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न तुम जीते-न हम हारे
ब्यूरो अमर उजाला, आगरा
Updated Sun, 13 Dec 2015 02:40 AM IST
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वही मुकदमा। वही अदालत। वही वादी। वही प्रतिवादी। लेकिन इंसाफ के मायने एकदम से बदले हुए। फैसला ऐसा कि न कोई केस जीता और न ही कोई हारा। वादी और प्रतिवादी, दोनों के चेहरे पर मुकदमे से मुक्ति पाने का सुकून। तारीख पर तारीख के झंझट ने परेशान जो कर दिया था। कानपुर के आदर्श कुमार 10 सालों से तलाक के लिए आगरा कोर्ट के चक्कर लगा रहे थे। लोक अदालत में केस लगा तो सुबह 6:30 बजे ही दिवानी कचहरी पहुंच गए। नोडल अधिकारी एवं एडीजे मुमताज अली इस समय तैयारियां का जायजा लेने पहुंचे थे। आदर्श को देखकर चौंक गए। गधापाड़ा के कल्पना और प्रताप तलाक के लिए केस लड़ रहे थे। कोर्ट के चक्कर लगा लगाकर परेशान हो गए थे। आखिर लोक अदालत के माध्यम से समझौता कर लिया। दोनों का पुनर्मिलन हो गया। दोनों को अब कोई शिकायत नहीं। बाह के राजेश बैंक लोन से परेशान थे। बैंक ने उनके खिलाफ केस कर रखा था। लोक अदालत में राजेश ने लोन चुकाया और बैंक ने पेनल्टी में छूट दी। दोनों का काम बन गया। शमसाबाद के हरीश पर ऊर्जा निगम ने बिजली चोरी का केस कर दिया था। लोक अदालत में केस लगा तो सरचार्ज में छूट मिली और मुकदमे से छुटकारा मिल गया।
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