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अलीगढ़ : यातनाओं की स्मृति से सिहर उठता है मन

Sat, 25 Jun 2022 01:54 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 25 Jun 2022 01:54 AM IST
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Aligarh news
अजय पटेल। - फोटो : CITY OFFICE
देश में इमरजेंसी के उस दौर को शायद ही कभी भुलाया जा सकता है, जब भी जिक्र छिड़ता है तो जेहन में यातनाओं को याद कर मन सिहर उठता है और सरकार के प्रति वही गुस्सा नुमाया हो जाता है। शब्दों में उसे यातनाओं की इंतिहा के सिवाय कुछ और नहीं कहा जा सकता। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के सबसे कम उम्र के लोकतंत्र सेनानी अलीगढ़ शहर के अजय पटेल जेल भेजे गए थे। उनका दोष सिर्फ इतना था कि वे मुंह पर काली पट्टी बांधकर व हाथों में चूड़ियां लेकर प्रदर्शन करते घूम रहे थे। ये कहानी है 25 जून 1975 को लागू हुई इमरजेंसी के बाद की। कहने को जिले में 200 के आसपास लोकतंत्र सेनानी जीवित हैं, जिनमें से 95 लोग पेंशन भी पा रहे हैं। पेश है इमरजेंसी को लेकर लोकतंत्र सेनानियों से बातचीत....
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जेल में मनाया अपना तेरहवां जन्मदिन
शहर के प्रमुख निर्यातक व पूर्व विधायक पुत्र अजय पटेल अपनी जुबानी उस दौर की कहानी बताते हुए कहते हैं, मैं उस दौर को कभी नहीं भूल सकता। संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाले पिताजी ठा. इंद्रपाल सिंह शहर सीट से विधायक थे। इमरजेंसी के समय मेरी उम्र 12 वर्ष थी। मैं संघ का स्वयंसेवक हूं। इमरजेंसी लागू होने के बाद हमें बालक होने के नाते पुलिस की गतिविधियों को देखने के लिए लगाया गया था। एक दिन सबसे पहली टोली के पांच लोग कोतवाली में गिरफ्तार किए गए। मुझे साइकिल लेकर मेरे सराय हकीम वाले घर से उन्हें देखने के लिए भेजा गया कि पता करके आओ, वहां क्या हो रहा है। उनकी पिटाई देखकर जब मैं लौट रहा था तो मन में इतना गुस्सा था कि अभी प्रदर्शन शुरू कर दूं, मगर बड़ों की इजाजत नहीं थी। बाद में हम लोग हाथों में चूड़ियां और मुंह पर पट्टी बांधे चौ. बिशनवीर जी के नेतृत्व में जुलूस निकाल रहे थे। हम नौ लोग थे, जिनमें हम पांच बच्चे थे। मेरे अलावा मेरे दोस्त मुकेश साईं, नवीन, राजेश आदि शामिल थे। पुराने शहर में भ्रमण के बाद हमें फूल चौराहे पर पकड़ा गया। हमारे सामने चौ. बिशनबीर सिंह व प्रमोद बंसल को पीटा गया और हमें खूब डराया गया। बाद में जेल भेज दिया। जिस दिन मैं जेल गया था, उस वक्त मेरी उम्र 12 वर्ष 11 माह थी। 13वें वर्ष का जन्म दिन जेल में मनाया था। 19 दिन बाद जमानत पर रिहा हुए। उस दौर को भुलाया नहीं जा सकता। ये सही है कि लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन का प्रावधान है, मगर आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण मैंने पेंशन नहीं ली।
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- ये वो दौर था, जिसमें हम लोगों को भूमिगत रहने में ही भलाई समझ में आती थी। गिरफ्तारी के बाद पेड़ों पर लटकाकर पिटाई की जाती थी। खाने में कंकड़ व झींगुर जानबूझकर दिए जाते थे। खुद मेरे पैरों में जख्म के निशान आज भी हैं। आठ जुलाई को गिरफ्तारी के बाद दो माह जेल रहना पड़ा था। - राजेंद्र वार्ष्णेय चीफ, भाजपा नेता
