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कुपोषितों के साथ ऐसा मजाक..5 रुपये में एक साल इलाज
Updated Mon, 03 Sep 2018 02:24 AM IST
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
कुपोषण को लेकर ‘अमर उजाला’ की ओर से चलाए गए अभियान में अफसरों के दावे पहले ही हवाई साबित हो चुके हैं। अब जन्मदोष, बीमारी, कमी और विकासात्मक विलंब से ग्रस्त कुपोषिताें के नि:शुल्क इलाज के नाम पर भी मजाक हो रहा है। महज पांच रुपये में साल भर नि:शुल्क इलाज मजाक नहीं तो और क्या है? जी हां, जिले के 19 हजार 578 गंभीर कुपोषितों और अब तक इलाज के लिए पंजीकृत हुए 2500 बच्चों की सरकार को इतनी फिक्र है कि उनके साल भर तक इलाज के लिए 1 लाख 20 हजार रुपये की धनराशित तय कर दी है। हालात यह हैं कि उपचाराधीन बच्चों के परिजन 3 माह से जांच व दवा के लिए भी भटक रहे हैं। धन के अभाव में अधिकतर बच्चों का इलाज ही अधर में लटक गया है। पेश है विस्तृत रिपोर्ट...।
3 माह से इलाज के नाम पर मजाक
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जेएन मेडिकल कालेज की मदद से मेडिकल परिसर में ही जुलाई 2017 में डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर की स्थापना की गई है। कुपोषण की जिम्मेदार 38 प्रकार की विशेष बीमारियों में जकड़े बच्चों का निशुल्क इलाज यहीं कराया जाता है। सेंटर की स्थापना के समय सरकार ने नि:शुल्क के इलाज के लिए 45 लाख का बजट सेंटर को दिया था। पिछले वर्ष कुल 795 बच्चों का इलाज शुरू हुआ। अभी भी वो बच्चे फालोअप में हैं।
इस वर्ष भी अभी तक 1700 से अधिक बच्चे यहां उपचाराधीन हो चुके हैं। वर्तमान में पुराने फालोअप को मिलाकर तकरीबन 1500 बच्चे हर माह उपचाराधीन होते हैं। जांच होती है और दवाएं भी दी जाती हैं। सारा खर्च यह सेंटर ही वहन करता था, लेकिन 45 लाख का फंड पूरा खर्च हो चुका। नए सत्र के लिए सरकार ने नया फंड भेज दिया है, लेकिन वह फंड महज 1 लाख 20 हजार ही है। इसी से पूरे वर्ष नि:शुल्क इलाज देना है। अब तक डीईआईसी में 2500 बच्चे पंजीकृत हो चुके हैं, इनका फालोअप जारी है। उधर, जिले में अभी 19578 बच्चे गंभीर कुपोषित बचे हैं। इनमें से भी उपचार वाले बच्चे लगातार आ रहे हैं। इन 22 हजार से अधिक बच्चों के हिस्से में 5 रुपये बमुश्किल आएंगे। आखिर इस फंड से पूरे वर्ष निशुल्क इलाज कैसे संभव है। बच्चों की संख्या इतनी है कि 3 माह पहले ही डीईआईसी बजट की कंगाली में आ गया है। बच्चों के परिजन जैसे तैसे इलाज करा पा रहे हैं। जो पैसे नहीं जुटा पा रहे उनका उपचार अधर में ही लटक गया है।
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यह हैं बचाव के इंतजाम
जमीनी स्तर पर आंगनबाड़ी बच्चों का वजन तोलकर रजिस्टर में दर्ज करेंगी। हाल ही में पूरे जिले में 344133 बच्चों का वजन तोला गया है। इसमें 60747 बच्चे कुपोषित मिले हैं। जिनमे 19578 गंभीर रूप से कुपोषित हैं। आंगनबाड़ी स्तर पर पोषाहार देकर कुपोषण से मुक्ति का प्रयास किया जाता है। दूसरी ओर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की टीम भी इन बच्चों को स्क्रीन करेगी। वे यह तय करेंगे कि बच्चे को एक्सपर्ट सेंटर की भेजने की जरूरत है या नहीं। यदि खान पान से कुपोषित हैं तो पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया जाएगा। और यदि जन्मदोष, कमी, बीमारी व विकासात्मक विलंब संबंधी किसी बीमारी के कारण बच्चे का सही पोषण नहीं हो रहा है तो उसे डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर (डीईआईसी) में उपचार के लिए पंजीकृत कराकर निशुल्क उपचार शुरू कराया जाएगा। सरकार की इसी व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी जिले के अफसरों की है।
