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मौत के अंधेरे में जलाती हैं जिंदगी की मशाल
मनोज माहेश्वरी
Updated Mon, 30 May 2016 02:00 AM IST
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मशाल
- फोटो : अलीगढ़/ब्यूरो
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महानगर की जावित्री देवी मौत के मुहाने पर खड़े होकर लोगों में मुस्कान बांट रही हैं। मलखान सिंह जिला अस्पताल के परामर्शदाता के रूप में कार्यरत यह महिला खुद एचआईवी पॉजिटिव है। एक समय उन्हाेंने भी जीवन से हार मान लिया था, पर अब ऐसे गंभीर रोगियों के लिए मिसाल बनी हुई हैं।
वह एक अगस्त 2003 से आईसीटीसी (एकीकृत जांच एवं परामर्श केंद्र) में संविदा कर्मी के तौर पर कार्यरत हैं। रोजाना उनके सामने से करीब 35-40 लोगों की एचआईवी जांच रिपोर्ट गुजरती है। जिसमें औसतन आधा दर्जन एचआईवी पॉजिटिव केस होते हैं।
जब किसी व्यक्ति को खुद के एड्स रोगी होने का पता चलता है, उसपर नाउम्मीदी छा जाती है। यहां तक कि जिंदा रहने की ख्वाहिश तक छोड़ देता है। ऐसे ही लोगों की झोली खुशियाें से भरती हैं जावित्री देवी। वर्ष 2004 से यह काम कर रही हैं। एक युवती की एचआईवी जांच पॉजिटिव निकली। उन्हें पता चला कि उक्त युवती का पति भी एड्स रोेगी था। शादी के महज एक माह बाद ही उसकी मौत हो गई थी।
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जावित्री ने सोचा, क्यों न कम उम्र विधवा का घर फिर से बसाया जाए। इस काम में उन्हें पूरे तीन साल लगे। वर्ष 2007 में उन्हें जांच के दौरान एचआईवी पॉजिटिव युवक मिला। यह युवक दो बच्चों का बाप था। उसकी पत्नी की मौत हो चुकी थी।
उन्होंने दोनों के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। इस पर दोनों राजी हो गए और दोनों का घर फिर से बस गया। इस जोड़े के चेहरे पर खुशियां देख कर जावित्री ने इस काम को मिशन बना लिया।
वह जांच के दौरान ड्यूटी से अलग हटकर ऐसे लोगों का ब्यौरा एकत्रित करती हैं। जावित्री अब तक डेढ़ दर्जन ऐसे जोड़ों की गृहस्थी बसा चुकी हैं। किसी के घर जाती हैं तो किसी से फोेन पर संपर्क करती हैं। जोड़ों का मिलान कराने के बाद भी उनके बारे में जानकारी रखती हैं। कई बार देर रात ऐसे मरीजों के फोन से उनकी नींद और घर में तनाव बढ़ता है।
वह कहती हैं- यह जरूरी नहीं कि एचआईवी पॉजिविट महिला का बच्चा भी एचआईवी पॉजिटिव ही हो। समय रहते जांच और उपचार से बच्चे को एचआईवी पॉजिटिव होेने से बचाया जा सकता है। वह कई बच्चों का उपचार भी करा रही हैं।
उनका कहना है कि अभी भी उनके संपर्क में कई एचआईवी पॉजिटिव लड़कियां हैं, जो अपने जैसों संग घर बसाना चाहती हैं। वह इनके लिए लड़कों की तलाश में हैं। मूलरूप से छर्रा निवासी जावित्री के पति बलवीर सिंह एक सरकारी महकमे में मुलाजिम हैं। उनकी ससुराल एटा में है ,लेकिन पिछले काफी समय से वह यहीं स्वर्ण जंयती नगर में अपने परिवार के साथ रह रही हैं।
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वह एक अगस्त 2003 से आईसीटीसी (एकीकृत जांच एवं परामर्श केंद्र) में संविदा कर्मी के तौर पर कार्यरत हैं। रोजाना उनके सामने से करीब 35-40 लोगों की एचआईवी जांच रिपोर्ट गुजरती है। जिसमें औसतन आधा दर्जन एचआईवी पॉजिटिव केस होते हैं।
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जब किसी व्यक्ति को खुद के एड्स रोगी होने का पता चलता है, उसपर नाउम्मीदी छा जाती है। यहां तक कि जिंदा रहने की ख्वाहिश तक छोड़ देता है। ऐसे ही लोगों की झोली खुशियाें से भरती हैं जावित्री देवी। वर्ष 2004 से यह काम कर रही हैं। एक युवती की एचआईवी जांच पॉजिटिव निकली। उन्हें पता चला कि उक्त युवती का पति भी एड्स रोेगी था। शादी के महज एक माह बाद ही उसकी मौत हो गई थी।
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जावित्री ने सोचा, क्यों न कम उम्र विधवा का घर फिर से बसाया जाए। इस काम में उन्हें पूरे तीन साल लगे। वर्ष 2007 में उन्हें जांच के दौरान एचआईवी पॉजिटिव युवक मिला। यह युवक दो बच्चों का बाप था। उसकी पत्नी की मौत हो चुकी थी।
उन्होंने दोनों के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। इस पर दोनों राजी हो गए और दोनों का घर फिर से बस गया। इस जोड़े के चेहरे पर खुशियां देख कर जावित्री ने इस काम को मिशन बना लिया।
वह जांच के दौरान ड्यूटी से अलग हटकर ऐसे लोगों का ब्यौरा एकत्रित करती हैं। जावित्री अब तक डेढ़ दर्जन ऐसे जोड़ों की गृहस्थी बसा चुकी हैं। किसी के घर जाती हैं तो किसी से फोेन पर संपर्क करती हैं। जोड़ों का मिलान कराने के बाद भी उनके बारे में जानकारी रखती हैं। कई बार देर रात ऐसे मरीजों के फोन से उनकी नींद और घर में तनाव बढ़ता है।
वह कहती हैं- यह जरूरी नहीं कि एचआईवी पॉजिविट महिला का बच्चा भी एचआईवी पॉजिटिव ही हो। समय रहते जांच और उपचार से बच्चे को एचआईवी पॉजिटिव होेने से बचाया जा सकता है। वह कई बच्चों का उपचार भी करा रही हैं।
उनका कहना है कि अभी भी उनके संपर्क में कई एचआईवी पॉजिटिव लड़कियां हैं, जो अपने जैसों संग घर बसाना चाहती हैं। वह इनके लिए लड़कों की तलाश में हैं। मूलरूप से छर्रा निवासी जावित्री के पति बलवीर सिंह एक सरकारी महकमे में मुलाजिम हैं। उनकी ससुराल एटा में है ,लेकिन पिछले काफी समय से वह यहीं स्वर्ण जंयती नगर में अपने परिवार के साथ रह रही हैं।