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कुपोषित बच्चों के इलाज में लापरवाही पर अब अदालत की शरण
Updated Wed, 31 Jan 2018 02:32 AM IST
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
कुपोषित बच्चों के उपचार में अभिभावकों को ही लापरवाह बताकर अपना बचाव कर रहे स्वास्थ्य विभाग के अफसर 10 दिन में 26 बच्चों की स्क्रीनिंग तक नहीं करा सके हैं। जबकि इन बच्चों के परिजनों ने मदद के लिए खुद ही अफसरों को फोन किया था।
इनकी पूरा ब्यौरा सीएमओ को भी भेजा गया था। दस दिन बाद दिए गए जवाब में एसीएमओ स्तर से आरबीएसके टीम का माइक्रो प्लान व बाकी नियम गिना दिए गए हैं।
अमर उजाला उपचार से वंचित कुपोषित बच्चों की पड़ताल कर रहा है। कुपोषण के खिलाफ जंग में स्मार्ट विलेज फाउंडेशन भी मैदान में है। पिछले दिनों फाउंडेशन ने मदद के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की।
सैकड़ों कॉल आईं, उनमें 26 लोग ऐसे हैं, जिनके बच्चों को तुरंत उपचार की जरूरत है। इन बच्चों की समस्या के साथ उनके नाम, पते व मोबाइल नंबर तक सीएमओ को 22 जनवरी को उपलब्ध करा दिए गए थे। परंतु आज तक विभाग उन बच्चों की स्क्रीनिंग तक नहीं करा सका।
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बता दें कि इस मामले में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री विभागीय जवाब की प्रति मेल कर दी है। साथ ही अन्य जानकारी भी भेजी हैं। जिसमें कहा गया है कि सीएमओ दफ्तर से लेकर सीएचसी तक स्वास्थ्य विभाग का मूल स्टाफ आरबीएसके टीम को मनमानी से चला रहे हैं।
नियम तो ये हैं
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम संचालित है। इसकी टीम 0 से 19 वर्ष के हर बच्चे की जांच करेगी। जांच में जो गंभीर मिलेंगें, उन्हें सही सलाह के साथ एक्सपर्ट सेंटर के लिए रैफर करेंगे। उपचाराधीन बच्चों का फॉलोअप भी यही टीम करेगी। आंगनबाड़ी से लेकर आशा तक इसमें सबकी मदद ली जाती है। टीम कैसे बच्चों तक पहुंचेगी इसके लिए हर साल माइक्रो प्लान बनता है।
ये है विभाग का जवाब
आरबीएसके माइक्रो प्लान के हिसाब से स्कूल व आंगनबाड़ी तक कार्य करती हैं। उसमें बच्चों की जांच होती है, परामर्श देते हैं। गंभीर मामलों में जिला स्तर पर रैफर करते हैं। डीईआईसी व जिला अस्पताल ले जाने की जिम्मेदारी स्वयं अभिभावक की है। एनआरसी में 102 एंबुलेंस की मदद से आशा व आंगनबाड़ी पहुंचाएंगी। एसीएमओ डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि ऐसे बच्चों को भर्ती कराने पर 50 रुपये व फॉलोअप के लिए भी 50 रुपये मिलते हैं। लेकिन इस गंभीर बीमारी के लिए अभिभावकों को जागरूक करने की जरूरत है, क्योंकि वो भर्ती कराने को तैयार नहीं होते हैं।
कार्यवाही पर गोलमोल जवाब
विभाग ने अपने इस जवाब में एक लाइन में कहा कि कुपोषित व अतिकुपोषित सूची व मोनिटरिंग के लिए भी सभी सीएचसी पीएचसी को निर्देशित कर दिया गया है। इसमें ये नहीं बताया कि उन्हें क्या निर्देश दिए गए हैं।
बयान
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम कागजों में ही पूरा किया जा रहा है। 26 बच्चों की स्क्रीनिंग अब तक नहीं हुई है। प्रदेश से केंद्र तक सभी को पूरे हालात बता चुके हैं। एक भी बच्चे के साथ कोई अनहोनी हुई तो अब अदालत की शरण लेंगे।
