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अलीगढ़ से भी जुड़ा है बौद्धकाल का इतिहास

Thu, 27 May 2021 01:47 AM IST
राजेश सिंह न्यूूज डेस्क, राजा तिवारी, अलीगढ़।
न्यूूज डेस्क, राजा तिवारी, अलीगढ़। Published by: राजेश सिंह Updated Thu, 27 May 2021 01:47 AM IST
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History of Buddhist period is also associated with Aligarh
जिला पंचायत परिसर में स्थापित खुदाई में मिली बुद्ध की प्रतिमा। - फोटो : Rupesh
अलीगढ़ जिले से भी बौद्धकाल का इतिहास जुड़ा है। पुरातत्व की खुदाई में अलीगढ़ जिले के विभिन्न क्षेत्रों से मिले अवशेष बौद्धकाल से जुड़े होने का सबूत देते हैं। इतना ही नहीं, गोरई गांव में हुई खुदाई में मिली दो मूर्तियों को जिला पंचायत परिसर में स्थापित किया गया है। इसका जिक्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे धौलपुर के प्रो. चिंतामणि शुक्ल ने अपनी किताब अलीगढ़ जनपद का राजनैतिक इतिहास में भी वर्णन किया है।
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बुधवार को महात्मा गौतम बुद्ध से जुड़े अनुयायियों ने हर्षोल्लास के साथ घर में रहकर बुद्ध पूर्णिमा मनाई। अब सवाल उठता है कि क्या अलीगढ़ में कभी बौद्धकाल या महात्मा बुद्ध के अनुयायी यहां रहकर अपने धर्म का प्रचार-प्रसार किया करते थे। यह तो जवाब मिलता है कि यहां बौद्धकाल का प्रचार-प्रसार हुआ है, लेकिन कितना व्यापक था और किस स्थान पर था, इसका जवाब थोड़ा मुश्किल है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रो. चिंतामणि शुक्ल की किताब में मिलता है कि अलीगढ़ जनपद में बौद्धकाल से संबंधित कई अवशेष यहां से मिले हैं। सासनी के पूर्व में स्थित गोहन खेड़ा के बड़े टीले से बौद्धकालीन एक प्राचीन मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए।
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इतना ही नहीं अलीगढ़ पुराने शहर से 12 मील दूर करमू और धरमू नाम की दो प्राचीन इमारतों के खंडहरों में जैन और बौद्धकालीन कुछ मूर्तियां मिलीं। जो इस जनपद को जैन और बौद्धकालीन युग से संबंधित होना सिद्ध करती हैं। इसके अतिरिक्त महरावल, पंजूपुर और खेरेश्वर के पास तथा रामगढ़ किले के निकट अनेक मूर्तियां तथा मूर्तियों के अवशेष मिले। इसके साथ ही गोरई ग्राम में एक बहुत बड़े टीले की खुदाई में जैन और बौद्ध मूर्तियां प्राप्त हुईं। यह सभी सामग्री मथुरा संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
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चिंतामणि शुक्ल लिखते हैं कि अलीगढ़ जिला पंचायत परिषद के कार्यालय में भी इस नगर के आसपास मिली हुई मूर्तियां संग्रहित की गईं। उन्होंने अलीगढ़ जनपद के पुरातत्व की खोज में एएमयू के प्रशंसनीय योगदान का भी जिक्त्रस् किया है। इसके अलावा लिखा है कि सातवीं शताब्दी के दूसरे सुप्रसिद्ध चीनी यात्री ह्नेन त्सांग ने गंगा और यमुना के मध्य बौद्ध धर्म के प्रचार दुर्ग कर्मू-धनु का उल्लेख किया है। यह कर्मू-धनु स्थान अलीगढ़ के गोरई नामक गांव को कहा गया है। जबकि भांखरी गांव में पुरातत्व की दृष्टि से पांचवीं शताब्दी की विश्वरूप विष्णु की मूर्ति मिली है। जिसे मथुरा पुरातत्व संग्रहालय में सुरक्षित किया गया है। यह मूर्ति गुप्तकाल की है।

 
जिला पंचायत में मूर्तियों का संरक्षण या अनदेखी
-प्रो. चिंतामणि शुक्ल की किताब से जानकारी मिली तो उसके बाद अमर उजाला टीम ने जिला पंचायत परिसर का भ्रमण किया। यहां ठा. महीपाल सिंह की प्रेरणा से दो मूर्तियों का संरक्षण करना बताया गया। जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर ठा. महीपाल सिंह 24 जून 1989 से 22 मई 1995 तक रहे। संभवत: इन मूर्तियों का संरक्षण भी इसी समय किया गया होगा। यहां जानकारी की तो कोई जवाब नहीं दे पाया कि यह मूर्तियां कब की हैं और कहां की हैं। जबकि यहां काम करने वाले कर्मचारियों ने बताया कि 30 साल से यह मूर्तियां यहीं देख रहे हैं। इस दौरान एक बात और सामने आई की यह मूर्तियां बाहर खुले में रखी हैं। नाम मात्र के लिए इनके ऊपर टिन शेड की छाया है। चारों तरफ से खुला हुआ है। मूर्तियों पर पेंट भी कर दिया गया है। महात्मा बुद्ध की प्रतिमा के निचले हिस्से से पेंट छूट गया है। जिससे पता चला कि यह प्रतिमा पाषाण की हैं। संरक्षित करने की बात तो किताब में की गई है, लेकिन यहां यह मूर्तियों खुले में हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इन मूर्तियों का संरक्षण किया गया है अथवा इनकी अनदेखी की जा रही है।




-  प्रो. चिंतामणि शुल्क की लेखनी पर संदेह नहीं किया जा सकता है। अलीगढ़ से खुदाई में कई सारे अवशेष भी मिले हैं, जिनके मुताबिक बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रचार-प्रसार के संकेत मिले हैं। कितना व्यापक था और कौन सा स्थान था, यह कहना संभव नहीं है, लेकिन इसे नकारा नहीं जा सकता कि अलीगढ़ में कभी बौद्ध धर्म का भी प्रभाव रहा होगा। क्योंकि मैंने भी अलीगढ़ और आसपास जुड़े क्षेत्रों में मिले अवशेषों का अध्ययन किया है। जिला पंचायत परिसर में अगर प्राचीन मूर्तियों को पेंट करवा दिया गया है तो यह गलत है। क्योंकि ऐतिहासिक वस्तुएं अपने रूप में ही अच्छी लगती हैं। इसीलिए इनके संरक्षण के लिए काफी सावधानियां बरतनी चाहिए। 
-डॉ. बिशन बहादुर सक्सेना, रिटायर्ड विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, श्री वार्ष्णेय कालेज अलीगढ़।
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