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बरौली विधानसभा सीट : पहले राम मंदिर, फिर मोदी लहर में खिला भाजपा का कमल
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अभिषेक शर्मा
बरौली विधानसभा क्षेत्र का प्रदेश की सियासत में अपना महत्वपूर्ण स्थान है। इस सीट के ज्यादातर विधायक प्रदेश में मंत्री बने हैं। राजनीतिक दलों के महत्व से अलग यह सीट ‘वीरों’ की जंग सियासी मैदान रही है। शायद यही वजह है कि आजादी से लेकर आज तक इस सीट पर भाजपा 1993 की राम मंदिर लहर में जीती या फिर 2017 की मोदी लहर में कमल खिला सकी। कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गौतम और राजा गभाना के बीच वर्चस्व वाली इस सीट पर एक दौर में सुरेंद्र सिंह व संग्राम सिंह के बीच सियासी खेमेबंदी रही।
सुरेंद्र सिंह के वर्चस्व पर ठा. दलवीर सिंह ने ब्रेक लगाया तो ठा. जयवीर सिंह ने उन्हें चुनावी पटखनी दी। पिछले दो बार से ठा. दलवीर सिंह व ठा. जयवीर सिंह के बीच वर्चस्व की जंग में दलवीर सिंह जीत दर्ज करते रहे हैं। आजादी के बाद हुए पहले चुनाव परिणामों पर गौर करें तो ब्राह्मण-ठाकुर बहुल यह सीट जवां-चंडौस के नाम से जानी जाती थी। उस समय यहां से प्रदेश के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गौतम लगातार दो बार चुनाव जीते। तीसरे चुनाव में यह सीट खैर के नाम से पहचानी गई और राजा गभाना कुंवर चैतन्य राज सिंह मैदान में आए और उन्होंने जीत दर्ज की। मोहनलाल गौतम इगलास चले गए। इसके बाद चंडौस के नाम से बनी इस सीट पर निर्दल केशवदेव हरियाणा ने जीत दर्ज की। इसके बाद महावीर सिंह ने बाजी मारी। 1974 से कद्दावर ठाकुर नेता सुरेंद्र सिंह चौहान सियासत में आए। पहला चुनाव जीते।
उनके सामने बाबू संग्राम सिंह को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, दूसरे चुनाव में सुरेंद्र सिंह को संग्राम सिंह ने हराया। फिर 1980 से 1989 तक लगातार तीन चुनाव सुरेंद्र सिंह चौहान जीते और वे प्रदेश में गृह मंत्री बने। 1991 में चंडौस ब्लॉक प्रमुख से सीधे विधायकी पर आए दलवीर सिंह ने सुरेंद्र सिंह चौहान को लगातार चौथा चुनाव जीतने का इतिहास नहीं बनाने दिया। दलवीर सिंह ने पहली बार जीत दर्ज की। राम मंदिर लहर में 1993 में भाजपा के मुनीष गौड़ ने दलवीर सिंह को हराया। 1996 में दलवीर सिंह ने कांग्रेस के बैनरतले वापसी की। मगर 2002 व 2007 में ठा. जयवीर सिंह ने लगातार दो बार दलवीर सिंह को चुनाव हराया। 2012 में फिर दलवीर सिंह ने रालोद के बैनरतले वापसी की। 2017 के चुनाव में उन्होंने मोदी लहर में भाजपा का दामन थाम कर अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा है।
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जीत की हैट्रिक सिर्फ सुरेंद्र सिंह चौहान के नाम
इस सीट को लेकर कहा जाता है कि इकलौते सुरेंद्र सिंह चौहान ऐसे नेता रहे, जिनके नाम इस सीट पर जीत की हैट्रिक का रिकार्ड दर्ज है। इस हैट्रिक को जयवीर सिंह व दलवीर सिंह दोनों ने बनाने का प्रयास किया है। मगर अब तक सफल नहीं हुए हैं।
--इनके सिर सजा जीत का सेहरा
1952 में कांग्रेस से मोहनलाल गौतम
1957 में कांग्रेस से मोहनलाल गौतम
1962 में स्वराज पार्टी से कुं. चैतन्यराज सिंह
1967 में निर्दल केशव देव हरियाणा
1969 में भारतीय क्रांति दल से महावीर सिंह
1974 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1977 में जेएनपी से बाबू संग्राम सिंह
1980 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1985 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1989 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1991 में जनता दल से ठा. दलवीर सिंह
1993 में भाजपा से मुनीष गौड़
1996 में कांग्रेस से ठा. दलवीर सिंह
2002 में बसपा से ठा. जयवीर सिंह
2007 में बसपा से ठा. जयवीर सिंह
