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दीनदयाल अस्पताल की लापरवाही से गई पिता की जान ः डॉ. अंशु

Sun, 02 May 2021 01:07 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 02 May 2021 01:07 AM IST
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Father's life lost due to carelessness of Deendayal Hospital: Dr. Anshu
नगर निगम के सेवानिवृत्त जनसंपर्क अधिकारी व महापौर के पीआरओ वीरेंद्र कुमार सक्सेना का निधन लापरवाही के चलते दीनदयाल अस्पताल में 28 अप्रैल को हुआ था। यह आरोप उनकी बेटी व पला साहिबाबाद सीएचसी की प्रभारी डॉ. अंशु सक्सेना ने लगाया है। उनका कहना है कि इस प्रकरण में सीएमओ, जेडी व विधायक तक ने पैरवी की थी, लेकिन दीनदयाल अस्पताल के स्टाफ ने एक नहीं सुनी। उन्होंने अपनी आपबीती साझा की है।
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26 अप्रैल की शाम को डॉ. अंशु सक्सेना ने सीएमओ, जेडी व विधायक से कहकर पिता वीरेंद्र कुमार सक्सेना को दीनदयाल अस्पताल में भर्ती कराया था। बताया कि, उनका ऑक्सीजन का स्तर काफी कम था। स्टाफ ने ऑक्सीजन बेड उपलब्ध न होने की बात कहते हुए भर्ती किया।
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सीएमओ ने कई बार फोन किए, लेकिन उठाया नहीं गया। जब सीएमओ की नर्स से बात कराई, तब जाकर ऑक्सीजन सपोर्ट वाला बेड मिला। लेकिन बेड पर आक्सीजन की सप्लाई नहीं आ रही थी। इसके बाद ज्वाइंट डायरेक्टर ने ऑक्सीजन सिलिंडर का इंतजाम कराया।
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सिलिंडर लगाया तो भी हालत में सुधार नहीं हुआ। बाद में पता चला कि मास्क से ऑक्सीजन नहीं आ रही है। आननफानन में मास्क बदला गया। ऑक्सीजन मिलने पर हालत सामान्य होने लगी। कुछ देर बाद सिलिंडर खत्म हो गया।
डॉ. अंशु वार्ष्णेय ने बताया कि अस्पताल में जान पहचान वाला स्टाफ मिला तो वार्ड तीन में पिता को शिफ्ट कराया। बड़ा आक्सीजन सिलिंडर मिला। लेकिन दस घंटे चलने वाला सिलिंडर चार घंटे में ही खत्म हो गया। वहां स्टाफ की कमी थी।
ऐसे में रात दस बजे तक खुद पिता को ड्रिप चढ़ाई और दवाएं दीं। अन्य मरीज भी परेशान थे, उनको भी दवाएं दीं। 27 अप्रैल की सुबह ऑक्सीजन की किल्लत होने लगी। विधायकों ने पैरवी की तो जैसे-तैसे आईसीयू में बेड मिला। इस दौरान पिता का ऑक्सीजन स्तर 96-97 पर पहुंच गया था।
पिछली तीन रातों से लगातार जगने की वजह से रात करीब दस बजे उनकी भी तबियत बिगड़ गई तो वह घर चली गईं। इसके बाद उन्होंने अगले दिन सुबह फोन किया तो पता चला कि ऑक्सीजन का स्तर 45 के आसपास चल रहा है। सुबह पौने दस बजे तक पहुंची तो देखा कि वेंटिलेटर का सिस्टम हटा दिया गया था।
उन्होंने बताया कि यहां ठीक से उनका इलाज नहीं हुआ। एक रात पहले शुगर 500 पर पहुंच गई थी तो खुद ही इन्सुलिन का इंजेक्शन लगाया था। डॉ. अंशु ने बताया कि हो सकता है कि सुबह भी शुगर बढ़ी हो, लेकिन किसी ने इन्सुलिन का इंजेक्शन नहीं लगाया होगा।
स्टाफ ने शुगर चेक नहीं की होगी, रुटीन पर ध्यान नहीं दिया गया। हकीकत यह है कि यहां मरीज का ख्याल नहीं रखा जाता है। स्टाफ कम है। यह मैंने खुद रहकर देखा है। अगर मैं वहां पिता के साथ नहीं होती तो एक दिन भी वह जिंदा नहीं रह पाते।
खुद पिता का डायपर बदला... स्टाफ देखने तक नहीं आया
जो लोग ड्यूटी कर रहे हैं, निवेदन है कि ईमानदारी से ड्यूटी करें, अन्यथा न करें। क्योंकि अगर सीएमओ और किसी का सहयोग नहीं होता तो कोई नहीं सुनता, आक्सीजन भी नहीं मिलती। सपोर्ट सबका मिला, लेकिन लापरवाही को कहां ले जाएं। यह बात सही है कि उनकी रिपोर्ट खराब आ रही थी।
लेकिन अगर रुटीन चेक किया जाता तो उन्हें बचाया जा सकता था। कुछ जानकार स्टाफ ने काफी सहयोग किया है। सीएमओ, जेडी व विधायक भी लगातार फोन पर रहे। लेकिन सीएमएस ने खास ध्यान नहीं दिया। पिता को भर्ती कराने के बाद 24 घंटे तक बेड के पास चाय फैली हुई थी।

किसी ने साफ नहीं किया। पिता को चलने से मना कर दिया गया तो डायपर लगा दिया गया था, जिसे बदलने भी स्टाफ नहीं आया था। मैंने खुद डायपर बदला है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अस्पातल में कितनी लापरवाही हो रही है।
-डॉ. अंशु सक्सेना, प्रभारी पलासाहिबाबाद सीएचसी।
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