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सर सैयद डे में पहुंचे पूर्व विद्यार्थियों ने बयां किए जज्बात
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सदफ अजीज, एएमयू
- फोटो : CITY OFFICE
पूर्व विद्यार्थियों के जज्बात
करीब 42 साल के बाद अपने इस इदारे को देखा है। काफी अच्छा लगा है। कुछ नहीं बदला है। एएमयू ने अपनी रवायतों को महफूज कर रखा है, यह देखकर मन खुश हो गया। मैंने 1969-71 में पढ़ाई की थी।
-मोहम्मद मुकर्रम, दम्माम
- वर्ष 2003 में मैंने मेकेनिकल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। दिल्ली में स्वीडन की कंपनी आईकेईए इंडिया में कार्यरत हैं। सर सैयद डे पर आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। पहले जैसी परंपराएं है, बस कैलेंडर में साल बदल गए हैं।
-जमाल शाहिद, दिल्ली
- वर्ष 2006 में मैंने एएमयू से एमबीए की डिग्री ली थी। मुझे सर सैयद डे में शामिल होना काफी अच्छा लगता है। जब भी मौका मिलता है, तो मैं जरूर शामिल होती हूं, क्योंकि मेरे लिए यह एक त्योहार है। इदारे ने किस्मत संवारी है।
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-इरम फातिमा, दिल्ली
- मैंने वर्ष 1954 से 60 तक बी.कॉम की पढ़ाई की थी। जैसे ही इस इदारे में कदम रखा तो 62 साल पुरानी बातें याद आने लगीं। लगता है कि दो-चार साल पुरानी बातें हैं। सर सैयद डे पर आकर मुझे काफी खुशी हो रही है।
-अब्दुल हफीज खान, शाहजहांपुर
सर सैयद डे पर आना मेरा नसीब है, जिस इदारे ने इतनी बुलंदियां दी हों, तो वहां आना किसी पुरस्कार से कम नहीं है। 2018 में शोध पूरा करने के बाद इटली चला गया था, लेकिन सर सैयद के मिशन को वहां बढ़ा रखा है।
-मोहम्मद उवैस रिजवान, इटली
- वर्ष 1958-61 में विज्ञान वर्ग में पढ़ाई की थी। इसके बाद अमेरिका चला गया। सर सैयद-डे मेरे लिए किसी त्योहार से कम नहीं है। इस इदारे और सर सैयद ने मुझे तमाम कामयाबी दी हैं, जिसका कर्ज उतार नहीं सकता।
-सैयद हसन कमर, अमेरिका
एएमयू में वर्ष 2004-2008 तक पढ़ाई की है। सर सैयद-डे पर आती रहती हूं, लेकिन दो साल तक कोराना महामारी के चलते ऑनलाइन सर सैयद-डे मनाया गया। मेरे लिए एएमयू और सर सैयद एक आला इंस्टीट्यूट और आला शख्सियत हैं।
-सदफ अजीज, आस्ट्रेलिया
- मैंने एएमयू से पढ़ाई की और यहीं सेवाएं भी दीं। एएमयू की परंपराएं दुनिया में मशहूर हैं। सर सैयद-डे में शामिल होना हर एक स्टूडेंट का ख्वाब होता है, वह शामिल हो, जब एएमयू तराना शुरू होता, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। - अब्दुल समद, पूर्व हज अधिकारी
तालीम, नौकरी और बीवी भी
‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने मुझे तालीम, नौकरी के साथ जिंदगी में हर मोड़ के लिए एक साथी (बीवी) भी दी। मैं बहुत शुक्रगुजार हूं एएमयू का’ ये कहना है एएमयू के पूर्व छात्र नौशाद अंसारी का, जो लखनऊ से मुख्य भूगर्भ वैज्ञानिक के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि मेरी बीवी (नजमा) भी एएमयू की देन हैं।
नजीबाबाद, बिजनौर के रहने वाले नौशाद के बीवी के मिलन के दिलचस्प किस्से को बयां करते हुए नौशाद अंसारी की आंखों में चमक आ जाती। वह कहते हैं कि जब वह 1977-80 में भूगर्भ विषय की पढ़ाई कर रहे थे, तो उनके साथ उनकी बीवी का भाई भी पढ़ता था। नजमा अपने भाई से मिलने आती थीं। दोनों में मोहब्बत हो गई, जो खतों से बयां होती। उन्होंने 25-25 पन्ने के खत आते-जाते थे। इसलिए वह एएमयू को बहुत मोहब्बत करते हैं। सर सैयद-डे में शामिल होना, उसी का सुबूत है। इस इदारे ने सब कुछ दिया है। इसी बुनियाद पर एएमयू को मादरे दर्सगाह कहते हैं।
