अतीत का अलीगढ़ 17: 1837-38 के अकाल के दौर में अलीगढ़ की सड़कों पर दिनदहाड़े होती थी लूटपाट
राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
विस्तार
हालात का असर अपराध पर जरूर पर पड़ता है। इसकी पुष्टि होती है 1837-38 में पड़े भीषण अकाल से। तंगहाली की स्थिति में बड़ी संख्या में लोगों ने जरायम का रास्ता अख्तियार कर लिया था। जिले की सड़कें बेहद असुरिक्षत हो चली थीं। दिनदहाड़े सड़कों पर लूट हो जाती थी। अंग्रेजों ने बड़ी साफगोई से लिखा है कि जिले में चारों ओर अपराधों की बाढ़ आ गई है। राहगीर, आम बाशिंदे, अनाज की गाड़ियां कुछ भी सुरक्षित नहीं थीं। इस हालात को राजस्थान की ओर से आए घुमंतू लुटेरों ने और विकट बना दिया था। जिले में अनाज के भंडार खत्म हो चले थे। ज्यादा पैसा देने पर भी खाने-पीने का सामान मुश्किल से मिलता था।
सोमना के जमींदार ठाकुर चंदन सिंह ने अकाल पीड़ितों को बांटा था एक लाख मन अनाज
1837-38 में खरीफ की फसल बुरी तरह से प्रभावित हुई थी और रबी की अच्छी फसल पर आशंकाओं के बादल मंडरा रहे थे। ऐसे में अंग्रेजों ने लोगों को राहत देने की कार्रवाई शुरू की। ग्रैंड ट्रंक रोड की मरम्मत के लिए ढेर सारे मजदूर लगाए गए। कलकत्ता (तात्कालिक नाम) स्थिति सेंट्रल कमेटी ने 6000 रुपये की राहत दी थी। तीन बार यह राशि मथुरा भेजी गई थी। कई बड़े जमींदार भी आम रियाया को दुख और परेशानी में राहत देने में जुट गए थे।
सोमना के जमींदार ठाकुर चंदन सिंह ने भुखमरी के शिकार लोगों को एक लाख मन अनाज बांटा था। अंग्रेज लिखते हैं कि अकाल से तो कम लोगों ने जान गंवाई लेकिन इसकी अपेक्षा लोग बीमारियों से ज्यादा मरे। इस दौर में कॉलरा भी तेजी से फैला। जिले के गरीब मुस्लिम वर्ग को इसने खासतौर पर शिकार बनाया था। पड़ोसी जिले बुलंदशहर में अकाल का असर ज्यादा देखने को मिला था।
1803 में थे सूखे के हालात, ओलावृष्टि से भी हुआ था बड़ा नुकसान
सिर मुड़ाते ही ओला पड़ना बेशक मुहावरा हो, लेकिन यह हकीकत में तब बदल गया, जब अंग्रेजी शासन के अधीन 1803 में आते ही जिले ने भारी ओलावृष्टि देखी। इससे फसलों को काफी नुकसान हुआ था। रोचक बात यह भी थी कि इसी साल जिले में भीषण सूखे जैसे हालात देखे। बड़ी संख्या में तंग लोगों ने जिले से पलायन भी शुरू कर दिया था। मराठा सैनिकों और असंतुष्ट किसानों की ओर से भी लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया गया। 1805-06 में भी बारिश ने शुरुआती दिनों में धोखा दिया। मध्य अगस्त में लोगों को बारिश के दर्शन हुए। 1813-14 में भी इसी तरह के हालात बने। 1819 में अलीगढ़ विषम हालात से उबर गया था।
1860 में पूरे जुलाई भर जिले में एक बूंद भी बारिश नहीं हुई
अंग्रेज बड़ी बेबाकी से लिखते हैं कि सूखे और अकाल जैसे हालात से निपटने के इंतजाम पुख्ता नहीं थे। 1860 में बारिश ने एक बार फिर गच्चा दिया था। पूरे जुलाई माह में जिले में एक बूंद बारिश के दर्शन नहीं हुए थे। 1860 में मानसून ने धोखा दे दिया था। अगस्त और सितंबर माह बिल्कुल सूखा गया। पहली बार अंग्रेजी शासन में राहत की व्यवस्था 1861 ईस्वीं में की गई थी। सबसे ज्यादा खराब स्थिति अतरौली तहसील की थी। 16455 लोगों को आर्थिक और अनाज की सहायता दी गई थी।
छोटे स्तर पर बेरोजगार मजदूरों के लिए राहत का कार्य शुरू किया गया। जुलाई 1861 तक 821856 लोगों की मदद पर 47504 रुपये खर्च किए गए थे। औसतन 5479 रुपये लगभग हर रोज राहत पर खर्च किए गए। इसका दो तिहाई भाग स्थानीय दानदाताओं और आगरा स्थित अंग्रेजों की गठित कमेटी ने मुहैया कराया था। इसके अलावा 30000 रुपये आगरा से अलीगढ़ में मदद के लिए दिए गए जो किसानों को बीज खरीदने और पशुपालन के मद में खर्च किए गए।
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)