देहांत रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले हुआ था। अगले दिन उनका पार्थिव शरीर अलीगढ़ लाया गया था। यहां अहिल्याबाई होल्कर स्पोट्र्स स्टेडियम में अंतिम दर्शन के लिए सैलाब उमड़ पड़ा था। आज उनकी द्वितीय पुण्यतिथि हिंदू गौरव दिवस के रूप में मनाई जा रही है, फिर वही सैलाब अपने बाबूजी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने को नुमाइश मैदान में उमड़ेगा।
मरणोपरांत पद्म विभूषण पुरस्कार से नवाजे गए पूर्व राज्यपाल व पूर्व सीएम कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को अतरौली के गांव मढ़ौली में हुआ। वे 1967 में पहली बार विधायक बने। इसके बाद उनके सियासी कदम पीछे नहीं हटे और पिछड़े वर्ग में हिंदुत्व-हिंदी पट्टी में भगवा राजनीति की पटकथा लिखने वाले नायक के रूप में उभरे। प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बने। बाद में राजस्थान के राज्यपाल रहे। रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले 21 अगस्त 2021 की रात 9:15 बजे लखनऊ पीजीआई में लंबी बीमारी के चलते उन्होंने अंतिम सांस ली।
यह खबर मिलते ही समर्थकों में शोक की लहर दौड़ गई। अगले दिन यानि रक्षाबंधन के दिन 22 अगस्त को उनका शव खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व परिजन अलीगढ़ लेकर आए। यहां रामघाट रोड स्टेडियम में अंतिम दर्शन के लिए शव रखा गया और 23 अगस्त को अंतिम यात्रा यहां से नरौरा गंगा घाट तक गई। जहां राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ। इस बीच अतरौली में भी कुछ देर उनका शव अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था।
आज उन्हीं बाबूजी की दूसरी पुण्यतिथि पर हिंदू गौरव दिवस का आयोजन नुमाइश मैदान में किया जा रहा है। जिसमें पचास हजार से अधिक समर्थकों व अनुयायियों के जुटने का अनुमान है।
ये रहा राजनीतिक सफर, सिर्फ दो चुनाव हारे
अतरौली विधानसभा से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले कल्याण सिंह पहली बार 1962 का चुनाव हारे। फिर 1967, 1969 व 1974 में लगातार अतरौली से विधायक चुने गए। इसके बाद कल्याण सिंह ने राजनीति में ऐसा मील का पत्थर रखा, जो हर किसी नेता के बूते से बाहर की बात है। इस बीच वे आपातकाल में 1975 व 1977 में जेल भी गए। 1977 में चौथी बार फिर जीते और स्वास्थ्य मंत्री बने। इसी बीच एक बार इंदिरा लहर में 1980 का चुनाव भी हारे। 1985 में फिर जीते और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बने। 1989 में जीतकर नेता विधायक दल चुने गए। 1991 में जीत कर मुख्यमंत्री बने। 1993 में नेता विधायक दल और 1996 में फिर जीतकर मुख्यमंत्री व भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। 2000-2001 में राक्रांपा का गठन किया।
2004 में भाजपा से बुलंदशहर से सांसद बने। 2009 में एटा से निर्दल सांसद बने। 2014 में राजस्थान के राज्यपाल बने। दो बार मुख्यमंत्री बने और राजस्थान में पूरे पांच वर्ष और कुछ समय के लिए हिमाचल के राज्यपाल भी रहे। वह कुल दस बार अतरौली से विधायक का चुनाव जीते। कल्याण सिंह पिछड़े वर्ग के बड़े नेता के तौर पर जाने जाते रहे। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा टूटने के बाद कल्याण सिंह हिंदुत्व छवि वाले नेता के रूप में पहचाने गए। उनकी पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा को 2004 व 2007 में विधायक बनाया। वर्तमान में कल्याण सिंह के नाती संदीप सिंह अतरौली से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह लगातार दो बार से उनकी परंपरागत सीट एटा से लोकसभा से सांसद हैं।