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- शुरू से सामाजिक व राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहने के कारण हम संघ से जुड़े थे। 25 वर्ष की उम्र थी, जब इमरजेंसी लागू हुई। तारीख तो याद नहीं, मगर 18 दिन जेल में रहना पड़ा था। यातनाओं के विषय में बस इतना ही कहा जा सकता है कि कंपकंपा देने वाली यातनाएं देखने और झेलने को मिलती थीं।
- सुरेंद्र अग्रवाल, पूर्व महामंत्री भाजपा
- अब उम्र 64 वर्ष हो गई है, मगर उस दौर को अभी तक भुलाया नहीं जा सकता। परिवार शुरू से संघ से जुड़ा रहा। इसलिए इमरजेंसी के दौर में परिवार निशाने पर रहा। हम तीन भाई जेल गए। हाथरस अड्डा से मेरी गिरफ्तारी हुई थी। दो माह जेल में रहने के बाद रिहाई हुई। वह यातनाओं की इंतिहा थी। - योगेंद्र सक्सेना
- उन यातनाओं के विषय में क्या बताया जाए। नाखून तक उखाड़े जाते थे। गिरफ्तारी के बाद हमारे नगर प्रचारक व मौजूदा कथा वाचक विजय कौशल का नाम पूछा जाता था। पीटा जाता था। कई कई दिन थाने में रखा जाता था। किसी से मिलने नहीं दिया जाता था। उस दौर को याद कर आज भी गुस्सा आता है। - अशोक उपाध्याय, पूर्व एडीजीसी
नवमान का पूरा परिवार गया था जेल
शहर के तीन बार के पूर्व विधायक स्व. केके नवमान का पूरा परिवार इमरजेंसी के दौरान जेल गया था। पुराने लोग बताते हैं कि केके नवमान अपनी मां, पिता आदि के साथ घर से जुलूस लेकर निकले थे। उन्हें वहीं पकड़ लिया गया था। इसके बाद सभी को जेल भेज दिया गया। नवमान को नैनी जेल भेज दिया गया था। इसी तरह कल्याण सिंह को वाराणसी व चौ. राजेंद्र सिंह को भी दूसरे जिले की जेल में भेजा गया था।
जिन पर लगे धारा 188 के मुकदमे, उन्हें नहीं दी गई पेंशन
जिले में वैसे तो 200 के आसपास लोकतंत्र सेनानी हैं, मगर पेंशन मात्र 95 को ही मिल रही है। जानकार बताते हैं कि कुछ की मृत्यु हो गई। कुछ ऐसे हैं, जिन्होंने पेंशन लेना उचित नहीं समझा। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें डीआरआई के मुकदमे के साथ-साथ धारा 188 में भी गिरफ्तार किया था। इसे आपराधिक मुकदमा मानकर पेंशन नहीं दी गई। हालांकि सभी मुकदमे वर्ष 1977 में सरकार बदलने के बाद वापस ले लिए गए थे।
मदार गेट पर रेलवे की पटरी उखाड़ने का आरोप
राजेंद्र वार्ष्णेय चीफ वाली टीम मीनाक्षी पुल से पकड़ी गई, मगर मुकदमे में उन्हें मदार गेट पर रेल की पटरी उखाड़ने का आरोपी बनाया, जबकि मदार गेट पर कभी कोई रेलवे लाइन नहीं रही।

जब केके नवमान ने मारा था सीओ को थप्पड़
केके नवमान को गिरफ्तारी के लिए मदार गेट पर उस समय के सीओ ने रोका तो वहां बहस के दौरान नवमान ने सीओ के थप्पड़ मार दिया था। इसके बाद उनकी बेरहमी से पिटाई की गई।

योगेश सक्सेना।

योगेश सक्सेना।- फोटो : CITY OFFICE

राजेन्द्र वार्ष्णेय चीफ।

राजेन्द्र वार्ष्णेय चीफ।- फोटो : CITY OFFICE

अशोक उपाध्याय।

अशोक उपाध्याय। - फोटो : CITY OFFICE

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