इन बीमारियों ने बनाया कुपोषित
25.7 फीसदी बच्चे ग्लोबल डिले का शिकार हैं। इसी तरह डेंटल कंडीशन 15.7, आंख संबंधी 7.5, टेढ़े पैर 6.6, फटे होठ तालु 6.3, मिर्गी दौरा 5, हार्ट डिसीज 4.5, बहरापन 4.4, ओटाइसिस मीडिया 4.5, लैंगुएज डिले 3.1, विटामिन ए व डी 3.1, डाउन सिंड्रोम 1.6, सीडीएच 1.4, स्किन प्रॉब्लम 1.3, पैदायशी डिफेक्ट 1.3, एनीमिया 1.0 और 0.9 फीसदी बच्चे बिहेवियर डिसॉर्डर के कारण कुपोषित मिलते हैं। महज 6.4 फीसदी बच्चे हैं जिन्हें कोई बीमारी नहीं, वो सिर्फ खान पान की कमी के कारण कुपोषित हैं। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जेएन मेडिकल कॉलेज में संचालित डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर में जांच में यह बात साबित हो चुकी है।
पिछले वर्ष डीईआईसी की शुरुआत के समय 45 लाख का बजट मिल गया था तो शुरुआत अच्छी हो गई थी। इस वर्ष बजट 1.20 लाख रुपये हो गया है। बजट घटने से थोड़ा मुश्किल हो रही है। सीएमओ के माध्यम से बजट बढ़ाने की डिमांड भिजवाने का प्रयास करेंगे। -डॉ.एसपी सिंह नोडल अफसर आरबीएसके
कुपोषण से लड़ने के मामले में स्वास्थ्य विभाग बच्चे के टीकाकरण और मां के शरीर में खून की कमी व कैल्शियम के लिए काम करता है। इसके लिए हमारे पास पर्याप्त बजट है। इसके अलावा जो आहार संबंधी जिम्मेदारी है, वह बाल विकास पुष्टाहार विभाग के पास है। हमारे स्तर पर जो भी गतिविधियां हैं, उसके लिए पर्याप्त पैसा है। -डॉ.पीके शर्मा एसीएमओ
कुपोषित बच्चों के इलाज व आहार के लिए पर्याप्त बजट है। बजट में किसी तरह की कमी है, इस तरह की बात संज्ञान में नहीं आई है। इसे दिखवाया जाएगा। -दिनेश चंद्र सीडीओ।
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कुपोषण को लेकर ‘अमर उजाला’ की ओर से चलाए गए अभियान में अफसरों के दावे पहले ही हवाई साबित हो चुके हैं। अब जन्मदोष, बीमारी, कमी और विकासात्मक विलंब से ग्रस्त कुपोषिताें के नि:शुल्क इलाज के नाम पर भी मजाक हो रहा है। महज पांच रुपये में साल भर नि:शुल्क इलाज मजाक नहीं तो और क्या है? जी हां, जिले के 19 हजार 578 गंभीर कुपोषितों और अब तक इलाज के लिए पंजीकृत हुए 2500 बच्चों की सरकार को इतनी फिक्र है कि उनके साल भर तक इलाज के लिए 1 लाख 20 हजार रुपये की धनराशित तय कर दी है। हालात यह हैं कि उपचाराधीन बच्चों के परिजन 3 माह से जांच व दवा के लिए भी भटक रहे हैं। धन के अभाव में अधिकतर बच्चों का इलाज ही अधर में लटक गया है। पेश है विस्तृत रिपोर्ट...।
3 माह से इलाज के नाम पर मजाक
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जेएन मेडिकल कालेज की मदद से मेडिकल परिसर में ही जुलाई 2017 में डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर की स्थापना की गई है। कुपोषण की जिम्मेदार 38 प्रकार की विशेष बीमारियों में जकड़े बच्चों का निशुल्क इलाज यहीं कराया जाता है। सेंटर की स्थापना के समय सरकार ने नि:शुल्क के इलाज के लिए 45 लाख का बजट सेंटर को दिया था। पिछले वर्ष कुल 795 बच्चों का इलाज शुरू हुआ। अभी भी वो बच्चे फालोअप में हैं।
