अतीत का अलीगढ़ 10: अलग-अलग जातियों के लिए अंग्रेजों ने खोले थे अलग बैंक, ऐसे होता था उनमें लेनदेन
राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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विस्तार
आपको जानकर हैरानी होगी कि अंग्रेजों ने जिले में बैंक भी जातियों के आधार पर खोले थे। जिस जाति के लिए बैंक खोला गया था, उसमें उसी जाति के लोग लेन-देन कर सकते थे। जिले में ग्रामीण बैंक की शुरुआत सर्वप्रथम अतरौली तहसील के अरनी में 1902 में हुई थी।
अंग्रेजी दस्तावेज बताते हैं कि इसने काफी अच्छा काम किया था। 1905 में खैर में दो बैंक खोले गए थे। एक जाटों के लिए और दूसरा चमार जाति के लोगों के लिए था। खैर में खोले गए जाति आधारित बैंकों का प्रदर्शन खराब रहा। इसके एक वर्ष बाद ( 1906 में) अतरौली के बैन में दो बैंक खोले गए । एक मुसलमानों के लिए था और दूसरा चमार जाति के लिए। इसी साल अलीगढ़ तहसील के देवसैनी में एक और बैंक खोला गया लेकिन यह ज्यादा प्रगति नहीं कर पाया। जाति आधारित बैंकों के खोलने के प्रयोग को अंग्रेजों ने अपनी रिपोर्टों में सफल बताया।
1906 में रसलगंज में खोली गई थी बैंक ऑफ बंगाल की शाखा
अलीगढ़ के रसलगंज मोहल्ले में सरकारी दवाखाने के पास बैंक ऑफ बंगाल की शाखा खोली गई थी। इसे खोलने का उद्देश्य सामान्य बैंकिंग लेनदेन के अलावा हुंडी (गिरवी पर कर्ज देने) का था। तत्कालीन सरकारी खजांची लाला चिरंजी लाल इसके सब-एजेंट थे। चिरंजी लाल शहर की सबसे पुरानी व्यावसायिक फर्म मानसिंह-जवाहर लाल के स्वामी और प्रबंधक थे। चिरंजी लाल की अलीगढ़ में काफी प्रतिष्ठा थी। उनके पास जमीन-जायदाद थी। उनके परिवार में आर्थिक संपन्नता ब्रिटिश काल के दौर में आई, जब एक कुशल बैंक व्यवसायी के रूप में मान सिंह ने अपना लोहा मनवाया।
इंपीरियल बैंक की एक शाखा अलीगढ़ के मामू-भांजा मोहल्ले में 1906 में खोली गई। इसका मुख्यालय मेरठ में था। हालांकि इसके कई डायरेक्टर अलीगढ़ जिले के ही थे। इसके अलावा बैंक ऑफ बंगाल और इलाहाबाद बैंक की शाखाएं हाथरस में खोली गईं। इन बैंकों के अतिरिक्त अन्य कोई सार्वजनिक बैंक नहीं खोला गया।
इस दौर की उल्लेखनीय कुछ बड़ी फर्में
बैंकिंग कारोबार से जुड़ी कुछ बड़ी फर्में भी थीं। इनमें जहूर अली और अब्दुल गफ्फार खान ने अलीगढ़ के मियां गंज में अपना प्रतिष्ठान खोला था। दोनों की बुलंदशहर जिले में काफी बड़ी संपत्तियां थीं। राम जी-लक्ष्मण दास फर्म के स्वामी खुर्जा के बाशिंदे थे। इनकी खुर्जा में सूती कपड़ों की एक मिल थी। इनके कारोबारी भागीदार एक गुजराती गोपालदास थे। इन्हीं की तरह लल्ला मल-हरदेव दास फर्म भी थी। इसके स्वामी हाथरस और अलीगढ़ में सूती वस्त्र के कारोबार से जुड़े थे। आगरा के कारोबारियों की फर्म हीरा लाल-चुन्नी लाल ने दो साल के लिए अलीगढ़ में भी अपनी एजेंसी खोली थी।
उस दौर में अलीगढ़ के बैंकर बुधसेन नैनसुख का नाम भी उल्लेखनीय है। डिबाई के हरदेव दास-लाल चंद भी बैंकिंग व्यवसाय से जुड़े थे, हालांकि उनका भी कपड़ों का कारोबार था। जिले की अन्य फर्मों में हरनंद राय- फूलचंद, नंदराम-बेनी राम, हरमुख राय-दुली चंद उल्लेखनीय थे। हाथरस में बैंकिंग कारोबार मुख्यतः मारवाड़ियों के हाथ में था। ये लोग लगभग एक शताब्दी पहले मारवाड़ से आकर यहां बसे थे। निजी बैंकरों के कारोबार में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी। क्योंकि सार्वजनिक बैंकों ने ब्याज की दर काफी घटा दी थी।
38 फीसदी तक ब्याज लेते थे साहूकार
शुरुआती दौर में साहूकारी का काम वैश्य और ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था। इनकी ब्याज दर में कोई समानता नहीं थी। यह 12 फीसदी से लेकर 37.5 फीसदी तक हो सकता था। अगर कर्ज किसी वस्तु या संपत्ति को गिरवी रखकर लिया जाता था तो ब्याज दर में कमी भी कर दी जाती थी। बहुधा किसान फसलों के लिए गांवों के साहूकारों से कर्ज लेते थे, जो फसल होने पर चुकाया जाता था। कई बार सूखे-अकाल की स्थिति में किसान इसे नहीं चुका पाते तो उनसे बहुत ज्यादा ब्याज लिया जाता अथवा गिरवी रखा सामान रख लिया जाता था। सार्वजनिक बैंकों के आगमन से ब्याज दर में गिरावट के अलावा एकरूपता भी आ गई थी। इनका ब्याज दर छह फीसदी रहता था।
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स्रोतः अलीगढ़ का गजेटियर 1878-1909