{"_id":"611033b58ebc3e73d357f15a","slug":"hindi-hain-hum-city-office-news-ali2702256109","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिंदी हैं हम : कौड़ियागंज में जैनेंद्र के रचना संसार की याद दिलाता स्मृति द्वार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हिंदी हैं हम : कौड़ियागंज में जैनेंद्र के रचना संसार की याद दिलाता स्मृति द्वार
विज्ञापन
जैनेंद्र।
- फोटो : CITY OFFICE
जिला मुख्यालय से करीब 26 किलोमीटर दूर छोटी सी नगर पंचायत कौड़ियागंज है। कौड़ियागंज की यही पावन भूमि जन्मभूमि है एक ऐसे बालक की, जो अभावों में जिया, पिता का साया चार माह की उम्र में ही उठ गया था। मां ने पाला। मामा ने पुत्र की तरह स्नेह दिया, सभी प्रबंध किए, जो उस समय वे कर सकते थे। यही बालक आगे चलकर जैनेंद्र के नाम से विश्व पटल पर प्रसिद्ध हुआ। साहित्यकार और स्वाधीनता सेनानी जैनेंद्र का कौड़ियागंज स्थित स्मृति द्वार उनके साहित्य संसार की याद दिलाता। याद ही नहीं दिलाता, बल्कि हम सबको गौरवान्वित भी करता है।
कौड़ियांगज में 2 जनवरी 1905 को जैन परिवार में प्यारेलाल के यहां एक बालक का जन्म हुआ, परिवार में खुशियां मनाई गईं। नाम रखा गया आनंदीलाल। आनंदीलाल जब चार माह के थे तभी पिता प्यारेलाल का असमय निधन हो गया। परिवार पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। पास ही के कस्बे अतरौली के छिपैटी के जैन परिवार में उनकी ननिहाल थी। अतरौली के पुनीत जैन बताते हैं कि पिता के निधन के बाद उनके मामा उन्हें अतरौली ले आए। बाद में उनकी शिक्षा का प्रबंध उनके ही मामा ने जैन गुरुकुल ऋ षि ब्रह्मचर्याश्रम हस्तिनापुर में किया। यहां सात साल तक जैनेंद्र ने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसी गुरुकुल में उनको आनंदीलाल से ‘जैनेंद्र’ नाम दिया गया। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद अध्ययन के लिए काशी गए। दो वर्षों तक काशी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। स्वाधीनता आंदोलन में वे कई बार जेल गए। जेल में ही इन्हें लिखने की प्रेरणा मिली।
1929 में इनका विवाह भगवती देवी से हुआ। डॉ. केएम मुंशी व प्रेमचंद के साथ मिलकर महात्मा गांधी की अध्यक्षता में भारतीय साहित्य परिषद की स्थापना की। प्रेमचंद की मृत्यु के बाद हंस का संपादन शुरू किया। जैनेंद्र द्वारा रचित उपन्यासों में ‘परख’ ‘तपोभूमि’, ‘सुनीता’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’, ‘त्यागपत्र’ ‘विवर्त’, ‘व्यतीत’, ‘जयवर्धन’, ‘अनाम स्वामी’, ‘मुक्तिबोध’, ‘अनन्तर’, ‘यामा’, ‘दशार्क’ प्रमुख हैं। त्यागपत्र उपन्यास से उनको खासी लोकप्रियता मिली, जबकि फांसी, स्पर्धा, वातायन, एक रात, नीलम देश की राज कन्या, नई कहानियां, कथा कुसुमांजलि जय संधि, ध्रुव यात्रा, एक दिन, दो चिड़िया, जैनेंद्र की कहानियां (दस भागों में) जैनेंद्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियां, प्रेम में भगवान जैसे कहानी संग्रह उन्हें पर्याप्त लोकप्रिय बनाने में सफल रहें।
विज्ञापन
