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1804 में हुई अलीगढ़ में नगरीय प्रशासन की शुरुआत

Fri, 10 Nov 2017 02:22 AM IST
ब्यूूराे, अमर उजाला, अलीगढ़।
ब्यूूराे, अमर उजाला, अलीगढ़। Updated Fri, 10 Nov 2017 02:22 AM IST
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Beginning of urban administration in 1804 in Aligarh
Aligarh ka ghantaghar - फोटो : Amar Ujala
नगरीय निकाय चुनाव के समय यह जानना भी बेहद दिलचस्प है कि अलीगढ़ में शहरी प्रशासन की शुरुआत कब हुई? सन 1804 में अलीगढ़ को जिला बनाया गया। कर्नल रसल पहले कलक्टर बनाए गए। इसी के साथ शहर में नगरीय प्रशासन की नींव पड़ गई। इससे पहले अलीगढ़ मराठा साम्राज्य का हिस्सा था। मराठा साम्राज्य की सेना में फ्रांसीसी सैनिक और अधिकारी बड़ी संख्या में थे। 
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अलीगढ़ किला, जिसमें आज एएमयू का बॉटनिकल गार्डन है, इसमें मराठा सैनिकों (जिसमें फ्रांसीसी भी शामिल थे) के फौजी सामान का जमावड़ा रहता था। यह एक तरह का सैन्य पड़ाव हुआ करता था। इसके प्रवेश मार्ग पर एक पत्थर लगा है, जिसमें अंग्रेजों की फतह और फ्रांसीसी सैनिक अधिकारियों की शहादत का जिक्र है।
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जिला बनने के बाद यहां प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका ने अपना काम करना शुरू किया। एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद भी यहां पर न्यायिक अधिकारी रहे। 1857 के गदर का प्रभाव भी अलीगढ़ पर पड़ा। सीमेंट की सड़क सबसे पहले रेलवे रोड पर बनाई गई। इससे बहुत पहले ही अलीगढ़ में रेलवे लाइन आ चुकी थी। दिल्ली से हावड़ा जाने वाला मुख्य ट्रैक अलीगढ़ होकर ही गुजरता है। रेलवे से कनेक्टिविटी मिलने के बाद अलीगढ़ का विकास बहुत तेजी से हुआ।
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अंग्रेजों ने हथकड़ी बनाने का कारखाना अलीगढ़ में लगाया और इसी के साथ यहां पर ताला उद्योग की बुनियाद पड़ी। अब तक अलीगढ़ की पहचान ताला है, जबकि यह शिक्षा और हार्डवेयर उत्पादों के निर्यात का बड़ा केंद्र बन चुका है। अलीगढ़ के विकास और उसके नगरीय स्वरूप को गति देने का काम यहां पर प्रतिवर्ष लगने वाली ऐतिहासिक प्रदर्शनी ने भी किया है। इस प्रदर्शनी में कश्मीर से लेकर भारत के अन्य राज्यों के दुकानदार, कलाकार आदि आते हैं। 


- पहला बिजली का खंभा मोहल्ला जयगंज में लगा
- थानों के बाहर घोड़ों को पानी पिलाने वाली हौदियां बनी हुई थीं
- चूंकि तालों के व्यापार का बड़ा केंद्र था, इसलिए होटल तो नहीं थे, लेकिन सरायों की संख्या 84 थी
- सिविल लाइंस इलाके में पहुंचने को कठपुला (जिसके पुराने अवशेष अभी भी मौजूद हैं) पहला पुल बना
- कारों की जगह तांगे लोकल ट्रांसपोर्ट का मुख्य साधन थे, तांगा स्टैंड अभी भी मौजूद है

25 अंग्रेजों, छह नवाब तीन वैश्यों ने संभाली शहर की कमान
शहर की बात करें तो 1893 में शहर को नगर पालिका का दर्जा मिला। इसके बाद करीब 100 वर्ष तक शहर नगर पालिका ही रहा। इसको नगर निगम बनाने का श्रेय 1995 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को जाता है। वह यहां गोपी लौधुआ पर आनंद एग्रो चीनी मिल के शुभारंभ के मौके पर आए थे। नगर पालिका से नगर निगम तक के सफर में 25 अंग्रेज शासक, 6 मुस्लिम शासक और तीन बार वैश्य समुदाय के व्यक्ति ने शहर की कमान संभाली है। एक बार महिला ने कमान संभाली।

नगर पालिका से नगर निगम तक
- 1893 में पहली बार शहर नगर पालिका बना, जेएम हैरिसन मनोनीत प्रशासक बने। 
- 1 जून 1921 को अब्दुल समद खां अध्यक्ष बने
- 1923 में एम ख्वाजा दूसरे अध्यक्ष बने
- 1925 में सोहन लाल बीए अध्यक्ष बने
- 1931 में अब्दुल खालिक अध्यक्ष बने
- 1940 में शिव प्रसाद अध्यक्ष बने
- 1940 में ही अब्दुल मजीद ख्वाजा अध्यक्ष बने
- 1945 में एलएन माथुर अध्यक्ष बने
- 1945 में ही अब्दुल मुफीद खां शेरवानी अध्यक्ष
- 1952 में सुपरसीट होकर प्रशासन ने कार्य संभाला
- 1988 तक प्रशासकों ने ही बोर्ड चलाया
- 1988 में ओपी अग्रवाल अध्यक्ष बने
- 1995 में नगर निगम का दर्जा, आशुतोष वार्ष्णेय मेयर बने
- 2001 में सावित्री वार्ष्णेय महापौर बनीं
- 2006 में आशुतोष वार्ष्णेय फिर से महापौर बने
- 2012 में शकुंतला भारती महापौर बनीं
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