- विपिन चौधरी, अध्यक्ष स्मार्ट विलेज फाउंडेशन।
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कुपोषित बच्चों के उपचार में अभिभावकों को ही लापरवाह बताकर अपना बचाव कर रहे स्वास्थ्य विभाग के अफसर 10 दिन में 26 बच्चों की स्क्रीनिंग तक नहीं करा सके हैं। जबकि इन बच्चों के परिजनों ने मदद के लिए खुद ही अफसरों को फोन किया था।
इनकी पूरा ब्यौरा सीएमओ को भी भेजा गया था। दस दिन बाद दिए गए जवाब में एसीएमओ स्तर से आरबीएसके टीम का माइक्रो प्लान व बाकी नियम गिना दिए गए हैं।
अमर उजाला उपचार से वंचित कुपोषित बच्चों की पड़ताल कर रहा है। कुपोषण के खिलाफ जंग में स्मार्ट विलेज फाउंडेशन भी मैदान में है। पिछले दिनों फाउंडेशन ने मदद के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की।
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सैकड़ों कॉल आईं, उनमें 26 लोग ऐसे हैं, जिनके बच्चों को तुरंत उपचार की जरूरत है। इन बच्चों की समस्या के साथ उनके नाम, पते व मोबाइल नंबर तक सीएमओ को 22 जनवरी को उपलब्ध करा दिए गए थे। परंतु आज तक विभाग उन बच्चों की स्क्रीनिंग तक नहीं करा सका।
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बता दें कि इस मामले में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री विभागीय जवाब की प्रति मेल कर दी है। साथ ही अन्य जानकारी भी भेजी हैं। जिसमें कहा गया है कि सीएमओ दफ्तर से लेकर सीएचसी तक स्वास्थ्य विभाग का मूल स्टाफ आरबीएसके टीम को मनमानी से चला रहे हैं।
नियम तो ये हैं
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम संचालित है। इसकी टीम 0 से 19 वर्ष के हर बच्चे की जांच करेगी। जांच में जो गंभीर मिलेंगें, उन्हें सही सलाह के साथ एक्सपर्ट सेंटर के लिए रैफर करेंगे। उपचाराधीन बच्चों का फॉलोअप भी यही टीम करेगी। आंगनबाड़ी से लेकर आशा तक इसमें सबकी मदद ली जाती है। टीम कैसे बच्चों तक पहुंचेगी इसके लिए हर साल माइक्रो प्लान बनता है।
ये है विभाग का जवाब
आरबीएसके माइक्रो प्लान के हिसाब से स्कूल व आंगनबाड़ी तक कार्य करती हैं। उसमें बच्चों की जांच होती है, परामर्श देते हैं। गंभीर मामलों में जिला स्तर पर रैफर करते हैं। डीईआईसी व जिला अस्पताल ले जाने की जिम्मेदारी स्वयं अभिभावक की है। एनआरसी में 102 एंबुलेंस की मदद से आशा व आंगनबाड़ी पहुंचाएंगी। एसीएमओ डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि ऐसे बच्चों को भर्ती कराने पर 50 रुपये व फॉलोअप के लिए भी 50 रुपये मिलते हैं। लेकिन इस गंभीर बीमारी के लिए अभिभावकों को जागरूक करने की जरूरत है, क्योंकि वो भर्ती कराने को तैयार नहीं होते हैं।
कार्यवाही पर गोलमोल जवाब
विभाग ने अपने इस जवाब में एक लाइन में कहा कि कुपोषित व अतिकुपोषित सूची व मोनिटरिंग के लिए भी सभी सीएचसी पीएचसी को निर्देशित कर दिया गया है। इसमें ये नहीं बताया कि उन्हें क्या निर्देश दिए गए हैं।
बयान
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम कागजों में ही पूरा किया जा रहा है। 26 बच्चों की स्क्रीनिंग अब तक नहीं हुई है। प्रदेश से केंद्र तक सभी को पूरे हालात बता चुके हैं। एक भी बच्चे के साथ कोई अनहोनी हुई तो अब अदालत की शरण लेंगे।
- विपिन चौधरी, अध्यक्ष स्मार्ट विलेज फाउंडेशन।