{"_id":"584b11404f1c1be05944b2d7","slug":"ground-water-being-poisonous-black-yellow-colors","type":"story","status":"publish","title_hn":"जमीन का जल हो रहा जहरीला, रंग भी काला पीला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जमीन का जल हो रहा जहरीला, रंग भी काला पीला
दीपक शर्मा
Updated Sat, 10 Dec 2016 01:48 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दुनिया के महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग ने कहा है कि हमने दुनिया को नष्ट करने का तो पूरा इंतजाम कर लिया है, लेकिन उसे बचाने की कोई तैयारी नहीं की है। जीवन के अनिवार्य घटक पानी के संबंध में कमोवेश यही स्थिति है।
पानी को जहरीला करने की सारी वजहें पैदा कर ली हैं, लेकिन पानी को साफ बनाए रखने के लिए कुछ नहीं किया है।
अमर उजाला ने सरकारी आंकड़ेबाजी से दूर हमने घरों में आरओ प्लांट लगाने वाले लोगों से शहर के भूजल और नगर निगम द्वारा सप्लाई हो रहे पानी की स्थिति के विषय में जानकारी की तो तथ्य चौंकाने वाले थे। पानी में कठोरता का स्तर सामान्य से बहुत अधिक था। यह सभी स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक स्थिति है।
ग्रामीण इलाके में भी पाताल में धंस रहा पानी
शहर का भूजल जहां एक ओर जहरीला हो रहा है तो दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में पानी पाताल में समा रहा है। जल स्तर लगातार गिर रहा है। 200 से 250 फीट की बोरिंग के बिना पानी मिलना मुश्किल हो रहा है। जिले के कुछ इलाके तो ऐसे हैैं जो डार्क जोन में आ चुके हैं।
विज्ञापन
इनमें अतरौली, जवां, बिजौली, छर्रा आदि इलाके हैं। मध्यकालीन भारत के आर्थिक इतिहास के वर्णन (प्रो. इरफान हबीब की मध्यकाल के आर्थिक इतिहास की प्रसिद्ध किताब) में जिक्र मिलता है अतरौली (उस समय यह नाम नहीं था) इलाके में गन्ने की फसल बहुत होती थी। इसका अर्थ यह था कि यह इलाका तराई का इलाका था। यहां पर पानी प्रचुर मात्रा में था, लेकिन वक्त के साथ पानी और धरती की सतह की दूरी बढ़ती गई। यह प्रक्रिया अभी भी जारी है।
प्राकृतिक स्रोत भी अस्तित्व खो रहे
शहर और ग्रामीण इलाकों में एक और समस्या जल स्रोतों के सिकुड़ते या समाप्त होते अस्तित्व की है। कुछ जल स्रोत भयंकर रूप से प्रदूषित और जहरीले हो चुके हैं। शहर और गांव में तालाब पोखरों का दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है। पर्यावरणविद् सुबोध नंदन शर्मा कहते हैं कि पानी का अंधाधुंध दोहन जारी है।
सबमर्सिबल के लिए कोई नियमन नहीं है। इसके विपरीत पानी को वापस जमीन में भेजने के लिए भी कोई ठोस नियमन नहीं है। अधिकांश इमारतों में (कुछ सरकारी इमारतें भी) रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है। तालाब और पोखरों का दायरा भी शहर में सिकुड़ता जा रहा है। ऐसे में आगे की स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं नजर आ रही है।
नदियों के संरक्षण को लेकर बैठक हुई
नदियों के प्रदूषण मुक्त होने की जरूरत और यमुना में जल प्रवाह बने रहने की जरूरत पर श्री गंगा सेवा समिति उत्तर प्रदेश ने एक बैठक आयोजित की। इसमें इलाहाबाद में आयोजित होने वाले माघ मेले को लेकर अपने विचार रखे। बैठक में अशोक सक्सेना, सेवाराम शर्मा, वीरेंद्र शर्मा, आभा वार्ष्णेय, गिरराज शर्मा, राम किशन शर्मा, राम प्रकाश सूर्यवंशी, राम कुमार शर्मा, शशांक मुदगल थे।
विज्ञापन
पानी को जहरीला करने की सारी वजहें पैदा कर ली हैं, लेकिन पानी को साफ बनाए रखने के लिए कुछ नहीं किया है।
अमर उजाला ने सरकारी आंकड़ेबाजी से दूर हमने घरों में आरओ प्लांट लगाने वाले लोगों से शहर के भूजल और नगर निगम द्वारा सप्लाई हो रहे पानी की स्थिति के विषय में जानकारी की तो तथ्य चौंकाने वाले थे। पानी में कठोरता का स्तर सामान्य से बहुत अधिक था। यह सभी स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक स्थिति है।
विज्ञापन
ग्रामीण इलाके में भी पाताल में धंस रहा पानी
शहर का भूजल जहां एक ओर जहरीला हो रहा है तो दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में पानी पाताल में समा रहा है। जल स्तर लगातार गिर रहा है। 200 से 250 फीट की बोरिंग के बिना पानी मिलना मुश्किल हो रहा है। जिले के कुछ इलाके तो ऐसे हैैं जो डार्क जोन में आ चुके हैं।
विज्ञापन
इनमें अतरौली, जवां, बिजौली, छर्रा आदि इलाके हैं। मध्यकालीन भारत के आर्थिक इतिहास के वर्णन (प्रो. इरफान हबीब की मध्यकाल के आर्थिक इतिहास की प्रसिद्ध किताब) में जिक्र मिलता है अतरौली (उस समय यह नाम नहीं था) इलाके में गन्ने की फसल बहुत होती थी। इसका अर्थ यह था कि यह इलाका तराई का इलाका था। यहां पर पानी प्रचुर मात्रा में था, लेकिन वक्त के साथ पानी और धरती की सतह की दूरी बढ़ती गई। यह प्रक्रिया अभी भी जारी है।
प्राकृतिक स्रोत भी अस्तित्व खो रहे
शहर और ग्रामीण इलाकों में एक और समस्या जल स्रोतों के सिकुड़ते या समाप्त होते अस्तित्व की है। कुछ जल स्रोत भयंकर रूप से प्रदूषित और जहरीले हो चुके हैं। शहर और गांव में तालाब पोखरों का दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है। पर्यावरणविद् सुबोध नंदन शर्मा कहते हैं कि पानी का अंधाधुंध दोहन जारी है।
सबमर्सिबल के लिए कोई नियमन नहीं है। इसके विपरीत पानी को वापस जमीन में भेजने के लिए भी कोई ठोस नियमन नहीं है। अधिकांश इमारतों में (कुछ सरकारी इमारतें भी) रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है। तालाब और पोखरों का दायरा भी शहर में सिकुड़ता जा रहा है। ऐसे में आगे की स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं नजर आ रही है।
नदियों के संरक्षण को लेकर बैठक हुई
नदियों के प्रदूषण मुक्त होने की जरूरत और यमुना में जल प्रवाह बने रहने की जरूरत पर श्री गंगा सेवा समिति उत्तर प्रदेश ने एक बैठक आयोजित की। इसमें इलाहाबाद में आयोजित होने वाले माघ मेले को लेकर अपने विचार रखे। बैठक में अशोक सक्सेना, सेवाराम शर्मा, वीरेंद्र शर्मा, आभा वार्ष्णेय, गिरराज शर्मा, राम किशन शर्मा, राम प्रकाश सूर्यवंशी, राम कुमार शर्मा, शशांक मुदगल थे।