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कल्याण सिंह का राजनीतिक सफर: शिक्षक से सूबे में पिछड़ों की सियासत के सिकंदर बने रामभक्त, अधूरी रह गई ये इच्छा

Mon, 05 Jan 2026 02:24 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: शाहरुख खान Updated Mon, 05 Jan 2026 02:24 PM IST
सार

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की आज 94वीं जयंती है। रामभक्त कल्याण सिंह शिक्षक से सूबे में पिछड़ों की सियासत के सिंदकर बने थे। कल्याण सिंह ने पद पर बने रहने के लिए कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलवाने से इन्कार कर दिया।

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Kalyan Singh Political Journey From Teacher to the Architect of Backward Politics in up News in Hindi
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की 94वीं जयंती आज - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरा व दो बार सूबे के मुख्यमंत्री रहे रामभक्त कल्याण सिंह का सियासी सफर संघर्षों से भरा रहा। इसी संघर्ष का परिणाम रहा कि वे संघ के स्वयं सेवक और इंटर कॉलेज के शिक्षक से लेकर सूबे में पिछड़ों की सियासत के मास्टर तक बने। 
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देश की सियासत में उन्हें हिंदुत्व के नायक का खिताब दिया गया। पद के लिए उन्होंने न कभी उसूलों से समझौता किया और न राजनीति से। वे हिंदू हृदय सम्राट तक कहलाए। अतरौली तहसील के गांव मढ़ौली गांव में साधारण किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह प्रदेश की राजनीति के शिखर पर पहुंचे। 
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बचपन में राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ से जुड़े। फिर उच्च शिक्षा हासिल कर अतरौली के एक इंटर कॉलेज में अध्यापक बने। 1967 में पहली बार अतरौली से विधायक बने। आपातकाल में 21 महीने तक अलीगढ़ व बनारस की जेल में रहे। 
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जनसंघ से भाजपा के गठन के बाद प्रदेश संगठन महामंत्री व प्रदेशाध्यक्ष तक रहकर गांव-गांव घूमकर भाजपा की जड़ें मजबूत कीं। विशाल वट वृक्ष बनी उसी भाजपा को कल्याण सिंह व उनके सहयोगियों ने ही शुरुआती दिनों में सींचा था जब देश में भाजपा का उभार हुआ। 
 

1991 में वे मुख्यमंत्री बने। कल्याण सिंह के साथ काम कर चुके लोग बताते हैं कि उन्होंने भाजपा को खड़ा करने में दिन रात एक किया। आज उसी मेहनत का परिणाम है कि भाजपा यहां खड़ी है।
 

मुलायम के खिलाफ पिछड़ों को जोड़ा
भाजपा के गठन के समय से भाजपा में सक्रिय रहे व उस समय युवा मोर्चा में जिलाध्यक्ष बने योगेश शर्मा एडवोकेट बताते हैं कि कल्याण सिंह शिक्षक होने के साथ-साथ राजनीति में भी मास्टर थे। जब कलराज मित्र को प्रदेशाध्यक्ष बनाया जा रहा था तो पार्टी का एक खेमा इस बात से नाराज था। 
 

बाद में कलराज मिश्र का नामांकन वापस कराकर कल्याण सिंह को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने मुलायम सिंह के खिलाफ काम कर गैर यादव सभी पिछड़ों को एकत्रित किया। इसी का परिणाम रहा कि मात्र पांच वर्ष की मेहनत में पार्टी ने प्रदेश में सरकार बनाई। पार्टी ने उनकी मेहनत को ध्यान में रखकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।
 

अधूरी रह गई रामलला के दर्शन की अंतिम इच्छा
कल्याण सिंह ने पद पर बने रहने के लिए कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलवाने से इन्कार कर दिया। विवादित ढांचे के विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद को ठोकर मार दी। हालांकि अयोध्या के निर्माणाधीन मंदिर में विराजमान रामलला के दर्शन करने की उनकी इच्छा अधूरी रह गई। 89 वर्ष की उम्र में 21 अगस्त 2021 की देर शाम बीमारी के चलते उनका लखनऊ में देहांत हो गया।

भाजपा से दो बार हुए नाराज
कल्याण सिंह 1996 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। 1999 में मतभेद होने पर भाजपा छोड़कर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का गठन किया। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की मौजूदगी में भाजपा में पुन: वापसी हुई। उसी वर्ष बुलंदशहर से जीतकर पहली बार संसद में पहुंचे। उचित सम्मान न मिलने से आहत कल्याण 2009 में दूसरी बार भाजपा छोड़ मुलायम सिंह यादव के करीब गए।

इस बार एटा से निर्दलीय निर्वाचित होकर दूसरी बार सांसद बने। फिर राष्ट्रीय जनक्रांति पार्टी का गठन कर 2012 में विधानसभा चुनाव लड़ा। 2013 में कल्याण सिंह की पुन: भाजपा में वापसी हुई। बाद में उन्हें राजस्थान व हिमाचल का राज्यपाल तक बनाया।

नकल रोकने के लिए लाए अध्यादेश
भाजपा संगठन में युवा नेता के रूप में सक्रिय सुनील पांडेय बताते हैं कि जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने तो नकल के लिए बदनाम अतरौली को ध्यान में रखकर तत्कालीन शिक्षा मंत्री के सहयोग से नकल अध्यादेश लागू कराया। उनके समय में गुंडा बदमाश या तो प्रदेश छोड़कर भाग गए या जेल में थे। वह कभी गलत लोगों को पैरवी पसंद नहीं करते थे।
 

कल्याण सिंह का राजनीतिक सफर
  • 1967, 69 व 74 में तीन बार विधायक।
  • 1975 से 77 तक आपातकाल में मीसा बंदी।
  • 1977 में चौथी बार विधायक, स्वास्थ्य मंत्री।
  • 1985 में पांचवीं बार विधायक प्रदेश अध्यक्ष।
  • 1989 में छठवीं बार विधायक नेता विधायक दल।
  • 1991 में सातवीं बार विधायक, मुख्यमंत्री बने।
  • 1993 में आठवीं बार विधायक, नेता विधायक दल।
  • 1996 में नौवीं बार विधायक, मुख्यमंत्री-भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
  • 2000-01 में राक्रांपा अध्यक्ष बने।
  • 2004 में बुलंदशहर से भाजपा से सांसद।
  • 2009 में एटा से निर्दल सांसद निर्वाचित।
  • 2014 में राजस्थान के राज्यपाल बनाए गए।
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