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Aligarh News: सांसद सतीश गौतम के खिलाफ आपराधिक निगरानी खारिज, निचली अदालत का आदेश बरकरार
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अलीगढ़। सांसद सतीश गौतम पर मुकदमा वापस लेने के लिए धमकी देने के आरोप से जुड़े मामले में केशव देव गौतम को अदालत से राहत नहीं मिली। विशेष न्यायालय (एमपी-एमएलए), अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या-1 ने उनकी आपराधिक निगरानी खारिज कर दी। अदालत ने निचली अदालत के परिवाद खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा है।
केवल बिहार चौराहा निवासी केशव देव गौतम ने सांसद के खिलाफ परिवाद दाखिल किया था। आरोप था कि तीन और चार अक्टूबर 2023 की रात कुछ लोग उनके घर पहुंचे थे। उन्होंने खुद को सांसद की ओर से भेजा गया बताया। परिवाद के अनुसार, अगले दिन फोन पर बातचीत के दौरान सांसद ने मुकदमा वापस लेने और मीडिया में उनके खिलाफ साक्षात्कार देने को लेकर धमकी दी थी।
मजिस्ट्रेट अदालत ने 17 जुलाई 2026 को परिवाद खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ केशव देव गौतम ने आपराधिक निगरानी दाखिल की थी। निगरानी पर सुनवाई करते हुए अदालत ने शिकायत और परिवादी के बयानों में विरोधाभास पाया। शिकायत में धमकी का कारण मीडिया में साक्षात्कार देना बताया गया था, जबकि बयानों में चुनाव लड़ने से रोकने के लिए धमकी देने की बात कही गई थी।
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अदालत ने यह भी पाया कि घर आने वाले लोगों का सांसद से संबंध साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। परिवाद के समर्थन में अन्य कोई गवाह भी पेश नहीं किया गया। अदालत ने निचली अदालत के आदेश में कोई विधिक अनियमितता नहीं पाते हुए 28 अक्टूबर को निगरानी खारिज कर दी।
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केवल बिहार चौराहा निवासी केशव देव गौतम ने सांसद के खिलाफ परिवाद दाखिल किया था। आरोप था कि तीन और चार अक्टूबर 2023 की रात कुछ लोग उनके घर पहुंचे थे। उन्होंने खुद को सांसद की ओर से भेजा गया बताया। परिवाद के अनुसार, अगले दिन फोन पर बातचीत के दौरान सांसद ने मुकदमा वापस लेने और मीडिया में उनके खिलाफ साक्षात्कार देने को लेकर धमकी दी थी।
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मजिस्ट्रेट अदालत ने 17 जुलाई 2026 को परिवाद खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ केशव देव गौतम ने आपराधिक निगरानी दाखिल की थी। निगरानी पर सुनवाई करते हुए अदालत ने शिकायत और परिवादी के बयानों में विरोधाभास पाया। शिकायत में धमकी का कारण मीडिया में साक्षात्कार देना बताया गया था, जबकि बयानों में चुनाव लड़ने से रोकने के लिए धमकी देने की बात कही गई थी।
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अदालत ने यह भी पाया कि घर आने वाले लोगों का सांसद से संबंध साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। परिवाद के समर्थन में अन्य कोई गवाह भी पेश नहीं किया गया। अदालत ने निचली अदालत के आदेश में कोई विधिक अनियमितता नहीं पाते हुए 28 अक्टूबर को निगरानी खारिज कर दी।