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अलीगढ़ः 1962 से अब तक तीन चुनाव हारा कल्याण सिंह का परिवार
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अभिषेक शर्मा
अतरौली विधानसभा सीट से सियासी कदम बढ़ाने वाले बाबूजी के नाम से मशहूर कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल तक बने। एक दौर में उन्हें राम मंदिर आंदोलन के नायक, हिंदू हृदय सम्राट जैसे खिताब से भी नवाजा गया। उनकी कर्मस्थली रही अतरौली सीट पर खुद बाबूजी 12 बार चुनाव लड़े और सिर्फ दो चुनाव हारे। वहीं, जब से उन्होंने अपनी विरासत अपने वंशजों को सौंपी, तब से सिर्फ एक चुनाव उनकी पुत्रवधू हारी हैं। खास बात है कि उन्हें पहला चुनाव दिग्गज यादव नेता बाबू सिंह ने हराया तो उनकी पुत्रवधू को बाबू सिंह के बेटे वीरेश यादव ने हराया।
अतरौली सीट लोध बहुल है। मगर इसमें जाट, ब्राह्मण, मुसलिम, अनुसूचित जाति के मतदाताओं के साथ-साथ अब 2012 में हुए नए परिसीमन में बिजौली ब्लॉक के यादव मतदाता भी काफी संख्या में शामिल हो गए हैं। आजादी के बाद पहली बार हुए चुनाव में अतरौली कस्बे के प्रमुख समाजसेवी, जमींदार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व म्यूनिसपल बोर्ड के चेयरमैन राजाराम अरोरा को कांग्रेस ने चुनाव लड़ाया और वे विधायक बने। बाद में उनके परिवार के अतरौली से पलायन के चलते कांग्रेस ने सिकंदराराऊ के दिग्गज नेता नेकराम शर्मा को यहां उतारा और दूसरा चुनाव कांग्रेस ने जीता। इसके बाद इस सीट पर यादव नेता बाबू सिंह ने सोशलिस्ट पार्टी से कल्याण सिंह को हराकर जीत दर्ज की। 1967 के चुनाव में बाबू सिंह गंगीरी सीट से चुनाव लड़े। इसके बाद अतरौली से कल्याण सिंह लगातार चार बार विधायक बने। क्षेत्र में उनकी पैठ का आलम ये रहा कि कोई उनके सामने चुनाव लड़ने से पहले सोचता था। 1980 के चुनाव में आई इंदिरा लहर ने कल्याण सिंह को झटका दिया और उन्हें हराकर अनवार खां विधायक बने। मगर 1985 के चुनाव से फिर कल्याण सिंह अपनी राह पर चल पड़े और 2002 तक लगातार छह बार इस सीट पर जीत दर्ज की। इनमें से 2002 का चुनाव वे भाजपा से अलग होकर अपनी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से जीते थे।
2004 के चुनाव में कल्याण सिंह के बुलंदशहर सांसद बनने से अतरौली सीट खाली हुई तो उनकी पुत्रवधु प्रेमलता वर्मा को उपचुनाव में जीत मिली। वे 2007 का दूसरा चुनाव भी जीतीं। मगर 2012 के चुनाव नए परिसीमन से हुए और इस चुनाव में कल्याण सिंह व उनका परिवार वोटरों का रुझान समझ नहीं पाया। इसके चलते वीरेश यादव से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2017 के चुनाव में कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह, जो वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, ने वापसी कर सीट कब्जाई है। इस तरह कल्याण सिंह व उनका परिवार अब तक 16 चुनाव इस सीट पर लड़ा है, जिसमें से सिर्फ तीन चुनाव हारा है।
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1952 में कांग्रेस से राजाराम अरोरा
1957 में कांग्रेस से नेकराम शर्मा
1962 में सोशलिस्ट पार्टी से बाबू सिंह
1967 में भारतीय जनसंघ से कल्याण सिंह
1969 में भारतीय जनसंघ से कल्याण सिंह
1974 में भारतीय जनसंघ से कल्याण सिंह
1977 में जेएनपी से कल्याण सिंह
1980 में कांग्रेस से अनवार खां
1985 में भाजपा से कल्याण सिंह
1989 में भाजपा से कल्याण सिंह
1991 में भाजपा से कल्याण सिंह
1993 में भाजपा से कल्याण सिंह
1996 में भाजपा से कल्याण सिंह
2002 में राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से कल्याण सिंह
2004 में भाजपा से प्रेमलता वर्मा (उपचुनाव)
2007 में भाजपा से प्रेमलता वर्मा
2012 में सपा से वीरेश यादव