जैनेंद्र ने नाट्य साहित्य में भी अपनी कलम चलाई। पाप और प्रकाश, मग्दालिनी उनके प्रमुख नाटक हैं। उनके द्वारा संस्मरण, निबंध संग्रह साहित्य, आलोचना और संदर्भ-ग्रंथ सरस, सचित्र बाल व किशोर साहित्य का भी सृजन किया गया। जैनेंद्र के सृजन को अनेकों सम्मान और पुरस्कार हासिल हुए। हिंदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद ने 1929 परख के लिए शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने वर्ष 1952 में प्रेम में भगवान, 1953 में पाप और प्रकाश, साहित्य अकादमी ने 1966 में मुक्तिबोध, हस्तीमल डालमिया पुरस्कार, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने वर्ष 1970 में समय और हम के लिए जैनेंद्र को सम्मानित किया। जैनेंद्र के साहित्यिक योगदान को भारत सरकार ने भी उल्लेखनीय मानते हुए उन्हें वर्ष 1971 में पद्म भूषण सम्मान से विभूषित किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय ने वर्ष 1973 और आगरा विश्वविद्यालय ने वर्ष 1974 में मानद डी. लिट्, 1973 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने साहित्य वाचस्पति से अलंकृत किया। 1974 में साहित्य अकादमी की फेलोशिप भी उनको मिली। यह सभी पुरस्कार और सम्मान जैनेंद्र के विराट व्यक्तित्व को रेखांकित करते हैं। उन्हें 1966 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। जैनेंद्र का निधन 24 दिसंबर 1988 को हुआ। निधन के बाद उनके लिखे साहित्य पर आज भी अनवरत शोध हो रहे हैं।
डॉ. चंद्र शेखर शर्मा, प्रभारी, हिंदी विभाग, ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल अलीगढ़
ऐसे लिखें अच्छी हिंदी
हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है। इसे बोलना और लिखना बहुत सरल है। इसके बावजूद कई लोग गलत हिंदी लिखते हैं। अक्सर हमें दवाईयां, मिठाईयां जैसे शब्द पढ़ने को मिल जाते हैं, जो गलत हैं। दवाई और मिठाई सही शब्द हैं। इनके बहुवचन दवाइयां और मिठाइयां हैं। अगर व्याकरण के नियमों का ध्यान रखा जाए तो बहुत आसानी से सही हिंदी लिखी जा सकती है। इस संबंध में साधारण सा नियम यह है कि जिन संज्ञाओं के अंत में ई अक्षर या ई की मात्रा होती है, उनका बहुवचन बनाते समय शब्द के अंत्य को लघु करते हुए यां अथवा यों जोड़ देते हैं, जैसे बेटी का बहुवचन बेटियां या बेटियों, लड़की का लड़कियां या लड़कियों होगा। अगर यह नियम समझ में आ जाए तो गलती से भी गलतीयां नहीं लिखेंगे।
- डॉ. राजेश कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, भाषाविद्
विज्ञापन
कौड़ियांगज में 2 जनवरी 1905 को जैन परिवार में प्यारेलाल के यहां एक बालक का जन्म हुआ, परिवार में खुशियां मनाई गईं। नाम रखा गया आनंदीलाल। आनंदीलाल जब चार माह के थे तभी पिता प्यारेलाल का असमय निधन हो गया। परिवार पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। पास ही के कस्बे अतरौली के छिपैटी के जैन परिवार में उनकी ननिहाल थी। अतरौली के पुनीत जैन बताते हैं कि पिता के निधन के बाद उनके मामा उन्हें अतरौली ले आए। बाद में उनकी शिक्षा का प्रबंध उनके ही मामा ने जैन गुरुकुल ऋ षि ब्रह्मचर्याश्रम हस्तिनापुर में किया। यहां सात साल तक जैनेंद्र ने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसी गुरुकुल में उनको आनंदीलाल से ‘जैनेंद्र’ नाम दिया गया। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद अध्ययन के लिए काशी गए। दो वर्षों तक काशी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। स्वाधीनता आंदोलन में वे कई बार जेल गए। जेल में ही इन्हें लिखने की प्रेरणा मिली।
विज्ञापन
