{"_id":"59ececd44f1c1b70548b8b44","slug":"91508699348-aligarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अलीगढ़... काटे बड़े बड़े पेड़, भरपाई झाड़ियों से","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अलीगढ़... काटे बड़े बड़े पेड़, भरपाई झाड़ियों से
Updated Mon, 23 Oct 2017 12:39 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
काटे बड़े बड़े पेड़, भरपाई झाड़ियों से
ब्यूरो, अमर उजाला, कासिमपुर (अलीगढ़)।
हरदुआगंज तापीय विद्युत परियोजना के विस्तार के लिए 660 मेगावाट यूनिट लगाने की आड़ में हजारों ऐसे पेड़ कटवा दिए गए, जो सैकड़ों वर्ष पुराने थे और पर्यावरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे। लेकिन उनके स्थान पर किए जाने वाले पौधरोपण में झाड़ी नुमा पौधे लगाए जा रहे हैं। जो परिस्थितिकीय चक्र के अनुसार बेहद महत्वहीन है।
पर्यावरण सुरक्षा समिति हरीतिमा के अध्यक्ष सुबोध नंदन शर्मा ने इस पर ऐतराज जताते हुए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखा है। पत्र में कहा है कि यहां पर पौधे तैयार करने के लिए बनाई नर्सरी की हालत बद से बदतर है। किसी भी वन विभाग के अधिकारी का ध्यान इस नर्सरी पर नहीं है। जबकि नियम यह है कि जितने पेड़ काटे गये हैं उतने ही पौधे विभाग लगा कर पेड़ाें की भरपाई की जाए।
अपर गंग नहर के पास सिंचाई विभाग का अतिथि गृह जर्जर हालत में है।। यहां खाली जगह में हरदुआगंज तापीय विद्युत परियोजना के खर्चे पर वन विभाग की ओर से 3.5 हेक्टेयर जमीन में 7000 हजार पौधे वन विभाग की ओर से लगाए गए थे। लगभग ढाई साल बाद नर्सरी में लगे पौधे बदहाल हैं। यही पौधे नई यूनिट के लिए कटवाए गए हरे पेड़ों के बदले में लगाए जाने थे।
विज्ञापन
अधिकांश हरे पेड़ कट गए हैं। अब कुछ ही बचे हैं। इनमें बहुमूल्य पौधे नीम, जामुन, गूलर, शीशम, सेमल अमलताश, आम व अन्य प्रजातियों के कई दशक पुराने हरे पेड़ थे। इन 1950 पेड़ों की नीलामी 90 लाख रुपये हुई थी। लाखों रुपये खर्च करने के बाद नर्सरी में लगाए गए पौधों की हालत सबके सामने है। देख भाल न होने के कारण भांग, पतेल व अन्य तरह के जंगली पौधे उग कर इतने बडे़ हो गए हैं कि लगाए गए पौधे दिखाई नहीं देते हैं।
ये प्रजातियां लगाई गईं
स्टरकुलिया, कंजी, टिकोमा, बालमखीरा, होवीकस, बोतलब्रश, जरूल, बकायन, सागौन, बहेड़ा, पीपल, अर्जुन, सावनी, गुलमोहर। पर्यावरणविद् सुबोध नंदन शर्मा कहते हैं कि यह वह प्रजातियां हैं जिसमें पक्षी जीवन नहीं पनपता। यह भारतीय पर्यावरण चक्र के अनुकूल भी नहीं हैं। इससे हरियाली दिखाई दे सकती है, लेकिन पक्षियों के लिए यह बेकार हैं। यह बगीचा या पार्क हो सकता है जंगल नहीं।
विज्ञापन
ब्यूरो, अमर उजाला, कासिमपुर (अलीगढ़)।
हरदुआगंज तापीय विद्युत परियोजना के विस्तार के लिए 660 मेगावाट यूनिट लगाने की आड़ में हजारों ऐसे पेड़ कटवा दिए गए, जो सैकड़ों वर्ष पुराने थे और पर्यावरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे। लेकिन उनके स्थान पर किए जाने वाले पौधरोपण में झाड़ी नुमा पौधे लगाए जा रहे हैं। जो परिस्थितिकीय चक्र के अनुसार बेहद महत्वहीन है।
पर्यावरण सुरक्षा समिति हरीतिमा के अध्यक्ष सुबोध नंदन शर्मा ने इस पर ऐतराज जताते हुए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखा है। पत्र में कहा है कि यहां पर पौधे तैयार करने के लिए बनाई नर्सरी की हालत बद से बदतर है। किसी भी वन विभाग के अधिकारी का ध्यान इस नर्सरी पर नहीं है। जबकि नियम यह है कि जितने पेड़ काटे गये हैं उतने ही पौधे विभाग लगा कर पेड़ाें की भरपाई की जाए।
विज्ञापन
अपर गंग नहर के पास सिंचाई विभाग का अतिथि गृह जर्जर हालत में है।। यहां खाली जगह में हरदुआगंज तापीय विद्युत परियोजना के खर्चे पर वन विभाग की ओर से 3.5 हेक्टेयर जमीन में 7000 हजार पौधे वन विभाग की ओर से लगाए गए थे। लगभग ढाई साल बाद नर्सरी में लगे पौधे बदहाल हैं। यही पौधे नई यूनिट के लिए कटवाए गए हरे पेड़ों के बदले में लगाए जाने थे।
विज्ञापन
अधिकांश हरे पेड़ कट गए हैं। अब कुछ ही बचे हैं। इनमें बहुमूल्य पौधे नीम, जामुन, गूलर, शीशम, सेमल अमलताश, आम व अन्य प्रजातियों के कई दशक पुराने हरे पेड़ थे। इन 1950 पेड़ों की नीलामी 90 लाख रुपये हुई थी। लाखों रुपये खर्च करने के बाद नर्सरी में लगाए गए पौधों की हालत सबके सामने है। देख भाल न होने के कारण भांग, पतेल व अन्य तरह के जंगली पौधे उग कर इतने बडे़ हो गए हैं कि लगाए गए पौधे दिखाई नहीं देते हैं।
ये प्रजातियां लगाई गईं
स्टरकुलिया, कंजी, टिकोमा, बालमखीरा, होवीकस, बोतलब्रश, जरूल, बकायन, सागौन, बहेड़ा, पीपल, अर्जुन, सावनी, गुलमोहर। पर्यावरणविद् सुबोध नंदन शर्मा कहते हैं कि यह वह प्रजातियां हैं जिसमें पक्षी जीवन नहीं पनपता। यह भारतीय पर्यावरण चक्र के अनुकूल भी नहीं हैं। इससे हरियाली दिखाई दे सकती है, लेकिन पक्षियों के लिए यह बेकार हैं। यह बगीचा या पार्क हो सकता है जंगल नहीं।