2017 में भाजपा से संदीप सिंह
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अतरौली विधानसभा सीट से सियासी कदम बढ़ाने वाले बाबूजी के नाम से मशहूर कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल तक बने। एक दौर में उन्हें राम मंदिर आंदोलन के नायक, हिंदू हृदय सम्राट जैसे खिताब से भी नवाजा गया। उनकी कर्मस्थली रही अतरौली सीट पर खुद बाबूजी 12 बार चुनाव लड़े और सिर्फ दो चुनाव हारे। वहीं, जब से उन्होंने अपनी विरासत अपने वंशजों को सौंपी, तब से सिर्फ एक चुनाव उनकी पुत्रवधू हारी हैं। खास बात है कि उन्हें पहला चुनाव दिग्गज यादव नेता बाबू सिंह ने हराया तो उनकी पुत्रवधू को बाबू सिंह के बेटे वीरेश यादव ने हराया।
अतरौली सीट लोध बहुल है। मगर इसमें जाट, ब्राह्मण, मुसलिम, अनुसूचित जाति के मतदाताओं के साथ-साथ अब 2012 में हुए नए परिसीमन में बिजौली ब्लॉक के यादव मतदाता भी काफी संख्या में शामिल हो गए हैं। आजादी के बाद पहली बार हुए चुनाव में अतरौली कस्बे के प्रमुख समाजसेवी, जमींदार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व म्यूनिसपल बोर्ड के चेयरमैन राजाराम अरोरा को कांग्रेस ने चुनाव लड़ाया और वे विधायक बने। बाद में उनके परिवार के अतरौली से पलायन के चलते कांग्रेस ने सिकंदराराऊ के दिग्गज नेता नेकराम शर्मा को यहां उतारा और दूसरा चुनाव कांग्रेस ने जीता। इसके बाद इस सीट पर यादव नेता बाबू सिंह ने सोशलिस्ट पार्टी से कल्याण सिंह को हराकर जीत दर्ज की। 1967 के चुनाव में बाबू सिंह गंगीरी सीट से चुनाव लड़े। इसके बाद अतरौली से कल्याण सिंह लगातार चार बार विधायक बने। क्षेत्र में उनकी पैठ का आलम ये रहा कि कोई उनके सामने चुनाव लड़ने से पहले सोचता था। 1980 के चुनाव में आई इंदिरा लहर ने कल्याण सिंह को झटका दिया और उन्हें हराकर अनवार खां विधायक बने। मगर 1985 के चुनाव से फिर कल्याण सिंह अपनी राह पर चल पड़े और 2002 तक लगातार छह बार इस सीट पर जीत दर्ज की। इनमें से 2002 का चुनाव वे भाजपा से अलग होकर अपनी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से जीते थे।
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2004 के चुनाव में कल्याण सिंह के बुलंदशहर सांसद बनने से अतरौली सीट खाली हुई तो उनकी पुत्रवधु प्रेमलता वर्मा को उपचुनाव में जीत मिली। वे 2007 का दूसरा चुनाव भी जीतीं। मगर 2012 के चुनाव नए परिसीमन से हुए और इस चुनाव में कल्याण सिंह व उनका परिवार वोटरों का रुझान समझ नहीं पाया। इसके चलते वीरेश यादव से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2017 के चुनाव में कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह, जो वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, ने वापसी कर सीट कब्जाई है। इस तरह कल्याण सिंह व उनका परिवार अब तक 16 चुनाव इस सीट पर लड़ा है, जिसमें से सिर्फ तीन चुनाव हारा है।
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1952 में कांग्रेस से राजाराम अरोरा
1957 में कांग्रेस से नेकराम शर्मा
1962 में सोशलिस्ट पार्टी से बाबू सिंह
1967 में भारतीय जनसंघ से कल्याण सिंह
1969 में भारतीय जनसंघ से कल्याण सिंह
1974 में भारतीय जनसंघ से कल्याण सिंह
1977 में जेएनपी से कल्याण सिंह
1980 में कांग्रेस से अनवार खां
1985 में भाजपा से कल्याण सिंह
1989 में भाजपा से कल्याण सिंह
1991 में भाजपा से कल्याण सिंह
1993 में भाजपा से कल्याण सिंह
1996 में भाजपा से कल्याण सिंह
2002 में राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से कल्याण सिंह
2004 में भाजपा से प्रेमलता वर्मा (उपचुनाव)
2007 में भाजपा से प्रेमलता वर्मा
2012 में सपा से वीरेश यादव
2017 में भाजपा से संदीप सिंह