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करीब 42 साल के बाद अपने इस इदारे को देखा है। काफी अच्छा लगा है। कुछ नहीं बदला है। एएमयू ने अपनी रवायतों को महफूज कर रखा है, यह देखकर मन खुश हो गया। मैंने 1969-71 में पढ़ाई की थी।
-मोहम्मद मुकर्रम, दम्माम
- वर्ष 2003 में मैंने मेकेनिकल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। दिल्ली में स्वीडन की कंपनी आईकेईए इंडिया में कार्यरत हैं। सर सैयद डे पर आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। पहले जैसी परंपराएं है, बस कैलेंडर में साल बदल गए हैं।
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-जमाल शाहिद, दिल्ली
- वर्ष 2006 में मैंने एएमयू से एमबीए की डिग्री ली थी। मुझे सर सैयद डे में शामिल होना काफी अच्छा लगता है। जब भी मौका मिलता है, तो मैं जरूर शामिल होती हूं, क्योंकि मेरे लिए यह एक त्योहार है। इदारे ने किस्मत संवारी है।
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-इरम फातिमा, दिल्ली
- मैंने वर्ष 1954 से 60 तक बी.कॉम की पढ़ाई की थी। जैसे ही इस इदारे में कदम रखा तो 62 साल पुरानी बातें याद आने लगीं। लगता है कि दो-चार साल पुरानी बातें हैं। सर सैयद डे पर आकर मुझे काफी खुशी हो रही है।
-अब्दुल हफीज खान, शाहजहांपुर
सर सैयद डे पर आना मेरा नसीब है, जिस इदारे ने इतनी बुलंदियां दी हों, तो वहां आना किसी पुरस्कार से कम नहीं है। 2018 में शोध पूरा करने के बाद इटली चला गया था, लेकिन सर सैयद के मिशन को वहां बढ़ा रखा है।
-मोहम्मद उवैस रिजवान, इटली
- वर्ष 1958-61 में विज्ञान वर्ग में पढ़ाई की थी। इसके बाद अमेरिका चला गया। सर सैयद-डे मेरे लिए किसी त्योहार से कम नहीं है। इस इदारे और सर सैयद ने मुझे तमाम कामयाबी दी हैं, जिसका कर्ज उतार नहीं सकता।
-सैयद हसन कमर, अमेरिका
एएमयू में वर्ष 2004-2008 तक पढ़ाई की है। सर सैयद-डे पर आती रहती हूं, लेकिन दो साल तक कोराना महामारी के चलते ऑनलाइन सर सैयद-डे मनाया गया। मेरे लिए एएमयू और सर सैयद एक आला इंस्टीट्यूट और आला शख्सियत हैं।
-सदफ अजीज, आस्ट्रेलिया
- मैंने एएमयू से पढ़ाई की और यहीं सेवाएं भी दीं। एएमयू की परंपराएं दुनिया में मशहूर हैं। सर सैयद-डे में शामिल होना हर एक स्टूडेंट का ख्वाब होता है, वह शामिल हो, जब एएमयू तराना शुरू होता, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। - अब्दुल समद, पूर्व हज अधिकारी
तालीम, नौकरी और बीवी भी
‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने मुझे तालीम, नौकरी के साथ जिंदगी में हर मोड़ के लिए एक साथी (बीवी) भी दी। मैं बहुत शुक्रगुजार हूं एएमयू का’ ये कहना है एएमयू के पूर्व छात्र नौशाद अंसारी का, जो लखनऊ से मुख्य भूगर्भ वैज्ञानिक के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि मेरी बीवी (नजमा) भी एएमयू की देन हैं।
नजीबाबाद, बिजनौर के रहने वाले नौशाद के बीवी के मिलन के दिलचस्प किस्से को बयां करते हुए नौशाद अंसारी की आंखों में चमक आ जाती। वह कहते हैं कि जब वह 1977-80 में भूगर्भ विषय की पढ़ाई कर रहे थे, तो उनके साथ उनकी बीवी का भाई भी पढ़ता था। नजमा अपने भाई से मिलने आती थीं। दोनों में मोहब्बत हो गई, जो खतों से बयां होती। उन्होंने 25-25 पन्ने के खत आते-जाते थे। इसलिए वह एएमयू को बहुत मोहब्बत करते हैं। सर सैयद-डे में शामिल होना, उसी का सुबूत है। इस इदारे ने सब कुछ दिया है। इसी बुनियाद पर एएमयू को मादरे दर्सगाह कहते हैं।

सैयद हसन कमर, एएमयू - फोटो : CITY OFFICE