1929 में इनका विवाह भगवती देवी से हुआ। डॉ. केएम मुंशी व प्रेमचंद के साथ मिलकर महात्मा गांधी की अध्यक्षता में भारतीय साहित्य परिषद की स्थापना की। प्रेमचंद की मृत्यु के बाद हंस का संपादन शुरू किया। जैनेंद्र द्वारा रचित उपन्यासों में ‘परख’ ‘तपोभूमि’, ‘सुनीता’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’, ‘त्यागपत्र’ ‘विवर्त’, ‘व्यतीत’, ‘जयवर्धन’, ‘अनाम स्वामी’, ‘मुक्तिबोध’, ‘अनन्तर’, ‘यामा’, ‘दशार्क’ प्रमुख हैं। त्यागपत्र उपन्यास से उनको खासी लोकप्रियता मिली, जबकि फांसी, स्पर्धा, वातायन, एक रात, नीलम देश की राज कन्या, नई कहानियां, कथा कुसुमांजलि जय संधि, ध्रुव यात्रा, एक दिन, दो चिड़िया, जैनेंद्र की कहानियां (दस भागों में) जैनेंद्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियां, प्रेम में भगवान जैसे कहानी संग्रह उन्हें पर्याप्त लोकप्रिय बनाने में सफल रहें।
विज्ञापन
जैनेंद्र ने नाट्य साहित्य में भी अपनी कलम चलाई। पाप और प्रकाश, मग्दालिनी उनके प्रमुख नाटक हैं। उनके द्वारा संस्मरण, निबंध संग्रह साहित्य, आलोचना और संदर्भ-ग्रंथ सरस, सचित्र बाल व किशोर साहित्य का भी सृजन किया गया। जैनेंद्र के सृजन को अनेकों सम्मान और पुरस्कार हासिल हुए। हिंदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद ने 1929 परख के लिए शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने वर्ष 1952 में प्रेम में भगवान, 1953 में पाप और प्रकाश, साहित्य अकादमी ने 1966 में मुक्तिबोध, हस्तीमल डालमिया पुरस्कार, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने वर्ष 1970 में समय और हम के लिए जैनेंद्र को सम्मानित किया। जैनेंद्र के साहित्यिक योगदान को भारत सरकार ने भी उल्लेखनीय मानते हुए उन्हें वर्ष 1971 में पद्म भूषण सम्मान से विभूषित किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय ने वर्ष 1973 और आगरा विश्वविद्यालय ने वर्ष 1974 में मानद डी. लिट्, 1973 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने साहित्य वाचस्पति से अलंकृत किया। 1974 में साहित्य अकादमी की फेलोशिप भी उनको मिली। यह सभी पुरस्कार और सम्मान जैनेंद्र के विराट व्यक्तित्व को रेखांकित करते हैं। उन्हें 1966 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। जैनेंद्र का निधन 24 दिसंबर 1988 को हुआ। निधन के बाद उनके लिखे साहित्य पर आज भी अनवरत शोध हो रहे हैं।
डॉ. चंद्र शेखर शर्मा, प्रभारी, हिंदी विभाग, ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल अलीगढ़
ऐसे लिखें अच्छी हिंदी
हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है। इसे बोलना और लिखना बहुत सरल है। इसके बावजूद कई लोग गलत हिंदी लिखते हैं। अक्सर हमें दवाईयां, मिठाईयां जैसे शब्द पढ़ने को मिल जाते हैं, जो गलत हैं। दवाई और मिठाई सही शब्द हैं। इनके बहुवचन दवाइयां और मिठाइयां हैं। अगर व्याकरण के नियमों का ध्यान रखा जाए तो बहुत आसानी से सही हिंदी लिखी जा सकती है। इस संबंध में साधारण सा नियम यह है कि जिन संज्ञाओं के अंत में ई अक्षर या ई की मात्रा होती है, उनका बहुवचन बनाते समय शब्द के अंत्य को लघु करते हुए यां अथवा यों जोड़ देते हैं, जैसे बेटी का बहुवचन बेटियां या बेटियों, लड़की का लड़कियां या लड़कियों होगा। अगर यह नियम समझ में आ जाए तो गलती से भी गलतीयां नहीं लिखेंगे।
- डॉ. राजेश कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, भाषाविद्

डॉ. राजेश कुमार एसोशिएट प्रोफ़ेसर, भाषाविद्।- फोटो : CITY OFFICE

जैनेंद्र स्मृति द्वार कौड़ियागंज ।- फोटो : CITY OFFICE