2012 में रालोद से ठा. दलवीर सिंह
2017 में भाजपा से ठा. दलवीर सिंह
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बरौली विधानसभा क्षेत्र का प्रदेश की सियासत में अपना महत्वपूर्ण स्थान है। इस सीट के ज्यादातर विधायक प्रदेश में मंत्री बने हैं। राजनीतिक दलों के महत्व से अलग यह सीट ‘वीरों’ की जंग सियासी मैदान रही है। शायद यही वजह है कि आजादी से लेकर आज तक इस सीट पर भाजपा 1993 की राम मंदिर लहर में जीती या फिर 2017 की मोदी लहर में कमल खिला सकी। कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गौतम और राजा गभाना के बीच वर्चस्व वाली इस सीट पर एक दौर में सुरेंद्र सिंह व संग्राम सिंह के बीच सियासी खेमेबंदी रही।
सुरेंद्र सिंह के वर्चस्व पर ठा. दलवीर सिंह ने ब्रेक लगाया तो ठा. जयवीर सिंह ने उन्हें चुनावी पटखनी दी। पिछले दो बार से ठा. दलवीर सिंह व ठा. जयवीर सिंह के बीच वर्चस्व की जंग में दलवीर सिंह जीत दर्ज करते रहे हैं। आजादी के बाद हुए पहले चुनाव परिणामों पर गौर करें तो ब्राह्मण-ठाकुर बहुल यह सीट जवां-चंडौस के नाम से जानी जाती थी। उस समय यहां से प्रदेश के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गौतम लगातार दो बार चुनाव जीते। तीसरे चुनाव में यह सीट खैर के नाम से पहचानी गई और राजा गभाना कुंवर चैतन्य राज सिंह मैदान में आए और उन्होंने जीत दर्ज की। मोहनलाल गौतम इगलास चले गए। इसके बाद चंडौस के नाम से बनी इस सीट पर निर्दल केशवदेव हरियाणा ने जीत दर्ज की। इसके बाद महावीर सिंह ने बाजी मारी। 1974 से कद्दावर ठाकुर नेता सुरेंद्र सिंह चौहान सियासत में आए। पहला चुनाव जीते।
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उनके सामने बाबू संग्राम सिंह को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, दूसरे चुनाव में सुरेंद्र सिंह को संग्राम सिंह ने हराया। फिर 1980 से 1989 तक लगातार तीन चुनाव सुरेंद्र सिंह चौहान जीते और वे प्रदेश में गृह मंत्री बने। 1991 में चंडौस ब्लॉक प्रमुख से सीधे विधायकी पर आए दलवीर सिंह ने सुरेंद्र सिंह चौहान को लगातार चौथा चुनाव जीतने का इतिहास नहीं बनाने दिया। दलवीर सिंह ने पहली बार जीत दर्ज की। राम मंदिर लहर में 1993 में भाजपा के मुनीष गौड़ ने दलवीर सिंह को हराया। 1996 में दलवीर सिंह ने कांग्रेस के बैनरतले वापसी की। मगर 2002 व 2007 में ठा. जयवीर सिंह ने लगातार दो बार दलवीर सिंह को चुनाव हराया। 2012 में फिर दलवीर सिंह ने रालोद के बैनरतले वापसी की। 2017 के चुनाव में उन्होंने मोदी लहर में भाजपा का दामन थाम कर अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा है।
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जीत की हैट्रिक सिर्फ सुरेंद्र सिंह चौहान के नाम
इस सीट को लेकर कहा जाता है कि इकलौते सुरेंद्र सिंह चौहान ऐसे नेता रहे, जिनके नाम इस सीट पर जीत की हैट्रिक का रिकार्ड दर्ज है। इस हैट्रिक को जयवीर सिंह व दलवीर सिंह दोनों ने बनाने का प्रयास किया है। मगर अब तक सफल नहीं हुए हैं।
--इनके सिर सजा जीत का सेहरा
1952 में कांग्रेस से मोहनलाल गौतम
1957 में कांग्रेस से मोहनलाल गौतम
1962 में स्वराज पार्टी से कुं. चैतन्यराज सिंह
1967 में निर्दल केशव देव हरियाणा
1969 में भारतीय क्रांति दल से महावीर सिंह
1974 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1977 में जेएनपी से बाबू संग्राम सिंह
1980 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1985 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1989 में कांग्रेस से सुरेंद्र सिंह चौहान
1991 में जनता दल से ठा. दलवीर सिंह
1993 में भाजपा से मुनीष गौड़
1996 में कांग्रेस से ठा. दलवीर सिंह
2002 में बसपा से ठा. जयवीर सिंह
2007 में बसपा से ठा. जयवीर सिंह
2012 में रालोद से ठा. दलवीर सिंह
2017 में भाजपा से ठा. दलवीर सिंह