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अलीगढ़ में 6.22 फीसदी टीका हो रहा बर्बाद
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कौशल कुमार ओझा, अलीगढ़।
कोरोना वायरस के विरुद्ध टीका कारगर हथियार है लेकिन जिले में औसतन 6.22 प्रतिशत टीका बर्बाद हो रहा है। इसमें 5.24 प्रतिशत कोविशील्ड एवं 7.21 प्रतिशत कोवाक्सिन टीके की बर्बादी हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, इसका प्रमुख कारण यह है कि लोग एक साथ टीका लगवाने नहीं आ रहे हैं। शीशी एक बार खुलने पर चार घंटे तक ही डोज इस्तेमाल की जा सकती है।
कोराना टीकाकरण के शुरूआती दिनों में टीके की बर्बादी के मामले में अलीगढ़ जनपद शीर्ष पर था। उस समय 42 प्रतिशत टीका बर्बाद हो रहा था। मार्च में मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष यह मुद्दा उठा था। केंद्र व राज्य सरकार की सख्ती के बाद कोरोना टीके से संबंधित रिपोर्ट प्रतिदिन मांगी जाने लगी। वर्तमान में देश में टीके की बर्बादी का औसत 6.5 प्रतिशत है। जबकि उत्तर प्रदेश का औसत 9.4 प्रतिशत है यानी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय औसत से भी अधिक टीका बर्बाद हो रहा है।
सीएमओ डॉ. बीपी सिंह कल्याणी ने बताया कि जनपद में कोविशील्ड एवं कोवाक्सिन टीके की बर्बादी की दर क्रमश: 5.24 और 7.21 प्रतिशत है। बर्बादी का प्रमुख कारण एक साथ लोगों का टीकाकरण के लिए न पहुंचना है। जनपद में अब तक 93 हजार से अधिक लोगों को टीका लग चुका है।
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ऐसे बर्बाद हो रहा है टीका
जनपद में कोविशील्ड एवं कोवाक्सिन टीका लग रहा है। कोवाक्सिन की तुलना में कोविशील्ड टीका अधिक संख्या में लगाया जा रहा है। वर्तमान में जेएन मेडिकल कॉलेज, मलखान सिंह जिला अस्पताल, छर्रा, इगलास एवं चंडौस स्वास्थ्य केंद्रों में कोवाक्सिन टीका लग रहा है। जबकि शेष स्वास्थ्य केंद्रों पर कोविशील्ड टीका लगाया जा रहा है।
कोवाक्सिन टीके की बर्बादी का एक प्रमुख कारण यह है कि पहले इसकी एक शीशी में बीस डोज होते थे। एक साथ बीस लोगों के नहीं पहुंचने पर डोज बर्बाद हो जाते थे। शीशी खुलने के चार घंटे बाद टीका इस्तेमाल नहीं होता है। इसलिए बर्बादी का प्रतिशत बढ़ जाता है। लेकिन अब कोवाक्सिन की शीशी में दस डोज आ रही हैं। कोविशील्ड की एक शीशी में पहले से ही दस डोज आ रही हैं।
कोवाक्सिन का जेएन मेडिकल कॉलेज में हो चुका ट्रायल
टीकाकरण शुरू होने के पहले कोवाक्सिन का जेएन मेडिकल कॉलेज में ट्रायल हुआ था। अलग-अलग क्षेत्र के एक हजार लोगों को ट्रॉयल में शामिल किया गया था। शुरुआती दिनों में यहां कोवाक्सिन की सबसे अधिक बर्बादी हुई थी। इस पर स्वास्थ्य विभाग ने जेएन मेडिकल कॉलेज से स्पष्टीकरण भी मांगा था।
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कोरोना वायरस के विरुद्ध टीका कारगर हथियार है लेकिन जिले में औसतन 6.22 प्रतिशत टीका बर्बाद हो रहा है। इसमें 5.24 प्रतिशत कोविशील्ड एवं 7.21 प्रतिशत कोवाक्सिन टीके की बर्बादी हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, इसका प्रमुख कारण यह है कि लोग एक साथ टीका लगवाने नहीं आ रहे हैं। शीशी एक बार खुलने पर चार घंटे तक ही डोज इस्तेमाल की जा सकती है।
कोराना टीकाकरण के शुरूआती दिनों में टीके की बर्बादी के मामले में अलीगढ़ जनपद शीर्ष पर था। उस समय 42 प्रतिशत टीका बर्बाद हो रहा था। मार्च में मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष यह मुद्दा उठा था। केंद्र व राज्य सरकार की सख्ती के बाद कोरोना टीके से संबंधित रिपोर्ट प्रतिदिन मांगी जाने लगी। वर्तमान में देश में टीके की बर्बादी का औसत 6.5 प्रतिशत है। जबकि उत्तर प्रदेश का औसत 9.4 प्रतिशत है यानी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय औसत से भी अधिक टीका बर्बाद हो रहा है।
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सीएमओ डॉ. बीपी सिंह कल्याणी ने बताया कि जनपद में कोविशील्ड एवं कोवाक्सिन टीके की बर्बादी की दर क्रमश: 5.24 और 7.21 प्रतिशत है। बर्बादी का प्रमुख कारण एक साथ लोगों का टीकाकरण के लिए न पहुंचना है। जनपद में अब तक 93 हजार से अधिक लोगों को टीका लग चुका है।
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ऐसे बर्बाद हो रहा है टीका
जनपद में कोविशील्ड एवं कोवाक्सिन टीका लग रहा है। कोवाक्सिन की तुलना में कोविशील्ड टीका अधिक संख्या में लगाया जा रहा है। वर्तमान में जेएन मेडिकल कॉलेज, मलखान सिंह जिला अस्पताल, छर्रा, इगलास एवं चंडौस स्वास्थ्य केंद्रों में कोवाक्सिन टीका लग रहा है। जबकि शेष स्वास्थ्य केंद्रों पर कोविशील्ड टीका लगाया जा रहा है।
कोवाक्सिन टीके की बर्बादी का एक प्रमुख कारण यह है कि पहले इसकी एक शीशी में बीस डोज होते थे। एक साथ बीस लोगों के नहीं पहुंचने पर डोज बर्बाद हो जाते थे। शीशी खुलने के चार घंटे बाद टीका इस्तेमाल नहीं होता है। इसलिए बर्बादी का प्रतिशत बढ़ जाता है। लेकिन अब कोवाक्सिन की शीशी में दस डोज आ रही हैं। कोविशील्ड की एक शीशी में पहले से ही दस डोज आ रही हैं।
कोवाक्सिन का जेएन मेडिकल कॉलेज में हो चुका ट्रायल
टीकाकरण शुरू होने के पहले कोवाक्सिन का जेएन मेडिकल कॉलेज में ट्रायल हुआ था। अलग-अलग क्षेत्र के एक हजार लोगों को ट्रॉयल में शामिल किया गया था। शुरुआती दिनों में यहां कोवाक्सिन की सबसे अधिक बर्बादी हुई थी। इस पर स्वास्थ्य विभाग ने जेएन मेडिकल कॉलेज से स्पष्टीकरण भी मांगा था।