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डग्गामार एंबुलेंस की भरमार पर अधिकारी अनजान
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
डग्गामार एंबुलेंस मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रही है। इनमें चिकित्सकीय सेवाओं के मानक आधे-अधूरे हैं। परिवहन और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से मरीजों की जान हमेशा दांव पर लगी रहती है। इन डग्गामार एंबुलेंसों में जाने वाले कई मरीज तो अपनी जान भी जा चुकी हैं। बावजूद इसके परिवहन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है। परिवहन अधिकारियों को तो यह भी याद नहीं है कि कब दोनों विभाग के अधिकारियों ने मिलकर डग्गामार एंबुलेंसों की चेकिंग को अभियान चलाया था।
परिवहन विभाग में 200 एंबुलेंस पंजीकृत हैं, लेकिन इतनी एंबुलेंस तो जेएन मेडीकल कालेज के बाहर ही खड़ी रहती है। महानगर के अंदर और बाहर बने नर्सिंग होम एवं अन्य अस्पतालों के बाहर खड़ी एंबुलेंस को अलग है। कुल मिलाकर अंदाजन महानगर में एक हजार से अधिक एंबुलेंस संचालित हैं। परिवहन विभाग के अधिकारियों की अनदेखी के कारण कोई भी चालक अपनी गाड़ी को एंबुलेंस बना लेता है, एंबुलेंस की चेकिंग न होने पर उसे किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती है।
क्रिटिकल एंबुलेंस में चिकित्सकीय सेवाओं की बात करें तो इसमें जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए, जिसमें आक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था जरूरी है। अग्निशमन सिलिंडर, पैरामेडिकल स्टाफ, टेक्नीशियन के साथ डाक्टर की सुविधा भी होनी चाहिए। सामान्य एंबुलेंस में प्राथमिक चिकित्सा किट, अग्निशमन सिलिंडर, स्टेचर होना जरूरी है।
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एंबुलेंस के कागजात, फिटनेस और चालक का लाइसेंस देखने का अधिकार आरटीओ को हैं, लेकिन उसके अंदर क्या-क्या उपकरण होने चाहिए, यह स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी तय करते हैं। जल्द ही दोनों विभागों को साथ लेकर एंबुलेंस की चेकिंग कराई जाएगी। वर्तमान में उन्हीं एंबुलेंस का पंजीकरण किया जा रहा है जो किसी चिकित्सक या नर्सिंग होम के नाम रजिस्ट्रेट हैं। इसके अलावा अन्य वाहनों का एंबुलेंस के रूप में रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा रहा है।
- राधेश्याम, आरटीओ
निजी नर्सिंग होम की एंबुलेंस उनके रखरखाव व संचालन की जिम्मेदारी हमारे नियमन में नहीं आता है। हां, सरकारी सेवाओं की एंबुलेंस हैं, उनकी दवाओं की आपूर्ति करना और देखरेख करना हमारा जिम्मा है।
- पीके शर्मा कार्यवाहक सीएमओ
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डग्गामार एंबुलेंस मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रही है। इनमें चिकित्सकीय सेवाओं के मानक आधे-अधूरे हैं। परिवहन और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से मरीजों की जान हमेशा दांव पर लगी रहती है। इन डग्गामार एंबुलेंसों में जाने वाले कई मरीज तो अपनी जान भी जा चुकी हैं। बावजूद इसके परिवहन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है। परिवहन अधिकारियों को तो यह भी याद नहीं है कि कब दोनों विभाग के अधिकारियों ने मिलकर डग्गामार एंबुलेंसों की चेकिंग को अभियान चलाया था।
परिवहन विभाग में 200 एंबुलेंस पंजीकृत हैं, लेकिन इतनी एंबुलेंस तो जेएन मेडीकल कालेज के बाहर ही खड़ी रहती है। महानगर के अंदर और बाहर बने नर्सिंग होम एवं अन्य अस्पतालों के बाहर खड़ी एंबुलेंस को अलग है। कुल मिलाकर अंदाजन महानगर में एक हजार से अधिक एंबुलेंस संचालित हैं। परिवहन विभाग के अधिकारियों की अनदेखी के कारण कोई भी चालक अपनी गाड़ी को एंबुलेंस बना लेता है, एंबुलेंस की चेकिंग न होने पर उसे किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती है।
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क्रिटिकल एंबुलेंस में चिकित्सकीय सेवाओं की बात करें तो इसमें जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए, जिसमें आक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था जरूरी है। अग्निशमन सिलिंडर, पैरामेडिकल स्टाफ, टेक्नीशियन के साथ डाक्टर की सुविधा भी होनी चाहिए। सामान्य एंबुलेंस में प्राथमिक चिकित्सा किट, अग्निशमन सिलिंडर, स्टेचर होना जरूरी है।
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एंबुलेंस के कागजात, फिटनेस और चालक का लाइसेंस देखने का अधिकार आरटीओ को हैं, लेकिन उसके अंदर क्या-क्या उपकरण होने चाहिए, यह स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी तय करते हैं। जल्द ही दोनों विभागों को साथ लेकर एंबुलेंस की चेकिंग कराई जाएगी। वर्तमान में उन्हीं एंबुलेंस का पंजीकरण किया जा रहा है जो किसी चिकित्सक या नर्सिंग होम के नाम रजिस्ट्रेट हैं। इसके अलावा अन्य वाहनों का एंबुलेंस के रूप में रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा रहा है।
- राधेश्याम, आरटीओ
निजी नर्सिंग होम की एंबुलेंस उनके रखरखाव व संचालन की जिम्मेदारी हमारे नियमन में नहीं आता है। हां, सरकारी सेवाओं की एंबुलेंस हैं, उनकी दवाओं की आपूर्ति करना और देखरेख करना हमारा जिम्मा है।
- पीके शर्मा कार्यवाहक सीएमओ