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इस वर्ष भी अभी तक 1700 से अधिक बच्चे यहां उपचाराधीन हो चुके हैं। वर्तमान में पुराने फालोअप को मिलाकर तकरीबन 1500 बच्चे हर माह उपचाराधीन होते हैं। जांच होती है और दवाएं भी दी जाती हैं। सारा खर्च यह सेंटर ही वहन करता था, लेकिन 45 लाख का फंड पूरा खर्च हो चुका। नए सत्र के लिए सरकार ने नया फंड भेज दिया है, लेकिन वह फंड महज 1 लाख 20 हजार ही है। इसी से पूरे वर्ष नि:शुल्क इलाज देना है। अब तक डीईआईसी में 2500 बच्चे पंजीकृत हो चुके हैं, इनका फालोअप जारी है। उधर, जिले में अभी 19578 बच्चे गंभीर कुपोषित बचे हैं। इनमें से भी उपचार वाले बच्चे लगातार आ रहे हैं। इन 22 हजार से अधिक बच्चों के हिस्से में 5 रुपये बमुश्किल आएंगे। आखिर इस फंड से पूरे वर्ष निशुल्क इलाज कैसे संभव है। बच्चों की संख्या इतनी है कि 3 माह पहले ही डीईआईसी बजट की कंगाली में आ गया है। बच्चों के परिजन जैसे तैसे इलाज करा पा रहे हैं। जो पैसे नहीं जुटा पा रहे उनका उपचार अधर में ही लटक गया है।
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जमीनी स्तर पर आंगनबाड़ी बच्चों का वजन तोलकर रजिस्टर में दर्ज करेंगी। हाल ही में पूरे जिले में 344133 बच्चों का वजन तोला गया है। इसमें 60747 बच्चे कुपोषित मिले हैं। जिनमे 19578 गंभीर रूप से कुपोषित हैं। आंगनबाड़ी स्तर पर पोषाहार देकर कुपोषण से मुक्ति का प्रयास किया जाता है। दूसरी ओर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की टीम भी इन बच्चों को स्क्रीन करेगी। वे यह तय करेंगे कि बच्चे को एक्सपर्ट सेंटर की भेजने की जरूरत है या नहीं। यदि खान पान से कुपोषित हैं तो पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया जाएगा। और यदि जन्मदोष, कमी, बीमारी व विकासात्मक विलंब संबंधी किसी बीमारी के कारण बच्चे का सही पोषण नहीं हो रहा है तो उसे डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर (डीईआईसी) में उपचार के लिए पंजीकृत कराकर निशुल्क उपचार शुरू कराया जाएगा। सरकार की इसी व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी जिले के अफसरों की है।
इन बीमारियों ने बनाया कुपोषित
25.7 फीसदी बच्चे ग्लोबल डिले का शिकार हैं। इसी तरह डेंटल कंडीशन 15.7, आंख संबंधी 7.5, टेढ़े पैर 6.6, फटे होठ तालु 6.3, मिर्गी दौरा 5, हार्ट डिसीज 4.5, बहरापन 4.4, ओटाइसिस मीडिया 4.5, लैंगुएज डिले 3.1, विटामिन ए व डी 3.1, डाउन सिंड्रोम 1.6, सीडीएच 1.4, स्किन प्रॉब्लम 1.3, पैदायशी डिफेक्ट 1.3, एनीमिया 1.0 और 0.9 फीसदी बच्चे बिहेवियर डिसॉर्डर के कारण कुपोषित मिलते हैं। महज 6.4 फीसदी बच्चे हैं जिन्हें कोई बीमारी नहीं, वो सिर्फ खान पान की कमी के कारण कुपोषित हैं। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जेएन मेडिकल कॉलेज में संचालित डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर में जांच में यह बात साबित हो चुकी है।
पिछले वर्ष डीईआईसी की शुरुआत के समय 45 लाख का बजट मिल गया था तो शुरुआत अच्छी हो गई थी। इस वर्ष बजट 1.20 लाख रुपये हो गया है। बजट घटने से थोड़ा मुश्किल हो रही है। सीएमओ के माध्यम से बजट बढ़ाने की डिमांड भिजवाने का प्रयास करेंगे। -डॉ.एसपी सिंह नोडल अफसर आरबीएसके
कुपोषण से लड़ने के मामले में स्वास्थ्य विभाग बच्चे के टीकाकरण और मां के शरीर में खून की कमी व कैल्शियम के लिए काम करता है। इसके लिए हमारे पास पर्याप्त बजट है। इसके अलावा जो आहार संबंधी जिम्मेदारी है, वह बाल विकास पुष्टाहार विभाग के पास है। हमारे स्तर पर जो भी गतिविधियां हैं, उसके लिए पर्याप्त पैसा है। -डॉ.पीके शर्मा एसीएमओ
कुपोषित बच्चों के इलाज व आहार के लिए पर्याप्त बजट है। बजट में किसी तरह की कमी है, इस तरह की बात संज्ञान में नहीं आई है। इसे दिखवाया जाएगा। -दिनेश चंद्र सीडीओ।