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तमाम खामियों के बावजूद इंसानी लगते हैं ‘इस्मत आपा’ के गढे़ किरदार

Thu, 03 Dec 2015 01:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/अलीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो/अलीगढ़ Updated Thu, 03 Dec 2015 01:37 AM IST
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Despite all the flaws can be human ' Ismat Apa 's role
प्रख्यात गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि इस्मत आपा अपने गढ़े हुृए किरदाराें से कभी समझौता नहीं किया। उनके जेहन में इंसान को लेकर जो तस्वीरें थीं उसे उसी ढंग से पेश किया।
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 कभी उसके साथ हमदर्दी नहीं दिखाई। इसलिए ही उनके किरदार तमाम खामियों के बावजूद इंसानी लगते हैं। श्री अख्तर बुधवार को एएमयू वीमेंस कॉलेज में उर्दू की प्रख्यात प्रगतिशील लेखिका इस्मत चुगताई के जन्मशती पर आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे। इसका आयोजन फीमेल एजूकेशन एसोसिएशन द्वारा किया जा रहा है।
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 इस मौके पर जावेद अख्तर ने कहा कि हर बड़े रचनाकार की विशेषता होती है कि उसने अपने युग में जो कुछ लिखा है, उसकी प्रासंगिकता नए युग में भी बनी रहे। इस्मत चुगताई ऐसी ही रचनाकार थीं।
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उनपर दूसरी भाषाओं में अब ज्यादा लिखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस्मत चुगताई ने अन्याय, अत्याचार और उत्पीड़न को अपनी कहानियों का शीर्षक बनाया और वह जो बोलती थीं वही लिखती भी थीं।

अपने पारिवारिक रिश्तों का उल्लेख करते हुए उन्हाेंने कहा कि उनकी मां सफिया जांनिसार और इस्मत चुगताई एक साथ एएमयू के गर्ल्स स्कूल की छात्रा रही हैं। वह महान प्रगतिशील लेखिका और वीमेेंस कॉलेज के संस्थापक शेख अब्दुल्लाह की पुत्री रशीद जहां से बहुत प्रभावित थीं।

उन्हें अपने जीवन का चेहरा रशीद जहां में दिखाई देता था। इसलिए अलीगढ़  का दायित्व है कि वह संस्थान की महान पूर्व छात्रा के योगदान को जन जन तक पहुंचाए।

एएमयू के प्रोचांसलर नवाब इब्ने सईद खां ऑफ  छतारी ने कहा कि इस्मत आपा से चर्चित इस्मत चुगताई का उर्दू साहित्य में उच्च स्थान है। वह उन छात्राओं में थीं जिन्होंने इस संस्थान का नाम रोशन किया है।

सह कुलपति एस अहमद अली ने कहा कि इस्मत के युग में दिल की बात को कागज पर उकेरना बुरा समझा जाता था। परंतु वह जो सोचतीं और महसूस करती थीं, कागज पर दर्ज करती थीं।

वह चंगेज खां के वंश से थीं। इस लिए भी निडर और निर्भीक थीं। उन्हें गिल्ली-डंडों और फुटबाल खेलने का शौक था। वह पेड़ पर भी चढ़ जाती थीं। किसी की परवाह नहीं करती थीं।

 पाकिस्तान की लेखिका प्रोफेसर नौशाबा सिद्दीकी ने कहा कि अलीगढ़ से उनका निकट का संबंध रहा है। उनके दादा अबुल हसन और पिता हसन अब्दुल्लाह यहां रहते थे। जावेद अख्तर अपनी मां के साथ यहां आते थे।

प्रख्यात पत्रकार और हसब ड्रामा ग्रुप की चेयरपर्सन रखशंदा जलील ने कहा कि जब वह प्रगतिशील आंदोलन का सांस्कृतिक इतिहास लिख रही थीं तो उन्हें तीन बार इस्मत चुगताई से भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

कृष्ण चन्द्र ने लिखा है कि इस्मत की कहानियों में घोड़े जैसी रफ्तार है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी और देवनागरी में इस्मत चुगताई पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। हम बार-बार इस्मत को महिला लेखिका के रूप में देखते हैं, जबकि उन्हें व्यापक परिपेक्ष्य में देखने की जरूरत है।


कार्यक्रम को एसोसिएशन की सचिव प्रो. जकिया अथर सिद्दीकी, प्रो. सगीर इफराहीम ने भी संबोधित किया। अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित प्रिंसिपल वीमेंस कॉलेज प्रो. नईमा गुलरेज ने किया।
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