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काजी साहब के जमाने मे क्लास में लड़के एवं लड़कियों के बीच होता था पर्दा
Updated Wed, 31 Oct 2018 01:30 AM IST
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
पद्मश्री प्रो. काजी अब्दुल सत्तार अब नहीं रहें। पिछले साल अक्तूबर महीने में अमर उजाला से बातचीत के दौरान एएमयू के अनुभव से संबंधित दिलचस्प किस्से सुनाए थे। उन्होंने बताया था कि 1955 में एमए का पहला क्लास लिया था। यह समय किसी भी शिक्षक के लिए गौरव एवं सम्मान की बात होती है।
उस क्लास में लड़के और लड़कियों के बीच पर्दा पड़ा था। एक तरफ लड़के एवं दूसरी तरफ लड़कियां बैठी थी। लड़कों में राही मासूम रजा एवं शहरयार बैठे थे। राही ने 8 वर्ष पहले बीए किया था और एमए करने आए थे।
काजी साहब ने बताया था कि पहला लेक्चर इस तरह सुना गया कि क्लास में सिवाय सांसों की कोई आवाज नहीं थी। प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के उस्ताद प्रो. रशीद अहमद सिद्दीकी दीवार से लगकर चुपचाप लेक्चर सुन रहे थे।
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जब मैं लेक्चर देकर उनके पास गया तो चपरासी को उन्होंने हुक्म दिया कि डैंडी (छैल छबीला नवाब/ प्यार से वे काजी साहब को यहीं बोलते थे) को चाय पिलाओ। उल्लेखनीय है कि बाद में राही मासूम रजा एवं शहरयार विख्यात लेखक एवं शायर बने।
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पद्मश्री प्रो. काजी अब्दुल सत्तार अब नहीं रहें। पिछले साल अक्तूबर महीने में अमर उजाला से बातचीत के दौरान एएमयू के अनुभव से संबंधित दिलचस्प किस्से सुनाए थे। उन्होंने बताया था कि 1955 में एमए का पहला क्लास लिया था। यह समय किसी भी शिक्षक के लिए गौरव एवं सम्मान की बात होती है।
उस क्लास में लड़के और लड़कियों के बीच पर्दा पड़ा था। एक तरफ लड़के एवं दूसरी तरफ लड़कियां बैठी थी। लड़कों में राही मासूम रजा एवं शहरयार बैठे थे। राही ने 8 वर्ष पहले बीए किया था और एमए करने आए थे।
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काजी साहब ने बताया था कि पहला लेक्चर इस तरह सुना गया कि क्लास में सिवाय सांसों की कोई आवाज नहीं थी। प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के उस्ताद प्रो. रशीद अहमद सिद्दीकी दीवार से लगकर चुपचाप लेक्चर सुन रहे थे।
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जब मैं लेक्चर देकर उनके पास गया तो चपरासी को उन्होंने हुक्म दिया कि डैंडी (छैल छबीला नवाब/ प्यार से वे काजी साहब को यहीं बोलते थे) को चाय पिलाओ। उल्लेखनीय है कि बाद में राही मासूम रजा एवं शहरयार विख्यात लेखक एवं शायर बने।