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अलीगढ़ : शिक्षक से सियासत का सफर... खुद के रजिस्टर से लिखी प्रदेश संभालने की इबारत

Mon, 23 Aug 2021 01:23 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अभिषेक शर्मा, अलीगढ़
अभिषेक शर्मा, अलीगढ़ Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Mon, 23 Aug 2021 01:23 AM IST
सार

जब उन्हें भाजपा की स्थापना पर प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने एक रजिस्टर तैयार करना शुरू कर दिया।

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Aligarh: Journey from teacher to politics...The letter of handling the state written from its own register
डीएस कॉलेज में दो जनवरी 2017 को डिजिटल लाइब्रेरी के उद्घाटन के लिए पहुंचे थे तत्कालीन राजस्थान के र? - फोटो : CITY OFFICE

विस्तार

अतरौली के रायपुर इंटर कॉलेज के शिक्षक से यूपी के दो बार के मुख्यमंत्री और देश के दो प्रांतों के राज्यपाल तक का सफर तय करने वाले बाबूजी कल्याण सिंह ने भाजपा के गठन के साथ ही खुद प्रदेश संभालने की इबारत लिखना शुरू कर दिया था। जब उन्हें भाजपा की स्थापना पर प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने एक रजिस्टर तैयार करना शुरू कर दिया।

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उसमें प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों का ब्योरा दर्ज किया करते थे। उसी ब्योरे के अनुसार बाबूजी ने पहली बार यूपी में सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला लांच करते हुए 1984 में टिकटों का बंटवारा कराया और उसमें वे सफल भी हुए। यह किस्से याद करते हुए उनके साथ के राजनीतिक जानकार यही कहते हैं कि वे बेहद मझे हुए संगठन संचालक और कठोर निर्णय लेने वाले प्रशासक थे।
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जत्ते बाबू की बाइक से अलीगढ़ आते थे बाबूजी
भाजपा की स्थापना के समय भाजपा युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष रहे योगेश शर्मा बताते हैं कि भाजपा गठन के समय यूपी में माधव प्रसाद को प्रदेशाध्यक्ष व महामंत्री बाबूजी कल्याण सिंह बने। बाबूजी ने उसी समय बारहद्वारी पर भाजपा कार्यालय शुरू कराया और उस समय उन पर अपनी बाइक भी नहीं होती थी। वे अतरौली के ही एक पुराने कार्यकर्ता जयप्रकाश जत्ते बाबू की बाइक पर उनके साथ यहां हर रोज आया करते थे।
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प्रदेश संभालने की इच्छा से शुरू किया काम
योगेश शर्मा बताते हैं कि चूंकि पूर्व में वे जनसंघ से विधायक रह चुके थे। बाद में जनता पार्टी की सरकार में 1977 में स्वास्थ्य मंत्री भी रहे। इसलिए भाजपा की स्थापना के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी। इसके चलते उन्होंने प्रदेश संभालने की इच्छा के साथ विधानसभा वार ब्योरा संकलित करने का काम शुरू कर दिया।

एक टीवी साक्षात्कार में खुद बाबूजी ने यह बात स्वीकारी थी कि उन्होंने प्रदेश की प्रत्येक विधानसभा का जातिवार, महिला पुरुष वार मतदाताओं का ब्योरा एकत्रित किया। उसी ब्योरे के अनुसार पार्टी को टिकट वितरण के लिए सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के तहत तैयार किया। जिसमें बाबूजी ने जिन सीटों पर अपने लोगों को टिकट दिलाया, उन पर वे जीते। जिनमें कोल की किशनलाल दिलेर की सीट व शहर से ठा.इंद्रपाल सिंह को विधायक जिताया। खुद अतरौली से जीते थे।

हिंदृू हृदय सम्राट की जिद के आगे न टिक सका कोई
कहा जाता है कि फर्श से अर्श पर पहुंचने वाले हर व्यक्ति के अपने सिद्धांत और नियम होते हैं। ऐसा ही कुछ सियासी जानकार पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के विषय में कहते हैं। कहा जाता है कि वे बेहद मिलनसार और अपनत्व का भाव रखने वाले राजनेता जरूर थे। लोगों को जोड़ना उनका हुनर था। मगर सियासी ‘जंग’ में जिद उनका सबसे बड़ा हथियार था।

इस जिद के आगे अच्छे अच्छे न टिक सके। यही वजह रही कि अयोध्या कांड के बाद कल्याण सिंह को हिंदृ हृदय सम्राट के रूप में पुकारा जाने लगा और देश भर में उन्हें इसी रूप में पहचान मिली। जिद ही वजह थी कि अटल जी और कल्याण सिंह की बहुत करीबियां थीं। मगर एक समय ऐसा भी आया, जब कल्याण सिंह ने अटल जी से अदावत शुरू कर दी।

1999 के लोक सभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की सीटों का बंटवारा इस अदावत का मुद्दा बना। कई टिकट देने को लेकर कल्याण सिंह ने यहां तक कह दिया कि फलां हार जाएगा। मगर अटल जी नहीं माने। कल्याण सिंह ने इसे लेकर व्यंगात्मक लहजे में बातचीत शुरू कर दी।


इसी दौर में अटल जी शीला गौतम की चुनावी रैली को संबोधित करने आए। मगर कल्याण सिंह उस रैली में शामिल नहीं हुए। यहां लोगों ने अटल जी से पूछा तो उनका जवाब था कि वे यूपी के बड़े नेता हैं। चुनावी व्यस्तता में कहीं और होंगे। परेशान होने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा और भी बहुत से किस्से हैं जो उनकी जिद का परिचय देते हैं।

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