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बांस की पिचकारी बनवाकर होली खेलते थे जहांगीर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला अलीगढ़
Updated Mon, 19 Feb 2018 02:27 AM IST
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इतिहास की पुस्तक में राजा मुहम्मद शाह के होली खेलने की तस्वीर की पेंटिंग।
- फोटो : फाइल फोटो
होली हिंदुस्तान का रंग है जिसका निखार पूरी दुनिया में है। होली मुगल बादशाहों के समय में कैसे होती थी, इसी विषय पर अमर उजाला ने प्रख्यात इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश।
अमर उजाला: मुगलकाल में होली कैसे खेली जाती थी?
प्रो. इरफान हबीब: उस समय मवेशी के सींग के खोल में रंग भरकर फेंकने का जिक्र मिलता है। बाद में जहांगीर ने बांस की पिचकारी बनवाई। मौजूदा समय में जो हाथ की पिचकारी देखने को मिलती है यह वही है। बस उस समय वह बांस की होती थी। जहांगीर के अलावा मो. शाह के होली खेलने की पेंटिंग्स भी मिलती हैं।
अमर उजाला: यह लोग क्या जनता के साथ होली खेलते थे या दरबारियों के साथ ही?
प्रो. इरफान हबीब: जाहिर है दरबारी और राजाओं के साथ या हरम में होली खेलते थे। जनता के बीच खुले तौर पर जाना उस समय संभव नहीं था। सैनिकों के आपस में होली खेलने का जिक्र मिलता है।
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अमर उजाला: कोई दिलचस्प वाकया इतिहास में मिलता हो?
प्रो. इरफान हबीब: देखिए अलग से तो कोई ऐसा उल्लेख नहीं है, लेकिन विवरण मिलता है कि सैनिकों ने बाजार में जमकर होली खेली। वह इतने मस्ती में हो गए कि आम जनता को परेशानी होने लगी। तो इसकी शिकायत बादशाह तक पहुंची। जिसको बेहद गंभीरता से लिया गया। फिर इस पर कार्रवाई भी की गई क्योंकि सैनिकों को छावनी में ही होली खेलने की इजाजत थी। इस बात का जिक्र मिलता है।
अमर उजाला: क्या यह वैसा ही था जैसे आज पुलिस होली खेलती है?
प्रो. इरफान हबीब: देखिए पुुलिस की होली तो मैं नहीं जानता लेकिन हां सैनिकों के होली खेलने के स्पष्ट जिक्र मिलते हैं।
अमर उजाला: उस समय की होली में और आज की होली में अंतर?
प्रो. इरफान हबीब: उस समय इतना शोरगुल नहीं था। गीत संगीत होता था। दूसरी बात का जिक्र मिलता है कि उस समय के रंग आसानी से साफ हो जाया करते थे। अगर कपड़े से झाड़ दें तो साफ हो जाया करते होंगे। लेकिन सुना है अब तो होली पर ऐसे रंग इस्तेमाल करते हैं कि कई-कई दिनों तक साफ नहीं होते।
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अमर उजाला: मुगलकाल में होली कैसे खेली जाती थी?
प्रो. इरफान हबीब: उस समय मवेशी के सींग के खोल में रंग भरकर फेंकने का जिक्र मिलता है। बाद में जहांगीर ने बांस की पिचकारी बनवाई। मौजूदा समय में जो हाथ की पिचकारी देखने को मिलती है यह वही है। बस उस समय वह बांस की होती थी। जहांगीर के अलावा मो. शाह के होली खेलने की पेंटिंग्स भी मिलती हैं।
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अमर उजाला: यह लोग क्या जनता के साथ होली खेलते थे या दरबारियों के साथ ही?
प्रो. इरफान हबीब: जाहिर है दरबारी और राजाओं के साथ या हरम में होली खेलते थे। जनता के बीच खुले तौर पर जाना उस समय संभव नहीं था। सैनिकों के आपस में होली खेलने का जिक्र मिलता है।
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अमर उजाला: कोई दिलचस्प वाकया इतिहास में मिलता हो?
प्रो. इरफान हबीब: देखिए अलग से तो कोई ऐसा उल्लेख नहीं है, लेकिन विवरण मिलता है कि सैनिकों ने बाजार में जमकर होली खेली। वह इतने मस्ती में हो गए कि आम जनता को परेशानी होने लगी। तो इसकी शिकायत बादशाह तक पहुंची। जिसको बेहद गंभीरता से लिया गया। फिर इस पर कार्रवाई भी की गई क्योंकि सैनिकों को छावनी में ही होली खेलने की इजाजत थी। इस बात का जिक्र मिलता है।
अमर उजाला: क्या यह वैसा ही था जैसे आज पुलिस होली खेलती है?
प्रो. इरफान हबीब: देखिए पुुलिस की होली तो मैं नहीं जानता लेकिन हां सैनिकों के होली खेलने के स्पष्ट जिक्र मिलते हैं।
अमर उजाला: उस समय की होली में और आज की होली में अंतर?
प्रो. इरफान हबीब: उस समय इतना शोरगुल नहीं था। गीत संगीत होता था। दूसरी बात का जिक्र मिलता है कि उस समय के रंग आसानी से साफ हो जाया करते थे। अगर कपड़े से झाड़ दें तो साफ हो जाया करते होंगे। लेकिन सुना है अब तो होली पर ऐसे रंग इस्तेमाल करते हैं कि कई-कई दिनों तक साफ नहीं होते।